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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished711 pages

Page 244 of 711

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Page 244

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परिच्छेद ३७

श्रीरामकृष्ण का प्रथम प्रेमोन्माद

(१)

पूर्वकथा – देवेन्द्र ठाकुर, दीन मुखर्जी और कुँवरसिंह

आज अमावस्या, मंगलवार का दिन है, ५ जून १८८३ ई.। श्रीरामकृष्ण कालीमन्दिर में हैं। भक्त-समागम रविवार को विशेष होता है; आज अधिक लोग नहीं है। राखाल श्रीरामकृष्ण के पास रहते हैं। हाजरा भी हैं, श्रीरामकृष्ण के कमरे के सामने वाले बरामदे में अपना आसन लगाया है। मास्टर पिछले रविवार से यहाँ हैं।

कल सोमवार रात को कालीमन्दिर में कृष्णलीला पर नाटक हुआ था। श्रीरामकृष्ण ने कुछ देर तक देखा था। वैसे यह नाटक रविवार को होनेवाला था, पर उस दिन न हो पाया इसलिए कल सोमवार को हुआ।

दोपहर को भोजन के बाद श्रीरामकृष्ण अपने प्रेमोन्माद की अवस्था का वर्णन कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण (मास्टर से) – कैसी हालत बीत चुकी है! यहाँ भोजन न करता था, वराहनगर या दक्षिणेश्वर या आरियादह में किसी ब्राह्मण के घर चला जाता, और जाता भी देर में था। जाकर बैठ जाता था, पर बोलता कुछ नहीं। घर के लोग पूछते तो केवल कहता, ‘मैं यहाँ खाऊँगा।’ और कोई बात नहीं करता। आलमबाजार में राम चटर्जी के यहाँ जाता। कभी दक्षिणेश्वर में सावर्ण चौधरी के मकान पर जाता। उनके यहाँ खाया तो करता था, पर अच्छा नहीं लगता था; उसमें कैसी गन्ध आती थी!

“एक दिन हठ कर बैठा, देवेन्द्रनाथ ठाकुर के घर जाऊँगा। मथुरबाबू से कहा, ‘देवेन्द्र ईश्वर का नाम लेते हैं, उनको देखना चाहता हूँ, मुझे ले चलोगे?’ मथुरबाबू को अपनी मान-मर्यादा का बड़ा अभिमान था, वे अपनी गरज से किसी के मकान पर क्यों जाने लगे? आगापीछा करने लगे। बाद में बोले, ‘अच्छा, देवेन्द्र और हम एक साथ पढ़ चुके हैं, चलिए, आपको ले चलेंगे।’

“एक दिन सुना कि दीन मुखर्जी नाम का एक भला आदमी बागबाजार के पुल के पास रहता है। भक्त है। मथुरबाबू को पकड़ा, दीन मुखर्जी के यहाँ जाऊँगा। मथुरबाबू क्या

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar