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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

२४ अगस्त, १८८२ | परिच्छेद ९ | ५९

२४ अगस्त, १८८२परिच्छेद ९५९

हैं।' मैंने उससे कहा, 'चैतन्य की चिन्ता करने से क्या कभी कोई चैतन्यहीन होता है?'"

मणि – जी, समझा। यह तो किसी अनित्य विषय की चिन्ता है नहीं; जो नित्य और चेतन हैं उनमें मन लगाने से मनुष्य अचेतन क्यों होने लगा?

श्रीरामकृष्ण (प्रसन्न होकर) – यह उनकी कृपा है। बिना उनकी कृपा के सन्देह-भंजन नहीं होता।

"आत्मदर्शन के बिना सन्देह दूर नहीं होता।

"उनकी कृपा होने पर फिर कोई भय की बात नहीं रह जाती। पुत्र यदि पिता का हाथ पकड़कर चले तो गिर भी सकता है परन्तु यदि पिता पुत्र का हाथ पकड़े तो फिर गिरने का कोई भय नहीं। वे यदि कृपा करके संशय दूर कर दें और दर्शन दें तो फिर कोई दुःख नहीं। परन्तु उन्हें पाने के लिए खूब व्याकुल होकर पुकारना चाहिए – साधना करनी चाहिए – तब उनकी कृपा होती है। पुत्र को दौड़ते हाँफते देखकर माता को दया आ जाती है। माँ छिपी थी। सामने प्रकट हो जाती है।"

मणि सोच रहे हैं, ईश्वर दौड़धूप क्यों कराते हैं? श्रीरामकृष्ण तुरन्त कहने लगे – "उनकी इच्छा कि कुछ देर दौड़धूप हो तो आनन्द मिले। लीला से उन्होंने इस संसार की रचना की है। इसी का नाम महामाया है। अतएव उस शक्तिरूपिणी महामाया की शरण लेनी पड़ती है। माया के पाशों ने बाँध लिया है, फाँस काटने पर ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं।"

आद्याशक्ति महामाया तथा शक्तिसाधना

श्रीरामकृष्ण – कोई ईश्वर की कृपा प्राप्त करना चाहे तो उसे पहले आद्याशक्तिरूपिणी महामाया को प्रसन्न करना चाहिए। वे संसार को मुग्ध करके सृष्टि, स्थिति और प्रलय कर रही हैं। उन्होंने सब को अज्ञानी बना डाला है। वे जब द्वार से हट जाएँगी तभी जीव भीतर जा सकता है। बाहर पड़े रहने से केवल बाहरी वस्तुएँ देखने को मिलती हैं, नित्य सच्चिदानन्द पुरुष नहीं मिलते। इसीलिए पुराणों में है – सप्तशती में – मधुकैटभ का वध करते समय ब्रह्मादि देवता महामाया की स्तुति कर रहे हैं।*

"संसार का मूल आधार शक्ति ही है। उस आद्याशक्ति के भीतर विद्या और अविद्या दोनों हैं – अविद्या मोहमुग्ध करती है। अविद्या वह है जिससे कामिनी और कांचन उत्पन्न हुए हैं, वह मुग्ध करती है; और विद्या वह है जिससे भक्ति, दया, ज्ञान और प्रेम की उत्पत्ति हुई है; वह ईश्वरमार्ग पर ले जाती है।


* ब्रह्मोवाच। त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं हि वषट्कारस्वरात्मिका।
सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधामात्रात्मिका स्थिता।।
— सप्तशती, मधुकैटभवध

६०श्रीरामकृष्णवचनामृत२४ अगस्त, १८८२

“उस अविद्या को प्रसन्न करना होगा। इसीलिए शक्ति की पूजापद्धति हुई।

“उन्हें प्रसन्न करने के लिए नाना भावों से पूजन किया जाता है। जैसे दासीभाव, वीरभाव, सन्तानभाव। वीरभाव अर्थात् उन्हें रमण द्वारा प्रसन्न करना।

“शक्तिसाधना – सब बड़ी विकट साधनाएँ थीं, दिल्लगी नहीं।

“मैं माँ के दासीभाव से और सखीभाव से दो वर्ष तक रहा। परन्तु मेरा सन्तानभाव है। स्त्रियों के स्तनों को मातृस्तन समझता हूँ।

“लड़कियाँ शक्ति की एक एक मूर्ति हैं। पश्चिम में विवाह के समय वर के हाथ में छुरी रहती है, बंगाल में सरौता – अर्थात् उस शक्तिरूपिणी कन्या की सहायता से वर मायापाश काट सकेगा। यह वीरभाव है। मैंने वीरभाव से पूजा नहीं की। मेरा सन्तानभाव था।

“कन्या शक्तिस्वरूपा है। विवाह के समय तुमने नहीं देखा – वर अहमक की तरह पीछे बैठा रहता है; परन्तु कन्या निःशंक रहती है!

ईश्वरदर्शन तथा ऐहिक ज्ञान या अपरा विद्या

“ईश्वरलाभ करने पर उनके बाहरी ऐश्वर्य, संसार के ऐश्वर्य को भक्त भूल जाता है। उन्हें देखने से उनके ऐश्वर्य की बात याद नहीं आती। दर्शनानन्द में मग्न हो जाने पर भक्त का हिसाबकिताब नहीं रह जाता। नरेन्द्र को देखने पर तेरा नाम क्या है, तेरा घर कहाँ है यह कुछ पूछने की जरूरत नहीं रहती। पूछने का अवसर ही कहाँ है? हनुमान से किसी ने पूछा, आज कौनसी तिथि है? हनुमान ने कहा, भाई, मैं दिन, तिथि, नक्षत्र – कुछ नहीं जानता, मैं केवल श्रीराम का स्मरण किया करता हूँ।”

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