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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

परिच्छेद ७१

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परिच्छेद ७१

ईशान मुखोपाध्याय के मकान पर

(१)

कर्मयोग। क्या चिरकाल तक कर्म करना पड़ेगा?

दक्षिणेश्वर कालीमन्दिर में आरती का मधुर शब्द सुनायी दे रहा है। उसी के साथ प्रभाती-राग से मन्दिर की शहनाई बज रही है। श्रीरामकृष्ण उठकर मधुर स्वर से नामोच्चारण कर रहे हैं। कमरे में जिन जिन देवियों और देवताओ के चित्र टँगे हुए थे, एक-एक करके उन्हें प्रणाम किया। फिर पश्चिमवाले गोल बरामदे में जाकर भागीरथी के दर्शन किए और प्रणाम किया। भक्तों में भी कोई कोई वहाँ हैं। उन लोगों ने प्रातःकृत्य समाप्त करके क्रमशः श्रीरामकृष्ण को आकर प्रणाम किया।

राखाल श्रीरामकृष्ण के साथ इस समय यहीं हैं। बाबूराम पिछली रात को आए हैं। मणि श्रीरामकृष्ण के पास आज चौदह दिन से हैं।

आज बृहस्पतिवार है, अगहन की कृष्णा त्रयोदशी, २७ दिसम्बर १८८३ ई.। आज सबेरे ही स्नानादि समाप्त करके श्रीरामकृष्ण कलकत्ता जाने की तैयारी कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण ने मणि को बुलाकर कहा, “आज ईशान के यहाँ जाने के लिए कह गए हैं। बाबूराम जाएगा और तुम भी हमारे साथ चलना।” मणि जाने के लिए तैयार होने लगे।

जाड़े का समय है। सुबह आठ बजे का समय होगा। श्रीरामकृष्ण को ले जाने के लिए नौबतखाने के पास गाड़ी आकर खड़ी हुई। चारों ओर फूल के पेड़ हैं, सामने भागीरथी। सब दिशाएँ प्रसन्न जान पड़ती हैं। श्रीरामकृष्ण ने देवताओं के चित्रों के पास खड़े होकर प्रणाम किया। फिर माता का नाम लेते हुए यात्रा करने के लिए गाड़ी पर बैठ गए। साथ बाबूराम और मणि हैं। उन्होंने श्रीरामकृष्ण की बनात, बनात की बनी हुई कान ढकनेवाली टोपी और मसाले की थैली साथ ले ली है, क्योंकि जाड़े का समय है, सन्ध्या होने पर श्रीरामकृष्ण बनात ओढ़ेंगे।

श्रीरामकृष्ण का मुखमण्डल प्रसन्न है। सब रास्ता आनन्द से पार कर रहे हैं। दिन के नौ बजे होंगे। गाड़ी कलकत्ते में आकर श्यामबाजार से होकर मछुआ-बाजार में आकर

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४१२ श्रीरामकृष्णवचनामृत २७ दिसम्बर, १८८३

खड़ी हुई। मणि ईशान का घर जानते थे। चौराहे पर गाड़ी फिराकर ईशान के घर के सामने खड़ी करने के लिए कहा।

ईशान आत्मीयों के साथ आदरपूर्वक सहास्यमुख श्रीरामकृष्ण की अभ्यर्थना कर उन्हें नीचेवाले बैठकखाने में ले गए। श्रीरामकृष्ण ने भक्तों के साथ आसन ग्रहण किया।

कुशल-प्रश्न हो जाने के बाद श्रीरामकृष्ण ईशान के पुत्र श्रीश के साथ बातचीत करने लगे। श्रीश एम. ए., बी. एल. पास करके अलीपुर में वकालत कर रहे हैं। एण्ट्रेंस और एफ. ए. की परीक्षाओं में विश्वविद्यालय में उनका प्रथम स्थान आया था। इस समय उनकी आयु लगभग तीस वर्ष की होगी। जैसा पाण्डित्य है, वैसा ही विनय भी है। लोग उन्हें देखकर यह समझ लेते हैं कि ये कुछ नहीं जानते। हाथ जोड़कर श्रीश ने श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया। मणि ने श्रीरामकृष्ण को उनका परिचय दिया और कहा, "ऐसी शान्त प्रकृति का मनुष्य दीख नहीं पड़ता।"

श्रीरामकृष्ण (श्रीश के प्रति) – क्यों जी, तुम क्या करते हो?

श्रीश – जी, मैं अलीपुर जा रहा हूँ, वकालत करता हूँ।

श्रीरामकृष्ण (मणि से) – ऐसा आदमी और वकालत!

(श्रीश से) – "अच्छा, तुम्हें कुछ पूछना है? - संसार में अनासक्त होकर रहना, क्यों?"

श्रीश – परन्तु कार्य के निर्वाह के लिए संसार में कितने ही अनुचित काम करने पड़ते हैं। कोई पापकर्म कर रहा है, कोई पुण्यकर्म। यह सब क्या पहले के कर्मों का फल है? क्या यह करते ही रहना होगा?

श्रीरामकृष्ण – कर्म कब तक हैं? – जब तक उन्हें प्राप्त न कर सको। उन्हें प्राप्त कर लेने पर सब चले जाते हैं। तब पापपुण्य के पार जाया जाता है।

"फल आ जाने पर फूल चला जाता है। फूल दीख पड़ता है फल होने के लिए।

"सन्ध्यादि कर्म कितने दिन के लिए? – जितने दिन तक ईश्वर का नामस्मरण करते हुए रोमांच न हो आए, आँखों में आँसू न आ जाएँ। ये सब अवस्थाएँ ईश्वर-प्राप्ति के लक्षण है, ईश्वर पर शुद्धा-भक्ति प्राप्त करने के लक्षण हैं।

"उन्हें जान लेने पर मनुष्य पाप और पुण्य दोनों के परे चला जाता है। रामप्रसाद ने कहा है, भुक्ति और मुक्ति को मैं मस्तक पर धारण करता हूँ; और काली ब्रह्म है, यह मर्म जानकर धर्माधर्म को मैंने छोड़ ही दिया है।

"उनकी ओर जितना बढ़ोगे, उतना ही वे कर्म घटा देंगे। गृहस्थ की बहू गर्भवती होने पर उसकी सास धीरे धीरे उसका काम घटा देती है। जब दसवाँ महीना होता है, तब बिलकुल काम घटा दिया जाता है। बच्चा हो जाने पर वह उसी को लेकर व्यस्त रहती है, उसी को लेकर आनन्द करती है।"

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