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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

८ अप्रैल, १८८३ | परिच्छेद २९ | १८१

८ अप्रैल, १८८३परिच्छेद २९१८१

श्रीरामकृष्ण (भक्तों से) – बाघ जैसे दूसरे पशुओं को खा जाता है, वैसे 'अनुरागरूपी बाघ' काम-क्रोध आदि रिपुओं को खा जाता है। एक बार ईश्वर पर अनुराग होने से फिर काम-क्रोध आदि नहीं रह जाते। गोपियों की ऐसी ही अवस्था हुई थी। श्रीकृष्ण पर उनका ऐसा ही अनुराग था।

“और है 'अनुराग-अंजन।' श्रीमती (राधा) कहती है – 'सखियों, मैं चारों ओर कृष्ण ही देखती हूँ।' उन लोगों ने कहा – 'सखि, तुमने आँखों में अनुराग-अंजन लगा लिया है, इसीलिए ऐसा देखती हो।'

“इस प्रकार लिखा है कि मेढक का सिर जलाकर उसका अंजन आँखों में लगाने से चारों ओर साँप ही साँप दीख पड़ते हैं।

“जो लोग केवल कामिनी-कांचन में पड़े हुए हैं, कभी ईश्वर का स्मरण नहीं करते, वे बद्ध जीव हैं। उन्हें लेकर क्या कभी महान् कार्य हो सकता है? जैसे कौए का चोंच मारा हुआ आम ठाकुरसेवा में लगाने की क्या, खाने में भी हिचकिचाहट होती है।

“संसारी जीव, बद्धजीव, ये रेशम के कीड़े हैं। यदि चाहें तो कोश को काटकर बाहर निकल सकते हैं; परन्तु खुद जिस घर को बनाया है, उसे छोड़ने में बड़ा मोह होता है। फल यह होता है कि उसी में उनकी मृत्यु हो जाती है।

“जो मुक्त जीव हैं, वे कामिनी-कांचन के वशीभूत नहीं होते। कोई कोई कीड़े (रेशम के) जिस कोये को इतने प्रयत्न से बनाते हैं, उसे काटकर निकल भी आते हैं। परन्तु ऐसे एक ही दो होते हैं।

“माया मोह में डाले रहती है। दो एक मनुष्यों को ज्ञान होता है। वे माया के भुलावे में नहीं आते-कामिनी-कांचन के वशीभूत नहीं होते।

“साधनसिद्ध और कृपासिद्ध। कोई कोई बड़े परिश्रम से खेत में पानी खींचकर लाते हैं। यदि ला सकें तो फसल भी अच्छी होती है। किसी किसी को पानी सींचना ही नहीं पड़ा, वर्षा के जल से खेत भर गया। उसे पानी सींचने के लिए कष्ट नहीं उठाना पड़ा। माया के हाथ से रक्षा पाने के लिए कष्टसाध्य साधनभजन करना पड़ता है। कृपासिद्ध को कष्ट नहीं उठाना पड़ता। परन्तु ऐसे दो ही एक मनुष्य होते हैं।

“और हैं नित्यसिद्ध। इनका ज्ञान – चैतन्य – जन्म-जन्मान्तरों में बना ही रहता है। मानो फौआरे की कल बन्द है, मिस्त्री ने इसे उसे खोलते हुए उसको भी खोल दिया और उससे फर्र से पानी निकलने लगा। जब नित्यसिद्ध का प्रथम अनुराग मनुष्य देखते हैं तब आश्चर्य से कहने लगते हैं – 'इतनी भक्ति, इतना वैराग्य, इतना प्रेम इसमें कहाँ था?' ”

श्रीरामकृष्ण गोपियों के अनुराग की बात कह रहे हैं। फिर गाना होने लगा। रामलाल गाने लगे। गीत का आशय यह है –

१८२ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | ८ अप्रैल, १८८३

“हे नाथ! तुम्हीं हमारे सर्वस्व हो, तुम्हीं हमारे प्राणों के आधार हो और सब वस्तुओ में सार पदार्थ भी तुम्हीं हो। तुम्हे छोड़ तीनों लोक में अपना और कोई नहीं। सुख, शान्ति, सहाय, सम्बल, सम्पद्, ऐश्वर्य, ज्ञान, बुद्धि, बल, वासगृह, आरामस्थल, आत्मीय, मित्र, परिवार सब कुछ तुम्हीं हो। तुम्हीं हमारे इहकाल हो और तुम्हीं परकाल हो, तुम्हीं परित्राण हो और तुम्हीं स्वर्गधाम हो, शास्त्रविधि और कल्पतरू गुरु भी तुम्हीं हो; तुम्हीं हमारे अनन्त सुख के आधार हो। हमारे उपाय, हमारे उद्देश्य तुम्हीं हो। तुम्हीं स्रष्टा, पालनकर्ता और उपास्य हो! दण्डदाता पिता, स्नेहमयी माता और भवार्णव के कर्णधार भी तुम्हीं हो।”

श्रीरामकृष्ण (भक्तों से) – अहा! कैसा गीत है! – ‘तुम्हीं हमारे सर्वस्व हो।’ अक्रूर के आने पर गोपियों ने श्रीराधा से कहा, ‘राधे! यह तेरे सर्वस्व-धन का हरण करने के लिए आया है।’ प्यार यह है। ईश्वर के लिए व्याकुलता इसे कहते हैं।

फिर गाना होने लगा –

(भावार्थ) – “रथचक्र को न पकड़ो न पकड़ो। क्या रथ चक्र से चलता है! जिनके चक्र से जगत् चलता है! वे हरि ही इस चक्र के चक्री हैं।”

गीत सुनते सुनते श्रीरामकृष्ण गम्भीर समाधि-सागर में डूब गये। भक्तगण श्रीरामकृष्ण को चुपचाप टकटकी लगाये देख रहे हैं। कमरे मे सन्नाटा छाया हुआ है। श्रीरामकृष्ण हाथ जोड़े हुए समाधिस्थ बैठे हैं – वैसे ही जैसे फोटोग्राफ में दिखायी देते हैं। नेत्रों से आनन्दधारा बह रही है।

बड़ी देर बाद श्रीरामकृष्ण प्रकृतिस्थ हुए। परन्तु अभी उन्हीं से वार्तालाप कर रहे हैं, जिन्हें समाधि-अवस्था में देख रहे थे। कोई कोई शब्द सुन पड़ता है। श्रीरामकृष्ण आप ही आप कह रहे हैं – “तुम्हीं मैं हो, मैं ही तुम हूँ।...खूब करते हो परन्तु”

“यह मुझे पीलिया रोग तो नहीं हो गया? – चारों ओर तुम्हीं को देख रहा हूँ।

“हे कृष्ण, दीनबन्धु! प्राणवल्लभ! गोविन्द!”

‘प्राणवल्लभ! गोविन्द!’ कहते हुए श्रीरामकृष्ण फिर समाधिमग्न हो गये। भक्तगण महाभावमय श्रीरामकृष्ण को बार बार देख रहे हैं, किन्तु फिर भी नेत्रों की तृप्ति नहीं होती।

(५)

श्रीरामकृष्ण का ईश्वरावेश। उनके मुख से ईश्वरवाणी

श्रीरामकृष्ण समाधिमग्न हैं। अपनी छोटी खाट पर बैठे हुए हैं। चारों ओर भक्तगण बैठे हैं। श्री अधर सेन कुछ मित्रों के साथ आये है। अधर डिप्टी मैजिस्ट्रेट हैं। इन्होंने श्रीरामकृष्ण को पहले एक बार देखा है – आज दूसरी बार देख रहे हैं। इनकी उम्र लगभग उनतीस-तीस वर्ष की होगी। इनके मित्र सारदाचरण को मृत पुत्र का शोक है। ये स्कूलों