श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
२२ जुलाई, १८८३ | परिच्छेद ४७ | २७५
२२ जुलाई, १८८३ | परिच्छेद ४७ | २७५
“उत्तम भक्त कौन है? जो ब्रह्मज्ञान के बाद देखता है कि ईश्वर ही जीव, जगत् और चौबीस तत्त्व हुए हैं। पहले ‘नेति नेति’ (यह नहीं, यह नहीं) करके विचार करते हुए छत पर पहुँचना पडता है। फिर वही आदमी देखता है कि छत जिन चीजों - ईंट, चूने और सुरखी - से बनी है, सीढ़ी भी उन्हीं से बनी है। तब वह देखता है कि ब्रह्म ही जीव, जगत और सब कुछ है।
“केवल शुष्क विचार! मैं उस पर थूकता हूँ। (आप जमीन पर थूकते हैं।)
“क्यों विचार कर शुष्क बना रहूँगा! जब तक ‘मैं’ और ‘तुम’ है, तब तक प्रार्थना है कि ईश्वर के चरणकमलों में शुद्धा भक्ति बनी रहे।
(गोविन्द से) “कभी कहता हूँ, तुम्हीं ‘मैं’ हो और ‘मैं’ ही ‘तुम’ हूँ। फिर कभी ‘तुम्हीं तुम हो’ - ऐसा हो जाता है! इस समय अपने अहं को ढूँढ़ नहीं पाता।
“शक्ति का ही अवतार होता है। एक मत से राम और कृष्ण चिदानन्द समुद्र की दो लहरें हैं।
“अद्वैतज्ञान के बाद चैतन्य होता है। तब मनुष्य देखता है कि ईश्वर ही सब प्राणियों में चैतन्य रूप से विद्यमान हैं। चैतन्यलाभ के बाद आनन्द होता है - ‘अद्वैत-चैतन्य-नित्यानन्द’।*
(मास्टर से) “और तुमसे कहता हूँ - ईश्वर के रूप पर अविश्वास मत करना। यह विश्वास करना कि ईश्वर के रूप हैं, फिर जो रूप तुम्हें पसन्द हो उसी का ध्यान करना।
(गोविन्द से) “बात यह है कि जब तक भोग-वासना बनी रहती है, तब तक ईश्वर को जानने या उनके दर्शन करने के लिए प्राण व्याकुल नहीं होते। बच्चा खेल में मग्न रहता है। मिठाई देकर बहलाओ तो थोड़ीसी खा लेगा। जब उसे न खेल अच्छा लगता है न मिठाई, तब वह कहता है, ‘माँ के पास जाऊँगा।’ फिर वह मिठाई नहीं चाहता। अगर कोई आदमी, जिसे उसने न कभी देखा है और न पहचानता है, आकर कहे, ‘आ, तुझे माँ के पास ले चलूँ’, तो वह उसके साथ चला जाएगा। जो कोई उसे गोद में बिठाकर ले जायगा, वह उसी के साथ जाएगा।
“संसार के भोग समाप्त हो जाने के बाद ईश्वर के लिए प्राण व्याकुल होते हैं। उस समय केवल एक चिन्ता रहती है कि किस तरह उन्हें पाऊँ। उस समय जो जैसा बताता है, मनुष्य वैसा ही करने लगता है।”
मास्टर (स्वगत) - भोगवासना समाप्त हो चुकने के बाद ही ईश्वर के लिए प्राण व्याकुल होते हैं।
* पन्द्रहवीं शताब्दी में नदिया में तीन महापुरुष भी इन्हीं नामों के हुए थे। उनमें श्रीचैतन्य भगवान् के अवतार समझे जाते हैं। शेष दो उनके पार्षद थे।
२७६ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २२ जुलाई, १८८३
(४)
समाधि में जगन्माता के साथ वार्तालाप
एक दूसरे दिन श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर में अपने कमरे के दक्षिणपूर्ववाले बरामदे की सीढ़ी पर बैठे हैं। साथ में राखाल, मास्टर तथा हाजरा हैं। श्रीरामकृष्ण हँसी हँसी में बचपन की अनेक बातें कह रहे हैं।
सायंकाल हुआ। श्रीरामकृष्ण समाधिमग्न हैं। अपने कमरे में छोटे तख्त पर बैठे जगन्माता के साथ वार्तालाप कर रहे हैं। कह रहे हैं, “माँ, तू इतना झमेला क्यों करती है? माँ, क्या मैं वहाँ पर जाऊँ? यदि तू ले जाएगी तो जाऊँगा।”
श्रीरामकृष्ण का किसी भक्त के घर पर जाना तय हुआ था। क्या वे इसीलिए जगन्माता की आज्ञा के लिए इस प्रकार कह रहे हैं?
जगन्माता के साथ श्रीरामकृष्ण फिर वार्तालाप कर रहे हैं। सम्भव है अब किसी अन्तरंग भक्त के लिए प्रार्थना कर रहे हैं। कह रहे हैं, “माँ, उसे शुद्ध बना दो। अच्छा माँ, उसे एक कला क्यों दी?”
श्रीरामकृष्ण कुछ देर चुप हैं। फिर कह रहे हैं, “ओफ! समझा। इसी से तेरा काम होगा।” सोलह कलाओ में से एक कला शक्ति द्वारा तेरा काम अर्थात् लोकशिक्षा होगी - क्या श्रीरामकृष्ण यही कह रहे हैं?
अब भावविभोर स्थिति में मास्टर आदि से आद्याशक्ति तथा अवतार-तत्त्व के सम्बन्ध में कह रहे हैं -
“जो ब्रह्म है, वही शक्ति है। मैं उन्हीं को माँ कहकर पुकारता हूँ। जब वे निष्क्रिय रहते हैं तब उन्हें ब्रह्म कहते हैं, और जब वे सृष्टि, स्थिति, संहार कार्य करते हैं, तब उन्हें शक्ति कहते हैं। जिस प्रकार स्थिर जल और हिलता-डुलता जल। शक्ति की लीला से ही अवतार होते हैं। अवतार प्रेम-भक्ति सिखाने आते हैं। अवतार मानो गाय का स्तन है। दूध स्तन से ही मिलता है। मनुष्य रूप में वे अवतीर्ण होते हैं।”
कोई कोई भक्त सोच रहे हैं, क्या श्रीरामकृष्ण अवतारी पुरुष हैं, जैसे श्रीकृष्ण, चैतन्यदेव, ईसा?
□ □ □