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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

२६ सितम्बर, १८८३ | परिच्छेद ५५ | ३१५

२६ सितम्बर, १८८३परिच्छेद ५५३१५

श्रीरामकृष्ण – विद्यासागर सच बात क्यों नहीं कहता?

“सत्य बोलता रहे और परायी स्त्री को माता जाने, इन दो बातों से अगर राम न मिलें, तो तुलसीदास कहते हैं, मेरी बातों को झूठ समझो। सत्यनिष्ठ रहने से ही ईश्वर मिलते हैं। विद्यासागर ने उस दिन कहा था यहाँ आऊँगा, परन्तु फिर न आया।”

“पण्डित और साधु में बड़ा अन्तर है। जो केवल पण्डित है, उसका मन कामिनी-कांचन पर है। साधु का मन श्रीभगवान् के पादपद्मों में रहता है। पण्डित कहता कुछ है और करता कुछ है। साधु की बात जाने दो। जिनका मन ईश्वर के चरणारविन्दों में लगा रहता, है, उनके कर्म और उनकी बातें और ही होती हैं। काशी में मैंने एक नानकपन्थी लड़का साधु देखा था। उसकी आयु तुम्हारे इतनी होगी। मुझे ‘प्रेमी साधु’ कहता था। काशी में उनका मठ है। एक दिन मुझे वहाँ न्यौता देकर ले गया। महन्त को देखा जैसे एक गृहिणी। उससे मैंने पूछा, ‘उपाय क्या है?’ उसने कहा, ‘कलियुग में नारदीय भक्ति चाहिए।’ पाठ कर रहा था, पाठ के समाप्त होने पर कहा – ‘जले विष्णुः स्थले विष्णुर्विष्णुः पर्वतमस्तके। सर्वं विष्णुमयं जगत्।’ सब के अन्त में कहा, ‘शान्तिः! शान्तिः! प्रशान्तिः!’”

कलियुग में वेदमत नहीं

“एक दिन उसने गीतापाठ किया। हठ और दृढ़ता भी ऐसी कि विषयी आदमियों की ओर होकर न पढ़ता था। मेरी ओर होकर उसने पढ़ा। मथुरबाबू भी थे। उनकी ओर पीठ फेरकर पढ़ने लगा। उसी नानकपन्थी साधु ने कहा था, ‘उपाय है नारदीय भक्ति’।”

मास्टर – वे साधु क्या वेदान्तवादी नहीं हैं?

श्रीरामकृष्ण – हाँ, वे लोग वेदान्तवादी हैं, परन्तु भक्तिमार्ग भी मानते हैं। बात यह है कि अब कलिकाल में वेदमत नहीं चलता। एक ने कहा था, ‘मैं गायत्री का पुरश्चरण करूँगा।’ मैंने कहा, ‘क्यों? – कलि के लिए तो तन्त्रोक्त मत है। क्या तन्त्रोक्त मत से पुरश्चरण नहीं होता?’

“वैदिक कर्म बड़ा कठिन है। तिस पर फिर दासत्व करना। ऐसा भी लिखा है कि बारह साल या इसी तरह कुछ दिन दासता करते रहने पर मनुष्य दास ही बन जाता है। इतने दिनों तक जिनकी दासता की, उन्हीं की सत्ता उसमें आ जाती है। उनका रज, तम, जीवहिंसा, विलास, ये सब आ जाते हैं – उनकी सेवा करते हुए। केवल दासता ही नहीं, ऊपर से पेन्शन भी खाता है!

“एक वेदान्ती साधु आया था। मेघ देखकर नाचता था। आँधी और पानी देखकर उसे बड़ा आनन्द मिलता था। उसके ध्यान के समय अगर कोई उसके पास जाता था तो वह बहुत नाराज होता था। एक दिन मैं गया। जाने पर वह बहुत ही उकताया। वह सदा

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३१६श्रीरामकृष्णवचनामृत२६ सितम्बर, १८८३

विचार करता था, 'ब्रह्म सत्य हैं, संसार मिथ्या।' माया के कारण अनेक रूप दिखायी दे रहे हैं, इसी विचार से वह रोशनी के झाड़ की कलम लिए फिरता था। झाड़ की कलम से देखो तो कितने ही रंग दीख पड़ते हैं, परन्तु वास्तव में रंग कोई भी नहीं है। उसी तरह ब्रह्म के सिवाय और कुछ भी नहीं हैं, परन्तु माया और अहंकार के कारण अनेक रूप दिखायी दे रहे हैं। किसी चीज को वह एक बार से अधिक न देखता था, जिससे कहीं माया न लग जाय आसक्ति न हो जाय। नहाते समय पक्षी को उड़ते हुए देखकर वह विचार करता था। हम दोनों एक साथ जंगल जाते थे। उसने जब यह सुना कि तालाब मुसलमानों का है तब उसमें से जल नहीं लिया। हलधारी ने उससे व्याकरण के प्रश्न किए; वह व्याकरण जानता था। व्यंजनवर्णों की बात हुई। तीन दिन यहाँ ठहरा था। एक दिन गंगाजी के किनारे पर शहनाई की आवाज सुनकर उसने कहा, जिसे ब्रह्मदर्शन होता है उसे इस तरह की आवाज सुनकर समाधि हो जाती है।”

(२)

दक्षिणेश्वर में गुरु श्रीरामकृष्ण। परमहंस-अवस्था

श्रीरामकृष्ण साधुओं की बात कहते हुए परमहंस की अवस्था बतलाने लगे। वही बालक की-सी चाल। मुँह पर हँसी जैसे एकदम फूट-फूटकर निकल रही है। कमर में कपड़ा नहीं, दिगम्बर; आँखें आनन्दसागर में तैरती हुई। श्रीरामकृष्ण फिर छोटे तख्त पर जा बैठे, फिर वही मन को मुग्ध कर देनेवाली बातें होने लगीं।

श्रीरामकृष्ण (मणि से) – मैंने न्यांगटा (तोतापुरी) से वेदान्त सुना था। 'ब्रह्म सत्य है, संसार मिथ्या है।' बाजीगर आकर कितने ही तमाशे दिखाता है, आम के पौधे में आम भी लग जाता है। परन्तु है यह सब तमाशा। तमाशा दिखानेवाला बाजीगर ही सत्य है।

मणि – जीवन जैसे एक लम्बी नींद है! इतना ही समझता हूँ कि सब ठीक ठीक नहीं देख रहा हूँ। जिस मन से मैं आकाश को नहीं समझता, उसी मन से संसार को देख रहा हूँ न? अतएव देखना किस तरह से ठीक होगा?

श्रीरामकृष्ण – एक तरह और है। आकाश को हम लोग ठीक नहीं देख रहे, जान पड़ता है वह जमीन से मिला हुआ है। अतएव आदमी सत्य कैसे देखे? भीतर विकार जो है।

श्रीरामकृष्ण मधुर कण्ठ से गाने लगे।

(भावार्थ) – “हे शंकरि यह कैसा विकार है? तुम्हारी कृपा-औषधि मिलने पर ही यह दूर होगा। ...”

“विकार तो है ही। देखो न, संसारी जीव आपस में लड़ते हैं, परन्तु जिस आधार पर लड़ते हैं वह बेजड़ है। लड़ाई भी कैसी! तेरा यह हो, तेरा वह हो। कितनी चिल्लाहट

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar