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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

१४ सितम्बर, १८८४ | परिच्छेद १० | ६०९

१४ सितम्बर, १८८४परिच्छेद १०६०९

नरेन्द्र – (सहास्य) – क्या? उसी तरह जैसे हाथी नारायण है? सभी नारायण हैं।

श्रीरामकृष्ण – (हँसते हुए) – विद्या और अविद्या के रूपों से वे ही लीला कर रहे हैं। मैं दोनों को प्रणाम करता हूँ। चण्डी में है – 'वही लक्ष्मी है और अभागे के यहाँ की धूल भी वही है।' (भवनाथ आदि से) यह क्या विष्णु पुराण में है?

भवनाथ – (हँसते हुए) – जी, मुझे तो नहीं मालूम। कोन्नगर के भक्त आप की समाधि-अवस्था देखकर उठे चले जा रहे थे।

श्रीरामकृष्ण – कोई फिर कह रहा था कि तुम लोग बैठो।

भवनाथ – (हँसते हुए) – वह मैं हूँ।

श्रीरामकृष्ण – तुम जैसे लोगों को यहाँ लाते हो, वैसे ही भगा भी देते हो!

गवैये के साथ नरेन्द्र का वादविवाद हुआ था, उसी की बात चल रही है।

मुखर्जी – नरेन्द्र ने भी मोर्चा नहीं छोड़ा।

श्रीरामकृष्ण – हाँ, ऐसी दृढ़ता तो चाहिए ही। इसे सत्त्व का तम कहते हैं। लोग जो कुछ कहेंगे क्या उसी पर विश्वास करना होगा? वेश्या से क्या यह कहा जायगा कि तुम्हें जो रुचे वही करो? तो वेश्या की बात भी माननी होगी। मान करने पर एक सखी ने कहा था – 'राधिका को अहंकार हुआ है।' वृन्दे ने कहा, "यह 'अहं' किसका है? – यह उन्हीं का अहंकार है – कृष्ण के ही गर्व से वे गर्व करती हैं।"

अब हरिनाम के माहात्म्य की बात हो रही है।

भवनाथ – नाम करने पर मेरी देह हलकी पड़ जाती है।

श्रीरामकृष्ण – वे पाप का हरण करते हैं, इसीलिए उन्हें हरि कहते हैं। वे त्रिताप के हरण करनेवाले हैं।

"और चैतन्य देव ने इस नाम का प्रचार किया था, अतएव अच्छा है। देखो, चैतन्य देव कितने बड़े पण्डित थे और वे अवतार थे। उन्होंने इस नाम का प्रचार किया था, अतएव यह बहुत ही अच्छा है। (हँसते हुए) कुछ किसान एक न्योते में गये थे। भोजन करते समय उनसे पूछा गया, तुम लोग आमड़ें की खटाई खाओगे? उन्होंने कहा, बाबुओं ने अगर उसे खाया हो तो हमें भी देना। मतलब यह कि उन्होंने खाया होगा तो वह चीज अच्छी ही होगी।" (सब हँसते हैं।)

श्रीरामकृष्ण की शिवनाथ शास्त्री से मिलने की इच्छा हुई है। वे मुखर्जियों से कह रहे हैं – 'एक बार शिवनाथ शास्त्री को देखने के लिए जाऊँगा, तुम्हारी गाड़ी से जाऊँगा तो किराया न पड़ेगा।'

मुखर्जी – जो आज्ञा, एक दिन भेज दी जायगी।

श्रीरामकृष्ण – (भक्तों से) – अच्छा, क्या वह हम लोगों को पसन्द करेगा? वे लोग साकारवादियों की कितनी निन्दा करते हैं।

६१०श्रीरामकृष्णवचनामृत१४ सितम्बर, १८८४

श्रीयुत महेन्द्र मुखर्जी तीर्थ-यात्रा करनेवाले हैं? श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं -

(सहास्य) “यह कैसी बात! प्रेम के अंकुर के उगते ही जा रहे हो? अंकुर होगा, फिर पेड़ होगा, तब फल होंगे। तुम्हारे साथ अच्छी बातें हो रही थीं।”

महेन्द्र - जी, जरा इच्छा हुई है, घूम लूँ। फिर जल्द ही आ जाऊँगा।

(४)

भक्तों के संग में

तीसरा पहर ढल गया है। दिन के पाँच बजे होंगे। श्रीरामकृष्ण उठे। भक्तगण बगीचे में टहल रहे हैं। उनमें से कितने ही शीघ्र घर जाने वाले हैं।

श्रीरामकृष्ण उत्तरवाले बरामदे में हाजरा से बातचीत कर रहे हैं। नरेन्द्र आजकल गुहों के बड़े लड़के अन्नदा के पास प्रायः जाया करते हैं।

हाजरा - सुना है, गुहों का लड़का आजकल कठोर साधना कर रहा है। भोजन भी थोड़ा सा ही करता है। चार दिन बाद अन्न खाता है।

श्रीरामकृष्ण - कहते क्या हो! ‘कौन कहे किस भेष से नारायण मिल जाय।’

हाजरा - नरेन्द्र ने स्वागत-गीत गाया था।

श्रीरामकृष्ण - (उत्सुकता से) - कैसा?

किशोर पास खड़ा था।

श्रीरामकृष्ण - तेरी तबियत अच्छी है न?

श्रीरामकृष्ण पश्चिमवाले गोल बरामदे में खड़े हैं। शरत् काल है। फलालैन का गेरुआ कुर्ता पहने हैं और नरेन्द्र से कह रहे हैं - “तूने स्वागत-गीत गाया था?” गोल बरामदे से उतरकर श्रीरामकृष्ण नरेन्द्र के साथ गंगा के बाँध पर आये। साथ मास्टर हैं। नरेन्द्र गा रहे हैं। श्रीरामकृष्ण खड़े हुए सुन रहे हैं। सुनते सुनते उन्हें भावावेश हो रहा है।

अब भी दिन कुछ शेष है। सूर्य भगवान पश्चिम की ओर अभी कुछ दीख पड़ रहे हैं। श्रीरामकृष्ण भाव में डूबे हुए हैं। एक ओर गंगा उत्तर की ओर बही जा रही हैं। अभी कुछ देर से ज्वार का आना शुरू हुआ है। पीछे फुलवाड़ी है। दाहिनी ओर नौबत और पंचवटी दिखायी दे रही हैं। पास में नरेन्द्र खड़े हुए गा रहे हैं। शाम हो गयी।

नरेन्द्र आदि भक्त प्रणाम करके बिदा हो गये। श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में आये। जगन्माता का स्मरण-चिन्तन कर रहे हैं। श्रीयुत यदु मल्लिक पासवाले बगीचे में आज आये हुए हैं। बगीचे में आने पर प्रायः आदमी भेजकर श्रीरामकृष्ण को बुलवा ले जाते हैं। आज भी आदमी भेजा है - श्रीरामकृष्ण जायेंगे। श्रीयुत अधर सेन कलकत्ते से आये और श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया।

श्रीरामकृष्ण श्रीयुत यदु मल्लिक के बगीचे में जायेंगे। लाटू से कह रहे हैं -

१४ सितम्बर, १८८४ परिच्छेद ९० ६११

'लालटेन जला – जरा चलेंगे।'

श्रीरामकृष्ण लाटू के साथ अकेले जा रहे हैं। मास्टर भी साथ हैं।

श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – तुम नारायण को लेते क्यों नहीं आये?

मास्टर कह रहे हैं – "क्या मैं भी साथ चलूँ?"

श्रीरामकृष्ण – चलोगे? अधर आदि सब हैं – अच्छा, चलो। दोनों मुखर्जी भाई रास्ते में खड़े थे। श्रीरामकृष्ण मास्टर से पूछ रहे हैं – "क्या ये लोग भी कोई जायेंगे? (मुखर्जियों से) अच्छा है चलो। तो हम जल्दी चले आ सकेंगे।"

श्रीरामकृष्ण यदु मल्लिक के बैठकखाने में आये। कमरा सजा हुआ था। कमरे में और बरामदे में दीवारगीरें जल रही हैं। श्रीयुत यदुलाल छोटे-छोटे लड़कों को लिये हुए प्रसन्नतापूर्वक दो-एक मित्रों के साथ बैठे हैं। नौकरों में से कोई आज्ञा की प्रतीक्षा कर रहा है, कोई पंखा झल रहा है। यदु बाबू ने हँसकर बैठे हुए श्रीरामकृष्ण से सम्भाषण किया, जैसे पुराने परिचितों का व्यवहार हो।

यदु बाबू गौरांग के भक्त हैं। उन्होंने स्टार थियेटर में चैतन्यलीला देखी थी। श्रीरामकृष्ण से उसी की बातचीत कर रहे हैं। कहा, चैतन्य-लीला का नया अभिनय बड़ा अच्छा हो रहा है।

श्रीरामकृष्ण आनन्दपूर्वक चैतन्यलीला की बातचीत सुन रहे हैं, रह-रहकर यदु बाबू के एक छोटे लड़के का हाथ लेकर खेल कर रहे हैं। मास्टर और दोनों मुखर्जी भाई उनके पास बैठे हुए हैं।

श्रीयुत अधर सेन ने कलकत्ता म्युनिसिपैल्टी के वाईस चेअरमन के पद के लिए बड़ी चेष्टा की थी। उस पद का वेतन हजार रुपया है। अधर डिप्टी मजिस्ट्रेट हैं। तीन सौ रुपया प्रति मास पाते हैं। उम्र तीस साल की होगी।

श्रीरामकृष्ण – (यदु बाबू से) – अधर का तो काम नहीं हुआ।

यदु और उनके मित्र – अधर की उम्र तो अभी ज्यादा नहीं हुई।

कुछ देर बाद यदु कह रहे हैं – 'तुम जरा उनके लिए नाम-जप करो।' श्रीरामकृष्ण गौरांग का भाव गाकर बतला रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण ने कीर्तन के कई गाने गाये।

(५)

राखाल के लिए चिन्ता

गीत के समाप्त हो जाने पर दोनों मुखर्जी भाई उठे। उनके साथ श्रीरामकृष्ण भी उठे। परन्तु भावावेश अब भी है। घर के बरामदे में आकर खड़े होते समाधिमग्न हो गये। बरामदे में कई बत्तियाँ जल रही थीं। बगीचे का दरवान भक्त था। वह श्रीरामकृष्ण को

६१२श्रीरामकृष्णवचनामृत१४ सितम्बर, १८८४

आमन्त्रित करके कभी कभी भोजन कराता था। दरवान श्रीरामकृष्ण को बड़े पंखे से हवा करने लगा।

बगीचे के कर्मचारी श्रीयुत रतन ने आकर श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया।

श्रीरामकृष्ण की प्राकृत अवस्था हो रही है।

उन लोगों से सम्भाषण करते हुए वे 'नारायण-नारायण' उच्चारण कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ ठाकुर-मन्दिर के सदर फाटक तक आये। यहाँ मुखर्जी उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे।

अधर श्रीरामकृष्ण को खोज रहे थे।

श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – इनके (मास्टर के) साथ तुम लोग सदा मिलते रहना और बातचीत करना।

प्रिय मुखर्जी – (सहास्य) – हाँ, ये अब से हमारे मास्टर बने।

श्रीरामकृष्ण – गंजेड़ी का स्वभाव है कि दूसरे गंजेड़ी को देखकर उसे आनन्द होता है। अमीरों के आने पर तो वह बोलता भी नहीं। परन्तु अगर एक अभागा कहीं का गंजेड़ी आ जाय तो उसे गले लगाने लगता है। (सब हँसते हैं।)

श्रीरामकृष्ण बगीचे के रास्ते से पश्चिम की ओर होकर अपने कमरे की ओर जा रहे हैं। रास्ते में कह रहे हैं – 'यदु बड़ा हिन्दू है – भागवत की बहुत सी बातें कहता है।'

मणि कालीमन्दिर में चरणामृत ले रहे हैं। श्रीरामकृष्ण भी वहीं पहुँचे। माता के दर्शन करेंगे।

रात के नौ बजे मुखर्जियों ने प्रणाम करके बिदा ली। अधर और मास्टर जमीन पर बैठे हुए हैं। श्रीरामकृष्ण अधर से राखाल की बातें कर रहे हैं।

राखाल वृन्दावन में हैं, बलराम के साथ। पत्र द्वारा संवाद मिला था, वे बीमार हैं। दो-तीन दिन हुए श्रीरामकृष्ण राखाल की बीमारी का हाल पाकर इतने चिन्तित हो गये थे कि दोपहर की सेवा के समय हाजरा से, क्या होगा, कहकर बालक की तरह रोने लगे थे। अधर ने राखाल को रजिस्ट्री करके चिट्ठी लिखी है। परन्तु अब तक पत्र की स्वीकृति उन्हें नहीं मिली।

श्रीरामकृष्ण – नारायण को पत्र मिला और तुम्हें पत्र का जवाब भी नहीं मिला?

अधर – जी नहीं, अभी तक तो नहीं मिला।

श्रीरामकृष्ण – और मास्टर को भी लिखा है।

श्रीरामकृष्ण – चैतन्य-लीला देखने जायेंगे, इसी सम्बन्ध में बातचीत हो रही है।

श्रीरामकृष्ण – (हँसते हुए) – यदु ने कहा था, एक रुपये वाली जगह से खूब दीख पड़ता है और सस्ता भी है!

"एक बार हम लोगों को पेनेटी ले जाने की बातचीत हुई थी, यदु ने हम लोगों के