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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

२० जून, १८८४ | परिच्छेद ८३ | ५२९

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri

२० जून, १८८४परिच्छेद ८३५२९

"तुम्हारे अड्डे में एक बार जाना होगा। भावावस्था में देखा – अधर का घर, सुरेन्द्र का घर, बलराम का घर – ये सब मेरे अड्डे हैं।

"वे यहाँ आयें या न आयें, मुझे इसका हर्ष-दुःख नहीं।"

मास्टर – जी, ऐसा क्यों होगा? सुख का बोध होने से ही तो दुःख होता है। आप सुख और दुःख के अतीत हैं।

श्रीरामकृष्ण – हाँ, और मैं देख रहा हूँ, बाजीगर और उसका खेल। बाजीगर ही नित्य है और उसका खेल अनित्य – स्वप्नवत्।

"जब चण्डी सुनता था, तब यह बोध हुआ था। शुम्भ और निशुम्भ का जन्म हुआ, थोड़ी ही देर में सुना, उनका विनाश हो गया।"

मास्टर – जी, मैं कालना में गंगाधर के साथ जहाज पर जा रहा था। जहाज के धक्के से एक नाव उलट गयी, उस पर २०-२५ आदमी सवार थे। सब डूब गये। जहाज के पीछे उठनेवाली तरंगों के फेन की तरह सब लोग पानी के साथ मिल गये।

"अच्छा, जो मनुष्य बाजीगरी देखता है, क्या उसमें दया होती है? क्या उसे अपने उत्तरदायित्व का बोध रहता है, उत्तरदायित्व का बोध रहने पर ही तो मनुष्य में दया होगी न?"

श्रीरामकृष्ण – वह (ज्ञानी) सब देखता है- ईश्वर, माया, जीवजगत्। वह देखता है, माया (विद्या-माया और अविद्या-माया), जीव और जगत् – ये हैं भी और नहीं भी हैं। जब तक अपना 'मैं' रहता है, तब तक वे भी रहते हैं। ज्ञानरूपी खड्ग के द्वारा उन्हें काट डालने पर फिर कुछ नहीं रह जाता। तब अपना 'मैं' भी बाजीगर का तमाशा हो जाता है।

मणि विचार कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण ने कहा – "किस तरह, जानते हो? जैसे पच्चीस दलवाले फूल को एक ही वार से काटना।

"कर्तृत्व! राम राम! शुकदेव, शंकराचार्य, इन लोगों ने विद्या का 'मैं' रखा था। दया मनुष्य की नहीं, दया ईश्वर की है। विद्या के 'मैं' के भीतर ही दया है। विद्या का 'मैं' वे ही हुए हैं।

"तुम चाहे लाख बार यह अनुभव करो कि यह सब तमाशा है, पर हो तुम उन्हीं के 'अण्डर' (Under अधीन)। उनसे तुम बच नहीं सकते। तुम स्वाधीन नहीं हो। वे जैसा करायें, वैसा ही करना होगा। वह आद्याशक्ति जब ब्रह्मज्ञान देगी तब ब्रह्मज्ञान होगा – तभी तमाशा देखा जाता है, नहीं तो नहीं।

"जब तक थोड़ासा भी 'मैं' है, तब तक उस आद्याशक्ति का ही इलाका है; उन्हीं के अण्डर हो – उन्हें छोड़कर जाने की गुंजाइश नहीं है।

"आद्याशक्ति की सहायता से ही अवतारलीला होती है। उन्हीं की शक्ति से अवतार, अवतार कहलाते हैं। तभी अवतार कार्य कर सकते हैं। सब माँ की शक्ति है।

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

५३० श्रीरामकृष्णवचनामृत २० जून, १८८४

“कालीबाड़ी के पहलेवाले खजांची से जब कोई कुछ ज्यादा चाहता था, तब वह कहता था, दो तीन दिन बाद आना, मालिक से पूछ लूँ।

“कलि के अन्त में कल्कि-अवतार होगा। वे ब्राह्मण बालक के रूप में जन्म लेंगे। एकाएक उनके एक घोड़ा और तलवार आ जायेगी ...।”

अधर आरती देखकर आये; आसन ग्रहण किया। भुवनमोहिनी नाम की धाई कभी-कभी श्रीरामकृष्ण के दर्शन करने के लिए आया करती है। श्रीरामकृष्ण सब की चीजें नहीं ग्रहण कर सकते - विशेषकर डाक्टरों, कविराजों और धाइयों की नहीं ले सकते। घोर कष्ट देखकर भी वे लोग रुपया लेते हैं, इसीलिए श्रीरामकृष्ण उनकी चीजें नहीं ले सकते।

श्रीरामकृष्ण - (अधर से) - भुवनमोहिनी आयी थी। पच्चीस बम्बई आम और सन्देश-रसगुल्ले लायी थी। मुझसे कहा, एक आम आप भी लीजिये। मैंने कहा, नहीं पेट भरा हुआ है। और सचमुच, देखो न, जरा सा सन्देश और कचौड़ी खायी, इतने ही से पेट कैसा हो गया।

“केशव सेन की माँ बहिन आदि सब आयी थीं। इसलिए उनका दिल बहलाने के लिए मुझे कुछ नाचना पड़ा था। और मैं क्या करूँ, उन्हें कितनी गहरी चोट पहुँची है!”

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