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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

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DevanagariHindipublished711 pages

Page 252 of 711

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Page 252

१० जून, १८८३ परिच्छेद ३९ २२९

उतारता था।

“बदचलन औरतों को पहचान सकता था। विधवा है - पर सिर पर सीधी माँग है और बड़ी लगन से शरीर पर तेल की मालिश कर रही है। लज्जा कम, बैठने का ढंग ही दूसरा है।

“रहने दो विषयी लोगों की बातें!”

रामलाल को गाना गाने के लिए कह रहे हैं। रामलाल गा रहे हैं -

(भावार्थ) - “रणांगण में यह कौन मेघवर्ण नारी नाच रही है? मानो रुधिर-सरोवर में नवीन नलिनी तैर रही हो।”

अब रामलाल रावण-वध के बाद मन्दोदरी के विलाप का गाना गा रहे हैं -

(भावार्थ) - “हे कान्त, अबला के प्राणप्रिय, यह तुमने क्या किया! प्राणों का अन्त हुए बिना तो अब शान्ति नहीं मिलेगी! स्वर्णपुरी के सम्राट् होते हुए भी तुम आज धरती पर लेटे हो - यह देखकर भला तुम्हारी भार्या कैसे धीरज धर सकती है! स्वयं यमराज जहाँ दासत्व करें इतना बड़ा आधिपत्य स्वर्ग, मर्त्य, पाताल में और किसी का देखा गया है? जो इन्द्रादि की भी अधिश्वरी थी, वह तुम्हारी रानी आज संसार में भिखारिन बन गयी! उन नवीन जटाधारी वनविहारी को मनुष्य समझने के कारण तुमने सब कुछ खो डाला। स्वयं ब्रह्मा और ईशान जिनके चरणों की अभिलाषा रखते हैं, उन राम को हे राजा, तुमने माना ही नहीं। तुमने तो सुना था कि उनके चरण-स्पर्श से पाषाण भी नारी बन जाता है।”

आखिर का गाना सुनते सुनते श्रीरामकृष्ण आँसू बहा रहे हैं और कह रहे हैं - “मैने झाऊतल्ले में शौच जाते समय सुना था, नाव के माँझी नाव में यही गाना गा रहे हैं। वहाँ जब तक बैठा रहा, केवल रो रहा था। लोग पकड़कर मुझे कमरे में लाए थे।”

फिर गाना चलने लगा -

(भावार्थ) - “सुना है राम तारकब्रह्म हैं, जटाधारी राम मनुष्य नहीं हैं। हे पिताजी, क्या वंश का नाश करने के लिए उनकी सीता को चुराया है?”

अक्रूर श्रीकृष्ण को रथ पर बैठाकर मथुरा ले जा रहे हैं। यह देख गोपियों ने रथचक्रों को जकड़कर पकड़ लिया है और उनमें से कोई कोई रथचक्र के सामने लेट गयी हैं। वे अक्रूर पर दोषारोपण कर रही हैं। वे नहीं जानतीं कि श्रीकृष्ण अपनी ही इच्छा से जा रहे हैं।

(भावार्थ) - “रथचक्र को न पकड़ो, न पकड़ो। क्या रथ चक्र से चलता है? जिनके चक्र से जगत् चलता है वे हरि ही इस चक्र के चक्री है।”

श्रीरामकृष्ण (भक्तों के प्रति) - अहा, गोपियों का यह कैसा प्रेम! श्रीमती राधिका ने अपने हाथ से श्रीकृष्ण का चित्र अंकित किया है, परन्तु पैर नहीं बनाया, कहीं वे वृन्दावन से मथुरा न भाग जाएँ!

“मैं इन सब गानों को बचपन में खूब गाता था। एक एक नाटक सारा का सारा गा