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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

१ जनवरी, १८८३ | परिच्छेद २२ | १४५

१ जनवरी, १८८३ | परिच्छेद २२ | १४५

कहना पड़ता है कि मन ही में त्याग करो। अभ्यासयोग से कामिनी-कांचन में आसक्ति का त्याग होता है - यह बात गीता में है। अभ्यास से मन में असाधारण शक्ति आ जाती है। तब इन्द्रियसंयम करने और काम-क्रोध को वश में लाने में कष्ट नहीं उठाना पड़ता। जैसे कछुआ पैर समेट लेने पर फिर बाहर नहीं निकालना चाहता - कुल्हाड़ी से टुकड़े टुकड़े कर डालने पर भी बाहर नहीं निकालता।”

मारवाड़ी भक्त – महाराज, आपने दो रास्ते बतलाये। दूसरा कौनसा है?

श्रीरामकृष्ण – वह अनुराग या भक्ति का मार्ग है। व्याकुल होकर एक बार निर्जन में अकेले में दर्शन की प्रार्थना करते हुए रोओ।

“ऐ मन, जैसे पुकारा जाता है उस तरह तुम पुकारो तो सही, फिर देखो भला तुम्हें छोड़कर माँ श्यामा कैसे रह सकती हैं?”

मारवाड़ी भक्त – महाराज, साकार-पूजा का क्या अर्थ है? और निराकार-निर्गुण का क्या मतलब है?

श्रीरामकृष्ण – जैसे पिता का फोटोग्राफ देखने से पिता की याद आती है, वैसे ही प्रतिमा की पूजा करते करते सत्य के रूप की उद्दीपना होती है।

“साकार रूप कैसा है जानते हो? जैसे जलराशि से बुलबुले निकलते हैं, वैसा ही। महाकाश चिदाकाश से एक एक रूप आविर्भूत होते हुए दीख पड़ते हैं। अवतार भी एक रूप ही है। अवतार-लीला भी आद्याशक्ति ही की क्रीड़ा है।

पाण्डित्य – मैं कौन? मैं ही तुम

“पाण्डित्य में क्या रखा है? व्याकुल होकर पुकारने पर वे मिलते हैं। नाना विषयों का ज्ञान प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं।

“जो आचार्य हैं उन्हीं को कई विषयों का ज्ञान रखना चाहिए। दूसरों को मारने के लिए ढाल-तलवार की जरूरत होती है, परन्तु अपने को मारने के लिए एक सुई या नहरनी ही से काम चल सकता है।

“मैं कौन हूँ, इसकी ढूँढ़-तलाश करने के लिए चलो तो उन्हीं के निकट जाना पड़ता है। क्या मैं मांस हूँ? या हाड़, रक्त या मज्जा हूँ? मन या बुद्धि हूँ? अन्त में विचार करते हुए देखा जाता है कि मैं यह सब कुछ नहीं हूँ। 'नेति' 'नेति'। आत्मा वह चीज नहीं कि पकड़ में आ जाय। वह निर्गुण और निरूपाधि है।

“परन्तु भक्तिमत से वे सगुण हैं। चिन्मय श्याम, चिन्मय धाम – सब चिन्मय!”

मारवाड़ी भक्तगण प्रणाम करके बिदा हुए।

दक्षिनेश्वर में सन्ध्या और आरती

सन्ध्या हो गयी। श्रीरामकृष्ण गंगा-दर्शन कर रहे हैं। कमरे में दीपक जलाया गया।

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१४६ श्रीरामकृष्णवचनामृत १ जनवरी, १८८३

श्रीरामकृष्ण जगन्माता का नामस्मरण कर रहे हैं और अपनी खाट पर बैठे हुए उन्हीं के ध्यान में मग्न हैं!

श्रीमन्दिर में अब आरती होने लगी। जो लोग इस समय भी गंगा के किनारे या पंचवटी में घूम रहे हैं, वे दूर से आरती की मधुर घण्टाध्वनि सुन रहे हैं। ज्वार आ गयी है, भागीरथी कलकल स्वर से उत्तर की ओर बह रही हैं। आरती का मधुर शब्द इस 'कल-कल' ध्वनि से मिलकर और भी मधुर हो गया है। इस माधुर्य के भीतर प्रेमोन्मत्त श्रीरामकृष्ण बैठे हुए हैं। सब कुछ मधुर है! हृदय भी मधुमय हो रहा है!

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CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar