श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
२२ जुलाई, १८८३ | परिच्छेद ४७ | २७३
२२ जुलाई, १८८३ | परिच्छेद ४७ | २७३
(३)
समाधि में
श्रीरामकृष्ण प्रायः रातदिन समाधिस्थ रहते हैं – उनका बाहरी ज्ञान नहीं के बराबर होता है, केवल बीच बीच में भक्तों के साथ ईश्वरीय प्रसंग और संकीर्तन करते हैं। करीब तीन-चार बजे मास्टर ने देखा कि वे अपने छोटे तख्त पर बैठे हैं – भावाविष्ट हैं। थोड़ी देर बाद जगन्माता से बातें करते हैं।
माता से वार्तालाप करते हुए एक बार उन्होंने कहा, “माँ, उसे एक कला भर शक्ति क्यों दी?” थोड़ी देर चुप रहने के बाद फिर कहते हैं, “माँ, समझ गया, एक कला ही पर्याप्त होगी। उसी से तेरा काम हो जाएगा – जीवशिक्षण होगा।”
क्या श्रीरामकृष्ण इसी तरह अपने अन्तरंग भक्तों में शक्तिसंचार कर रहे हैं? क्या यह सब तैयारी इसीलिए हो रही है कि आगे चलकर वे जीवों को शिक्षा देंगे?
मास्टर के अलावा कमरे में राखाल भी बैठे हुए हैं। श्रीरामकृष्ण अब भी भावमग्न हैं, राखाल से कहते हैं, “तू नाराज हो गया था? मैंने तुझे क्यों नाराज किया, इसका कारण है; दवा अपना ठीक असर करेगी समझकर। पेट में तिल्ली अधिक बढ़ जाने पर मदार के पत्ते आदि लगाने पड़ते हैं।”
कुछ देर बाद कहते हैं, “हाजरा को देखा, शुष्क काष्ठवत् है। तब यहाँ रहता क्यों है? इसका कारण है, जटिला कुटिला* के रहने से लीला की पुष्टि होती है।
(मास्टर के प्रति) “ईश्वर का रूप मानना पड़ता है। जगद्धात्री रूप का अर्थ जानते हो? जिन्होंने जगत् को धारण कर रखा है – उनके धारण न करने से, उनके पालन न करने से जगत् नष्टभ्रष्ट हो जाय। मनरूपी हाथी को जो वश में कर सकता है, उसी के हृदय में जगद्धात्री उदित होती हैं।”
राखाल – मन मतवाला हाथी है।
श्रीरामकृष्ण – सिंहवाहिनी का सिंह इसीलिए हाथी को दबाये हुए है।
सन्ध्यासमय मन्दिर में आरती हो रही है। श्रीरामकृष्ण भी अपने कमरे में ईश्वर का नाम ले रहे हैं। कमरे में धूनी दी गयी। श्रीरामकृष्ण हाथ जोड़कर छोटे तख्त पर बैठे हैं – माता का चिन्तन कर रहे हैं। बेलघरिया के गोविन्द मुकर्जी और उनके कुछ मित्रों ने आकर उनको प्रणाम किया और जमीन पर बैठे। मास्टर और राखाल भी बैठे हैं।
बाहर चाँद निकला हुआ है। जगत् चुपचाप हँस रहा है। कमरे के भीतर सब लोग
* श्रीराधा की सास और ननद – आयान घोष की माता और बहन।
| २७४ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २२ जुलाई, १८८३ |
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चुपचाप बैठे श्रीरामकृष्ण की शान्त मूर्ति देख रहे हैं। आप भावमग्न हैं। कुछ देर बाद बातें की। अब भी भावाविष्ट हैं।
श्यामारूप। उत्तम भक्त। विचारपथ
श्रीरामकृष्ण (भावमग्न) - तुम लोगों को कोई शंका हो तो पूछो। मैं समाधान करता हूँ।
गोविन्द तथा अन्यान्य भक्त लोग सोचने लगे।
गोविन्द - महाराज, श्यामारूप क्यों हुआ?
श्रीरामकृष्ण - वह तो सिर्फ दूर से वैसा दिखता है। पास जाने पर कोई रंग ही नहीं! तालाब का पानी दूर से काला दिखता है। पास जाकर हाथ से उठाकर देखो, कोई रंग नहीं। आकाश दूर से नीले रंग का दिखता है। पास के आकाश को देखो, कोई रंग नहीं। ईश्वर के जितने ही समीप जाओगे उतनी ही धारणा होगी कि उनके नाम-रूप नहीं। कुछ दूर हट आने से फिर वही 'मेरी श्यामा माता'। जैसे घासफूल का रंग।
"‘श्यामा पुरुष है या प्रकृति? किसी भक्त ने पूजा की थी। कोई दर्शन करने आया तो उनसे देवी के गले में जनेऊ देखकर कहा, ‘तुमने माता के गले में जनेऊ पहनाया है!’ भक्त ने कहा, ‘भाई, तुम्हीं ने माता को पहचाना है। मैं अब तक नहीं पहचान सका कि वे पुरुष है या प्रकृति! इसीलिए जनेऊ पहना दिया था।’
"‘जो श्यामा हैं वे ही ब्रह्म हैं। जिनका रूप है वे ही रूपहीन भी हैं। जो सगुण हैं वे ही निर्गुण हैं। ब्रह्म ही शक्ति है और शक्ति ही ब्रह्म। दोनों में कोई भेद नहीं। एक सच्चिदानन्दमय है और दूसरी सच्चिदानन्दमयी।’"
गोविन्द - योगमाया क्यों कहते हैं?
श्रीरामकृष्ण - योगमाया अर्थात् पुरुष-प्रकृति का योग। जो कुछ देखते हो वह सब पुरुष-प्रकृति का योग है। शिव-काली की मूर्ति में शिव के ऊपर काली खड़ी हैं। शिव शव की भाँति पड़े हैं, काली शिव की ओर देख रही हैं, - यह सब पुरुष-प्रकृति का योग है। पुरुष निष्क्रिय है, इसीलिए शिव शव हो रहे हैं। पुरुष के योग से प्रकृति सब काम करती है - सृष्टि, स्थिति, प्रलय करती है।
"राधाकृष्ण की युगलमूर्ति का भी यही अभिप्राय है। इसी योग के लिए वक्रभाव है। और यही योग दिखाने के लिए श्रीकृष्ण की नाक में मुक्ता और श्रीमती की नाक में नीलम है। श्रीमती का रंग गोरा, मुक्ता जैसा उज्ज्वल है। श्रीकृष्ण का रंग साँवला है, इसीलिए श्रीमती नीलम धारण करती है। फिर श्रीकृष्ण के वस्त्र पीले और श्रीमती के नीले हैं।