श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
२० जून, १८८४ | परिच्छेद ८३ | ५२७
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| २० जून, १८८४ | परिच्छेद ८३ | ५२७ |
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“परन्तु मैं, खींच-खाँचकर बाबूराम को भी नहीं लाना चाहता। घर में गुल-गपाड़ा मच सकता है। (सहास्य) मैं जब कहता हूँ, चला क्यों नहीं आता, तब बार बार कहता है, आप कुछ ऐसा ही कर दीजिये जिससे मैं आ सकूँ। राखाल को देखकर रोता है, कहता है, वह मजे में है।
“राखाल अब घर के बच्चे की तरह रहता है। जानता हूँ, अब वह आसक्ति में पड़ नहीं सकता। कहता है, 'वह सब फीका लगता है।' उसकी स्त्री यहाँ आयी थी। उम्र १४ साल की है। यहाँ होकर कोन्नगर गयी थी। उन लोगों ने उससे (राखाल से) कोन्नगर जाने को कहा, पर वह न गया। कहता है – आमोद-प्रमोद अब अच्छा नहीं लगता। अच्छा, निरंजन को तुम क्या समझते हो?”
मास्टर – जी, बड़े अच्छे चेहरे-मोहरे का है।
श्रीरामकृष्ण – नहीं, सिर्फ चेहरा-मोहरा नहीं। सरल है। सरल होने पर सहज ही ईश्वर को लोग पा जाते हैं। सरल होने पर उपदेश भी शीघ्र सफल हो जाता है। जोती हुई जमीन, कंकड़ का नाम नहीं, बीज पड़ते ही पेड़ उग जाता है। फल भी शीघ्र आ जाते हैं।
“निरंजन विवाह न करेगा। तुम क्या कहते हो? कामिनी और कांचन, ये ही बाँधते हैं न?”
मास्टर – जी हाँ।
श्रीरामकृष्ण – पान-तम्बाकू के छोड़ने से क्या होगा? कामिनी और कांचन का त्याग ही त्याग है।
“भाव में मैंने देखा, यद्यपि वह नौकरी करता है, फिर भी उसे दोष स्पर्श नहीं कर सका। माँ के लिए नौकरी करता है, इसमें दोष नहीं है।
“तुम जो काम करते हो, इसमें दोष नहीं है। यह अच्छा काम है।
“नौकरी करके जेल गया, बद्ध हुआ, बेड़ियाँ पहनीं, फिर मुक्त हुआ। मुक्त होने के बाद क्या वह नाचने-कूदने लगता है? नहीं, वह फिर नौकरी करता है। इसी प्रकार तुम्हारी भी इच्छा स्वयं के लिए कोई धन-संचय करने की नहीं है – ठीक है – तुम्हें तो केवल अपने कुटुम्ब के निर्वाह के लिए ही चिन्ता है – नहीं तो सचमुच वे और कहाँ जायें?”
मणि – यदि कोई उनकी जिम्मेदारी ले ले तो मैं निश्चिन्त हो जाऊँ।
श्रीरामकृष्ण – ठीक है, परन्तु अभी यह भी करो और वह भी करो – अर्थात् संसार के कर्तव्य भी करो और आध्यात्मिक साधना भी।
मणि – सब कुछ त्याग सकना बड़े भाग्य की बात है।
श्रीरामकृष्ण – ठीक है। परन्तु जैसे जिसके संस्कार। तुम्हारा कुछ कर्म अभी बाकी है। उतना हो जाने पर शान्ति होगी, तब तुम्हें वह छोड़ देगा। अस्पताल में नाम लिखाने
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५२८ श्रीरामकृष्णवचनामृत २० जून, १८८४.
पर फिर सहज ही नहीं छोड़ते। बिलकुल अच्छे हो जाने पर छोड़ते हैं।
“यहाँ जो भक्त आते हैं, उनके दो दर्जे हैं। जो एक दर्जे के हैं वे कहते हैं, ‘हे ईश्वर, हमारा उद्धार करो।’ दूसरे दर्जेवाले अन्तरंग हैं, वे यह बात नहीं कहते। दो बातें जानने से ही उनकी बन जाती है। एक तो यह कि मैं (श्रीरामकृष्ण) कौन हूँ, दूसरी यह कि वे कौन हैं - मुझसे उनका क्या सम्बन्ध है।
“तुम इस श्रेणी के हो। नहीं तो और कोई क्या इतना कर सकता था!
“भवनाथ, बाबूराम का प्रकृतिभाव है। हरीश स्त्रियों का कपड़ा पहनकर सोता है। बाबूराम ने भी कहा है, मुझे वही भाव अच्छा लगता है। बस मिल गया। यही भाव भवनाथ का भी है। नरेन्द्र, राखाल, निरंजन, इन लोगों का पुरुष-भाव है।
“अच्छा, हाथ टूटने का क्या अर्थ है? पहले एक बार भावावस्था में दाँत टूट गया था। अबकी बार भावावस्था में हाथ टूट गया।”
मणि को चुपचाप बैठे देखकर श्रीरामकृष्ण आप ही आप कह रहे हैं -
“हाथ टूटा सब अहंकार निर्मूल करने के लिए। अब भीतर ‘मैं’ कहीं खोजने पर भी नहीं मिलता। खोजने को जब जाता हूँ तो देखता हूँ वे हैं। पूर्ण रूप से अहंकार नष्ट हुए बिना उन्हें कोई पा नहीं सकता।
“चातक को देखो, मिट्टी में रहता है, पर कितने ऊँचे पर चढ़ता है।
“कभी-कभी देह काँपने लगती है कि कहीं विभूतियाँ न आ जायँ। इस समय अगर विभूतियों का आना हुआ तो यहाँ अस्पताल-दवाखाने खुल जायेंगे। लोग आकर कहेंगे, मेरी बीमारी अच्छी कर दो। क्या विभूतियाँ अच्छी होती हैं?”
मास्टर – जी नहीं, आपने तो कहा है, आठ विभूतियों में से एक के भी रहने पर ईश्वर नहीं मिल सकते।
श्रीरामकृष्ण – बिलकुल ठीक, जो हीनबुद्धि हैं वे ही विभूतियाँ चाहते हैं।
“जो आदमी बड़े आदमी के पास कुछ प्रार्थना कर बैठता है, उसकी फिर खातिरदारी नहीं होती, उसे फिर एक ही गाड़ी पर, बड़े आदमी के साथ चढ़ने का सौभाग्य नहीं होता; यदि उसे वह चढ़ाता भी है, तो पास बैठने नहीं देता। इसीलिए निष्काम भक्ति, अहैतुकी भक्ति सब से अच्छी होती है।
साकार निराकार दोनों ही सत्य हैं
“अच्छा, साकार और निराकार दोनों सत्य हैं - क्यों? निराकार में मन अधिक देर तक नहीं रहता, इसीलिए भक्त साकार को लेकर रहते हैं।
“कप्तान ठीक कहता है, चिड़िया ऊपर उड़ती हुई जब थक जाती है, तब फिर डाल पर आकर विश्राम करती है। निराकार के बाद साकार।