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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

३० दिसम्बर, १८८३ | परिच्छेद ७२ | ४२१

३० दिसम्बर, १८८३ | परिच्छेद ७२ | ४२१

केदार श्रीरामकृष्ण के भाव के अनुरूप एक गीत गाते हैं -

(भावार्थ) – “सखि, मन की बात कैसे कहूँ? कहने की मनाई है। दर्द को समझनेवाले के बिना प्राण कैसे बच सकेंगे! जो मन का मीत होता है वह देखते ही पहचान में आ जाता है। वह विरला ही होता है।...”

श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में लौट आए हैं। चार बजे का समय है - कालीमन्दिर खुल गया। श्रीरामकृष्ण साधु को लेकर कालीमन्दिर जा रहे हैं। मणि भी साथ हैं।

कालीमन्दिर में प्रवेश कर श्रीरामकृष्ण भक्तिपूर्वक माता को प्रणाम कर रहे हैं। साधु भी हाथ जोड़कर सिर झुका माता को बारम्बार प्रणाम कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – क्यों जी, दर्शन कैसे हुए?

साधु (भक्तिभाव से) – काली प्रधान है।

श्रीरामकृष्ण – काली और ब्रह्म दोनों अभेद हैं। क्यों जी?

साधु – जब तक बहिर्मुख है तब तक काली को मानना होगा। जब तक बहिर्मुख है तब तक भले बुरे दोनों भाव हैं - तब तक एक प्रिय और दूसरा त्याज्य, यह भाव है ही।

“देखिये न, नाम और रूप ये सब तो मिथ्या ही हैं, परन्तु जब तक मैं बहिर्मुख हूँ तब तक मुझे स्त्रियों को त्याज्य समझना चाहिए। और उपदेश के लिए 'यह अच्छा है, यह बुरा है' यह भाव रखना चाहिए - नहीं तो भ्रष्टाचार फैलेगा।”

श्रीरामकृष्ण साधु के साथ बातचीत करते हुए कमरे में लौटे।

श्रीरामकृष्ण – देखा, साधु ने कालीमन्दिर में प्रणाम किया।

मणि – जी हाँ।

(३)

दूसरे दिन सोमवार, ३१ दिसम्बर है। दिन का तीसरा पहर, चार बजे का समय होगा। श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ कमरे में बैठे हुए हैं। बलराम, मणि, राखाल, लाटू, हरीश आदि भक्त भी हैं। श्रीरामकृष्ण मणि और बलराम से कह रहे हैं -

“हलधारी का ज्ञानियों जैसा भाव था। वह अध्यात्मरामायण, उपनिषद् – यही सब दिनरात पढ़ता था। इधर साकार की बातों से मुँह फेरता था। मैंने जब कंगालों के भोजन कर जाने पर उनकी पत्तलों से थोड़ा थोड़ा अन्न लेकर खाया, तब उसने कहा, 'तेरे लड़कों का विवाह कैसे होगा?' मैंने कहा, 'क्यों रे साला, मेरे लड़के-बच्चे भी होंगे! आग लगे तेरे गीता और वेदान्त पढ़ने में!' देखो न, इधर तो कहता है – संसार मिथ्या है और फिर विष्णुमन्दिर में नाक सिकोड़कर ध्यान!”

शाम हो गयी है। बलराम आदि भक्त कलकत्ता चले गये हैं। श्रीरामकृष्ण अपने

४२२ श्रीरामकृष्णवचनामृत · ३० दिसम्बर, १८८३

कमरे में बैठे हुए माता का चिन्तन कर रहे हैं। कुछ देर बाद मन्दिर में आरती का मधुर शब्द सुनायी पड़ने लगा।

रात के आठ बज चुके हैं। श्रीरामकृष्ण भाव में आकर मधुर स्वर से माता के साथ वार्तालाप कर रहे हैं। मणि जमीन पर बैठे हुए हैं।

श्रीरामकृष्ण मधुर कण्ठ से नामोच्चारण कर रहे हैं – “हरि ॐ! हरि ॐ! हरि ॐ!”

माँ से कह रहे हैं – “माँ! ब्रह्मज्ञान देकर मुझे बेहोश न कर रखना। मैं ब्रह्मज्ञान नहीं चाहता माँ! मैं आनन्द करूँगा! विलास करूँगा!”

फिर कहते हैं – “माँ, मैं वेदान्त नहीं जानता – जानना भी नहीं चाहता! माँ, तुझे पाने पर वेद-वेदान्त कितने नीचे पड़े रहते हैं!”

“अरे कृष्ण! मैं तुझे कहूँगा, ‘यह ले – खा ले – बच्चे!’ कृष्ण! कहूँगा, ‘तू मेरे ही लिए देहधारण करके आया है।’ ”