श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
२७ अक्टूबर, १८८२ | परिच्छेद १३ | ८९
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२७ अक्टूबर, १८८२ | परिच्छेद १३ | ८९
बहाते हैं, ईश्वर के लिए भला कौन रोता है? बीच बीच में निर्जन में रहकर भगवत्प्राप्ति के लिए साधना करनी चाहिए। संसार के भीतर, विशेषकर कामकाज की झंझट में रहकर प्रथम अवस्था में मन को स्थिर करते समय अनेक बाधाएँ आती हैं। जैसे रास्ते के किनारे लगाया हुआ पेड़; जिस समय वह पौधे की स्थिति में रहता है, उस समय घेरा न लगाने पर गाय-बकरियाँ खा जाती हैं। प्रथम अवस्था में घेरा। किन्तु बादमें तना मजबूत होने पर घेरेकी आवश्यकता नही रहती। फिर उसे हाथी बांधनेपर भी कुछ नहीं होता।
“रोग तो हुआ है सन्निपात का। पर जिस कमरे में सन्निपात का रोगी है, उसी कमरे में पानी का घड़ा और इमली का अचार रखा है। अगर रोगी को आराम पहुँचाना चाहते हो तो पहले उसे उस कमरे से हटाना होगा। संसारी जीव मानो सन्निपात का रोगी है; और विषय है पानी का घड़ा। विषयभोगतृष्णा मानो जलतृष्णा है। इमली, अचार की बात सिर्फ सोचते ही मुँह में पानी आ जाता है, वे चीजें पास नहीं लानी पड़तीं। ऐसी चीज रोगी के कमरे में ही रखी है। संसार में स्त्री-सहवास ऐसी ही चीज है। इसीलिए निर्जन में जाकर चिकित्सा कराना आवश्यक है।
“विवेक-वैराग्य प्राप्त करके संसार में प्रवेश करना चाहिए। संसारसमुद्र में काम-क्रोधादि मगर हैं। बदन में हल्दी मलकर पानी में उतरने पर मगर का डर नहीं रहता। विवेक-वैराग्य ही हल्दी है। सदसत्-विचार का नाम विवेक है। ईश्वर ही सत् हैं, नित्यवस्तु हैं बाकी सब असत् अनित्य, दो दिन के लिए है – यह बोध ही विवेक है। और ईश्वर के प्रति अनुराग चाहिए, प्रेम, आकर्षण चाहिए – जैसा गोपियों का कृष्ण के प्रति था। एक गाना सुनो –
(भावार्थ) – “विपिन में बंसी बज उठी। मुझे तो जाना ही होगा, श्याम मेरी राह देख रहा है। तुम लोग चलोगी या नहीं, बताओ। तुम लोगों के लिए श्याम एक नाम है, पर सखि, मेरे लिए श्याम हृदय की व्यथा है। बंसी तुम्हारे कान में बजती है, पर मेरे तो वह हृदय में बजती है। श्याम की बंसी बज रही है। हे राधे, अब चलो, तुम्हारे बिना कुंज में शोभा नहीं आती।”
श्रीरामकृष्ण ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से यह गीत गाते गाते केशव आदि भक्तों से कहा, “राधाकृष्ण को मानो या न मानो, पर उनके इस आकर्षण को तो ग्रहण करो! ईश्वर के लिए इस प्रकार की व्याकुलता हो, इसके लिए प्रयत्न करो। व्याकुलता के आते ही उन्हें प्राप्त किया जा सकता है।”
(७)
संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः॥ (गीता, १२।४)
CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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९० श्रीरामकृष्णवचनामृत २७ अक्टूबर, १८८२
भाटा शुरू हो गया। जहाज कलकत्ते की ओर द्रुतगति से बढ़ रहा है। इसलिए पुल पार कर कम्पनी के बगीचे की ओर और थोड़ी दूर तक ले जाने के लिए कप्तान को आदेश दिया गया। जहाज कितनी दूर आ पहुँचा है, इसकी अधिकांश लोगों को सुध नहीं है। वे मग्न होकर श्रीरामकृष्ण की बातें सुन रहे हैं। समय कैसे चला जा रहा है, इसका होश नहीं है।
अब मुरमुरे और नारियल के टुकड़े बाँटे गए। सब ने थोड़ा थोड़ा लेकर खाना शुरू किया। आनन्द की हाट लगी है। केशव ने मुरमुरे आदि लाने की व्यवस्था की थी। ऐसे समय श्रीरामकृष्ण के ध्यान में आया कि विजय और केशव दोनों ही संकुचित होकर बैठे हुए हैं। तब जिस प्रकार दो नादान बच्चों में झगड़ा हो जाने पर कोई बड़ा व्यक्ति समझौता करा देता है, उसी प्रकार श्रीरामकृष्ण उन दोनों के बीच समझौता कराने लगे। ‘सर्वभूतहिते रत।’
श्रीरामकृष्ण (केशव के प्रति) – अजी! ये विजय आए हैं। तुम लोगों का झगड़ा-विवाद मानो शिव और राम की लड़ाई है। राम के गुरु शिव हैं। दोनों में युद्ध भी हुआ, फिर सन्धि भी हो गयी। पर शिव के भूतप्रेत और राम के बन्दर ऐसे थे कि उनका झगड़ना किचकिचाना रुकता ही न था। (सब जोर से हँस पड़े।)
“अपने ही लोग हैं। ऐसा होता ही है। लव-कुश ने भी राम के साथ युद्ध किया था। फिर जानते हो न माँ और बेटी अलग से मंगलवार का व्रत रखती हैं, मानो माँ का मंगल और बेटी का मंगल अलग अलग है। परन्तु वास्तव में तो माँ के मंगल से बेटी का मंगल होता है और बेटी के मंगल से माँ का। इसी तरह तुममें से एक के एक समाज है, अब दूसरे को भी एक चाहिए। (सब हँसते हैं।) पर यह सब जरूरी है। तुम कहोगे कि जहाँ भगवान् ने स्वयं लीला की, वहाँ जटिला-कुटिला की क्या जरूरत थी ? पर जटिला-कुटिला के सिवा लीला पुष्ट नहीं हो पाती। बिना उनके रंग नहीं चढ़ता। (सब जोर से हँसते हैं।)
‘रामानुज विशिष्टाद्वैतवादी थे। उनके गुरु थे अद्वैतवादी। आखिर दोनों में अनबन होने लगी। गुरु-शिष्य आपस में एक दूसरे के मत का खण्डन करने लगे। ऐसा हुआ करता है। चाहे जो कुछ हो, फिर भी हैं तो अपने ही।”
(८)
पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान्।
न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव।। (गीता, ११।४३)
गुरुगिरी और ब्राह्मसमाज। एक सच्चिदानन्द ही गुरु हैं।
सब लोग आनन्दित हैं। श्रीरामकृष्ण केशव से कहते हैं, “तुम स्वभाव परखकर