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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

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DevanagariHindipublished711 pages

Page 257 of 711

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Page 257

२३४ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | १० जून, १८८३

घृणा, भय, जाति, कुल, शील, शोक, जुगुप्सा (निन्दा) – ये आठ पाश हैं।* जब तक गुरु खोल नहीं देते, तब तक कुछ नहीं होता।”

(४)

सच्चे भक्त के लक्षण। व्याकुल होकर प्रार्थना करो। हठयोग : तथा राजयोग

बेलघर के भक्त – आप हम पर कृपा कीजिये।

श्रीरामकृष्ण – सभी के भीतर वे विद्यमान हैं, परन्तु गैस कम्पनी में अर्जी दो – तुम्हारे घर के साथ संयोग हो जाएगा।

“परन्तु व्याकुल होकर प्रार्थना करनी होगी। कहावत है, तीन प्रकार के प्रेम के आकर्षण एक साथ होने पर ईश्वर का दर्शन होता है, – सन्तान पर माता का प्रेम, सती स्त्री का स्वामी पर प्रेम और विषयी जीवों का विषय पर प्रेम।

“सच्चे भक्त के कुछ लक्षण हैं। वह गुरु का उपदेश सुनकर स्थिर हो जाता है; सँपेरे के संगीत को साधारण विषधर साँप स्थिर होकर सुनता है, परन्तु नाग नहीं। और दूसरा लक्षण, – सच्चे भक्त की धारणा-शक्ति होती है। केवल काँच पर चित्र खींचा नहीं जाता, किन्तु रसायनयुक्त काँच पर खींचा जाता है। जैसा फोटोग्राफ। भक्ति है वह रासायनिक द्रव्य।

“एक लक्षण और है। सच्चा भक्त जितेन्द्रिय होता है, कामजयी होता है। गोपियों में काम का संचार नहीं होता था।

“तुम लोग गृहस्थी में हो, रहो न, इससे साधन-भजन में और भी सुविधा है, मानो किले में से युद्ध करना। जिस समय शवसाधन करते हैं उस समय बीच बीच में शव मुँह खोलकर डराता है। इसलिए भुना हुआ चावल-चना रखना पड़ता है और उसके मुख में बीच बीच में देना पड़ता है। शव के शान्त होने पर निश्चिन्त होकर जप कर सकोगे। इसलिए घरवालों को शान्त रखना चाहिए। उनके खाने-पीने की व्यवस्था कर देनी पड़ती है, तब साधन-भजन की सुविधा होती है।

“जिनका भोग अभी कुछ बाकी है, वे गृहस्थी में रहकर ही ईश्वर का नाम लेंगे। नित्यानन्द कहा करते थे, ‘मागुर मांछेर झोल, युवती नारीर कोल, बोल हरि बोल!’ – हरिनाम लेने से मागुर मछली की रसदार तरकारी तथा युवती नारी तुम्हें मिलेगी।

“सच्चे त्यागी की बात अलग है। मधुमक्खी फूल के अतिरिक्त और किसी पर भी नहीं बैठेगी। चातक की दृष्टि में सभी जल निःस्वाद हैं। वह दूसरे किसी भी जल को नहीं


* घृणा लज्जा भयं शंका जुगुप्सा चेति पंचमी।
कुलं शीलं तथा जातिरष्टौ पाशाः प्रकीर्तिताः।। – कुलार्णवतन्त्र