सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

२९ सितम्बर, १८८४ परिच्छेद १४ ६६३

२९ सितम्बर, १८८४ परिच्छेद १४ ६६३

श्रीरामकृष्ण – प्यार तो करना ही चाहिए, क्योंकि सब में परमात्मा का ही वास है, परन्तु जहाँ दुष्टात्मा हों वहाँ दूर से नमस्कार करना ही ठीक है। और चैतन्यदेव? उनके लिए भी एक गाने में है – 'विजातीय लोगों को देखकर प्रभु भाव संवरण करते हैं।' श्रीवास के यहाँ से उनकी सास को बाल पकड़कर निकाल दिया था।

भवनाथ – परन्तु किसी दूसरे ने निकाला था।

श्रीरामकृष्ण – बिना उनकी सम्मति के क्या वह कभी ऐसा कर सकता था?

"किया क्या जाय! अगर दूसरे का मन न मिला, तो क्या रातदिन बैठे हुए इसीकी चिन्ता की जाय? जो मन उन्हें देना चाहिए, उसे इधर-उधर लगाये रखकर उसका व्यर्थ खर्च किया करूँ? मैं कहता हूँ, 'माँ, मैं नरेन्द्र, भवनाथ, राखाल, किसी को नहीं चाहता, मैं तुम्हें चाहता हूँ। आदमी को लेकर मैं क्या करूँ?'

"उन्हें पा लेने पर सब को पा जाऊँगा। रुपया मिट्टी है और मिट्टी ही रुपया, सोना मिट्टी है और मिट्टी ही सोना, यह कहकर मैंने त्याग किया था – गंगाजी में फेंक दिया था। पीछे से डरा कि लक्ष्मीजी को कहीं क्रोध न आ जाय। लक्ष्मी के ऐश्वर्य की मैंने अवज्ञा की, यदि वे मेरी खुराक बन्द कर दें तो? तब कहा, माँ, बस तुम्हें चाहता हूँ और कुछ नहीं। उन्हें पाया तो सब कुछ पा गया।"

भवनाथ – (हँसते हुए) – यह तो चालबाजी है।

श्रीरामकृष्ण – हाँ, उतनी चालबाजी है।

"श्रीठाकुरजी ने किसी को दर्शन देकर कहा, तुम्हारी तपस्या देखकर मैं बहुत प्रसन्न हुआ हूँ। तुम अब कोई वरदान माँगो। साधक ने कहा, 'भगवन्, अगर वरदान दीजियेगा तो यह वर दीजिये – मैं सोने की थाली में अपने पोते के साथ भोजन करूँ।' इस तरह एक वर में बहुत से वर मिल गये। धन हुआ, लडका हुआ और पोता हुआ।" (सब हँसे।)

(५)

श्रीरामकृष्ण की मातृभक्ति। संकीर्तनानन्द

भक्तगण कमरे में बैठे हैं। हाजरा बरामदे में ही बैठे हैं।

श्रीरामकृष्ण – जानते हो, हाजरा क्या चाहता है? कुछ रुपया चाहता है, घर में ऋण है, इसीलिए जप और ध्यान करता है, कहता है, ईश्वर रुपये देंगे।

एक भक्त – क्या वे मनोरथ की पूर्ति नहीं कर सकते?

श्रीरामकृष्ण – यह उनकी इच्छा है। परन्तु प्रेमोन्माद के बिना हुए वे सम्पूर्ण भार नहीं लेते। छोटे बच्चे को, देखो न, हाथ पकड़कर भोजन करने के लिए बैठा देते हैं। बूढ़ों को कौन देता है? उनकी चिन्ता करके जब आदमी खुद अपना भार नहीं ले सकता, तब ईश्वर उसका भार लेते हैं। हाजरा खुद घर की खबर नहीं लेता। हाजरा के लड़के ने

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri

६६४ श्रीरामकृष्णवचनामृत २९ सितम्बर, १८८४

रामलाल से कहा है, ‘बाबा से आने के लिए कहना। हम लोग उनसे कुछ माँगेंगे नहीं।’ उसकी बातें सुनकर मेरी आँखों में आँसू भर आये।

“हाजरा की माँ ने रामलाल से कहा है, ‘प्रताप (हाजरा) से एक बार आने के लिए कहना। और अपने चाचा (श्रीरामकृष्ण) से मेरा नाम लेकर कहना जिससे वे उसे आने के लिए कहें।’ मैंने हाजरा से कहा; उसने कुछ ध्यान ही नहीं दिया।

“माँ का स्थान कितना ऊँचा है! चैतन्यदेव ने कितना समझाया था, तब माँ के पास से आ सके थे। शची ने कहा था, ‘मैं केशव भारती को काट डालूँगी!’ चैतन्यदेव ने बहुत तरह से समझाया। कहा, ‘माँ, तुम्हारी आज्ञा जब तक न होगी, तब तक मैं न जाऊँगा; परन्तु अगर मुझे संसार में रखोगी, तो मेरा शरीर न रह जायगा। और माँ जब तुम मेरी याद करोगी, तभी मैं तुमसे मिलूँगा। मैं पास ही रहा करूँगा। कभी कभी तुमसे मिल जाया करूँगा।’ तब शची ने आज्ञा दी।

“माँ जब तक थीं, तब तक नारद तपस्या के लिए नहीं निकल सके। माता की सेवा करते थे न? माता की देह छूट जाने पर वे साधना के लिए निकले थे।

“वृन्दावन जाकर फिर वहाँ से मेरी लौटने की इच्छा ही नहीं हुई। गंगा माँ के पास रहने का विचार हुआ। सब ठीक हो गया कि इस ओर मेरा बिस्तरा लगाया जायगा, उस ओर गंगा माँ का। अब कलकत्ता न जाऊँगा। केवट का अन्न और कितने दिन खाऊँ? तब हृदय ने कहा, नहीं, तुम कलकत्ता चलो। एक ओर वह खींचता था, एक ओर गंगा माँ। मेरी तो रहने की इच्छा अधिक थी; इसी समय माँ की याद आ गयी। बस सब ठाट बदल गया। माँ बुड्ढी हो गयी थीं। सोचा, माँ की चिन्ता करने लगूँगा तो ईश्वर-फीश्वर का भाव सब उड़ जायगा। अतएव माँ के पास ही चलकर रहना चाहिए। वहीं जाकर ईश्वरचिन्ता करूँगा, निश्चिन्त होकर।

(नरेन्द्र से) “तुम जरा उससे कहो न। मुझसे उस दिन कहा था कि देश जायेगा, जाकर तीन दिन रहेगा। परन्तु फिर ज्यों का त्यों हो गया।

(भक्तों से) “आज घोषपाड़ा-फोसपाड़ा की कैसी सब वाहियात बातें हुईं। गोविन्द! गोविन्द! गोविन्द! अब जरा ईश्वर का नाम लो। उड़द की दाल के बाद पायस-लड्डू हो जाय।”

नरेन्द्र गा रहे हैं।

“निरंजन पुरातन पुरुष एक हैं, अरे तू उन पर अपने चित्त को लगा दे। वे आदि-सत्य हैं, वे कारण (माया) के भी कारण हैं। प्राणरूप से वे चराचर में व्याप्त हैं। वे स्वतः प्रकाशित और ज्योतिर्मय हैं। सब के आश्रय हैं। जिसका उन पर विश्वास होता है, वह उनके दर्शन करता है। वे अतीन्द्रिय भूमि में रहते हैं, नित्य और चैतन्यस्वरूप हैं।” इत्यादि।

नरेन्द्र एक गाना और गा रहे हैं। श्रीरामकृष्ण उठकर नाचने लगे। उन्हें घेरकर

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar