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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

५ अगस्त, १८८२ | परिच्छेद ७ | ४१

५ अगस्त, १८८२परिच्छेद ७४१

वाक्य लिखते थे।

मास्टर ने और एक दिन उनको ईश्वर के विषय में यह कहते सुना, “ईश्वर को कोई जान तो सकता नहीं। फिर करना क्या चाहिए? मेरी समझ में, हम लोगों को ऐसा होना चाहिए कि यदि सब कोई वैसे हों तो यह पृथ्वी स्वर्ग बन जाय। हरएक को ऐसी चेष्टा करनी चाहिए कि जिससे जगत् का भला हो।”

विद्या और अविद्या की चर्चा करते हुए श्रीरामकृष्ण ब्रह्मज्ञान की बात कह रहे हैं। विद्यासागर बड़े पण्डित हैं - शायद षड्दर्शन पढ़कर उन्होंने देखा है कि ईश्वर के विषय में कुछ भी जानना सम्भव नहीं।

श्रीरामकृष्ण - ब्रह्म विद्या और अविद्या दोनों के परे है, वह मायातीत है।

ब्रह्म निर्लिप्त है - दुःखादि का सम्बन्ध जीव से ही है।

“इस जगत् में विद्यामाया और अविद्यामाया दोनों हैं, ज्ञानभक्ति भी हैं, और साथ ही कामिनी-कांचन भी हैं, सत् भी है और असत् भी, भला भी है और बुरा भी, परन्तु ब्रह्म निर्लिप्त है। भला-बुरा जीवों के लिए है, सत्-असत् जीवों के लिए। वह ब्रह्म को स्पर्श नहीं कर सकता।

“जैसे, दीप के सामने कोई भागवत पढ़ रहा है और कोई जाल रच रहा है, पर दीप निर्लिप्त है।

सूर्य शिष्ट पर भी प्रकाश डालता है और दुष्ट पर भी।

“यदि कहो कि दुःख, पाप, अशान्ति ये सब फिर क्या हैं, - तो उसका जवाब यह है कि वे सब जीवों के लिए हैं, ब्रह्म निर्लिप्त है। साँप में विष है; औरों को डसने से वे मर जाते हैं, पर साँप को उससे कोई हानि नहीं होती।”

ब्रह्म अनिर्वचनीय, 'अव्यपदेश्यम्' है।

“ब्रह्म क्या है सो मुँह से नहीं कहा जा सकता। सभी चीजें जूठी हो गयी हैं; वेद, पुराण, तन्त्र, षड्दर्शन सब जूठे हो गये हैं। मुँह से पढ़े गए हैं, मुँह से उच्चारित हुए हैं - इसी से जूठे हो गए। पर केवल एक वस्तु जूठी नहीं हुई है - वह वस्तु ब्रह्म है। ब्रह्म क्या है यह आज तक कोई मुँह से नहीं कह सका।”

विद्यासागर (मित्रों से) - वाह! यह तो बड़ी सुन्दर बात हुई! आज मैंने एक नयी बात सीखी।

श्रीरामकृष्ण - एक पिता के दो लड़के थे। ब्रह्मविद्या सीखने के लिए पिता ने लड़कों को आचार्य को सौंपा। कुछ वर्ष बाद वे गुरुगृह से लौटे, आकर पिता को प्रणाम किया। पिता की इच्छा हुई कि देखें इन्हें कैसा ब्रह्मज्ञान हुआ। बड़े बेटे से उन्होंने पूछा, 'बेटा, तुमने तो सब कुछ पढ़ा है, अब बताओ ब्रह्म कैसा है।' बड़ा लड़का वेदों से बहुत

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से श्लोकों की आवृत्ति करते हुए ब्रह्म का स्वरूप समझाने लगा; पिता चुप रहे। जब उन्होंने छोटे लड़के से पूछा तो वह सिर झुकाए चुप रहा, मुँह से बात न निकली; तब पिता ने प्रसन्न होकर छोटे लड़के से कहा, 'बेटा, तुम्हीं ने कुछ समझा है। ब्रह्म क्या है यह मुँह से नहीं कहा जा सकता।'

“मनुष्य सोचता है कि हम ईश्वर को जान गए। एक चींटी चीनी के पहाड़ के पास गयी थी। एक दाना खाकर उसका पेट भर गया, एक दूसरा दाना मुँह में लिए अपने डेरे को जाने लगी, जाते समय सोच रही है कि अब की बार आकर समूचे पहाड़ को ले जाऊँगी। क्षुद्र जीव यही सब सोचते हैं - वे नहीं जानते कि ब्रह्म वाक्य-मन के अतीत है।

“कोई भी हो - वह कितना ही बड़ा क्यों न हो, ईश्वर को जान थोड़े ही सकता है! शुकदेव आदि मानो बड़े चींटे हैं - चीनी के आठ-दस दाने मुँह में ले लें - और क्या?

ब्रह्म सच्चिदानन्दस्वरूप है

“वेद-पुराणों में जो ब्रह्म के विषय में कहा गया है, वह किस ढंग का कथन है सो सुनो। एक आदमी के समुद्र देखकर लौटने पर यदि कोई उससे पूछे कि समुद्र कैसा देखा, तो वह जैसे मुँह बाये कहता है, 'आह! क्या देखा! कैसी लहरें! कैसी आवाज!' बस, ब्रह्म का वर्णन भी वैसा ही है। वेदों में लिखा है - वह आनन्दस्वरूप है - सच्चिदानन्द। शुकदेव आदि ने यह ब्रह्मसागर किनारे पर खड़े होकर देखा और छुआ था। किसी के मतानुसार वे इस सागर में उतरे नहीं। इस सागर में उतरने से फिर कोई लौट नहीं सकता।

निर्विकल्प समाधि तथा ब्रह्मज्ञान

“समाधिस्थ होने से ब्रह्मज्ञान होता है - ब्रह्मदर्शन होता है - उस दशा में विचार बिलकुल बन्द हो जाता है, आदमी चुप हो जाता है। ब्रह्म कैसी वस्तु है, यह मुँह से बताने की सामर्थ्य नहीं रहती।

“एक नमक का पुतला समुद्र नापने गया! (सब हँसे।) पानी कितना गहरा है, उसकी खबर देना चाहता था! पर खबर देना उसे नसीब न हुआ। वह पानी में उतरा कि गल गया! बस फिर खबर कौन दे!”

किसी ने प्रश्न किया, “क्या समाधिस्थ पुरुष जिनको ब्रह्मज्ञान हुआ है, फिर बोलते नहीं?”

श्रीरामकृष्ण (विद्यासागर आदि से) - लोकशिक्षा के लिए शंकराचार्य ने विद्या का 'अहं' रखा था। ब्रह्मदर्शन होने से मनुष्य चुप हो जाता है। जब तक दर्शन न हो, तभी तक विचार होता है। घी जब तक पक न जाय, तभी तक आवाज करता है। पके घी से शब्द नहीं निकलता। पर पके घी में कच्ची पूरी छोड़ी जाती है, तो फिर एक बार वैसा ही शब्द

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निकलता है। जब कच्ची पूरी को पका डाला, तब वह फिर चुप हो जाता है। वैसे ही समाधिस्थ पुरुष लोकशिक्षण के लिए फिर नीचे उतरता है, फिर बोलता है।

“जब तक मधुमक्खी फूल पर नहीं बैठती, तब तक भनभनाती रहती है। फूल पर बैठकर मधु पीना शुरू करने के बाद वह चुप हो जाती है। हाँ, मधुपान के उपरान्त मस्त होकर फिर कभी कभी भनभनाती है।

“तालाब में घड़ा भरते समय भक् भक् आवाज होती है। घड़ा भर जाने के बाद फिर आवाज नहीं होती। (सब हँसे।) हाँ, यदि एक घड़े से पानी दूसरे में डाला जाय, तो फिर शब्द होता है।” (हास्य)

(४)

ज्ञान एवं विज्ञान। अद्वैतवाद, विशिष्टाद्वैतवाद तथा द्वैतवाद का समन्वय

श्रीरामकृष्ण – ऋषियों को ब्रह्मज्ञान हुआ था – विषयबुद्धि का लेशमात्र रहते यह ब्रह्मज्ञान नहीं होता। ऋषि लोग कितना परिश्रम करते थे! सबेरे आश्रम से चले जाते थे। दिनभर अकेले ध्यान-चिंतन करते और रात को आश्रम में लौटकर कुछ फलमूल खाते थे। देखना, सुनना, छूना इन सब विषयों से मन को अलग रखते थे; तब कहीं उन्हें ब्रह्म का बोध होता था।

“कलियुग में लोगों के प्राण अन्न पर निर्भर हैं, देहात्मबुद्धि जाती नहीं। इस दशा में ‘सोऽहम्’ – मैं ब्रह्म हूँ – कहना अच्छा नहीं। सभी काम किए जाते हैं, फिर ‘मैं ही ब्रह्म हूँ’ यह कहना ठीक नहीं। जो विषय का त्याग नहीं कर सकते, जिनका अहंभाव किसी तरह जाता नहीं, उनके लिए ‘मैं दास हूँ’, ‘मैं भक्त हूँ’ यह अभिमान अच्छा है। भक्तिपथ में रहने से भी ईश्वर का लाभ होता है।

“ज्ञानी ‘नेति नेति’ – ब्रह्म यह नहीं, वह नहीं, अर्थात् कोई भी ससीम वस्तु नहीं – यह विचार करके सब विषयबुद्धि छोड़े तब ब्रह्म को जान सकता है। जैसे कोई जीने की एक एक सीढ़ी पार करते हुए छत पर पहुँच सकता है। पर विज्ञानी – जिसने विशेष रूप से ईश्वर से मेल-मिलाप किया है – और भी कुछ दर्शन करता है वह देखता है कि जिन चीजों से छत बनी है – उन ईंटों, चूने, सुर्खी से जीना भी बना है। ‘नेति नेति’ करके जिस ब्रह्मवस्तु का ज्ञान होता है, वही जीव और जगत् होती है। विज्ञानी देखता है कि जो निर्गुण है, वही सगुण भी है।

“छत पर बहुत देर तक लोग ठहर नहीं सकते फिर उतर आते हैं। जिन्होंने समाधिस्थ होकर ब्रह्मदर्शन किया है वे भी नीचे उतरकर देखते हैं कि वही जीव-जगत् हुआ है। सा, रे, ग, मं, प, ध, नि। ‘नि’ में – चरमभूमि में – बहुत देर तक रहा नहीं

४४श्रीरामकृष्णवचनामृत५ अगस्त, १८८२

जाता। 'अहं' नहीं मिटता; तब मनुष्य देखता है कि ब्रह्म ही 'मैं', जीव, जगत – सब कुछ हुआ है। इसी का नाम विज्ञान है।

“ज्ञानी की राह भी राह है, ज्ञान-भक्ति की राह भी राह है, फिर भक्ति की भी राह एक राह है। ज्ञानयोग भी सत्य है, और भक्तिपथ भी सत्य है सभी रास्ते से ईश्वर के समीप जाया जा सकता है। ईश्वर जब तक जीवों में 'मैं' बोध रखता है, तब तक भक्तिपथ ही सरल है।

“विज्ञानी देखता है कि ब्रह्म अटल, निष्क्रिय, सुमेरुवत् है। यह संसार उसके सत्त्व, रज और तम – इन तीन गुणों से बना है, पर वह निर्लिप्त है।

“विज्ञानी देखता है कि जो ब्रह्म है वही भगवान् है, – जो गुणातीत है वही षडैश्वर्यपूर्ण भगवान् है। ये जीव और जगत्, मन और बुद्धि, भक्ति, वैराग्य और ज्ञान – सब उसके ऐश्वर्य हैं। (सहास्य) जिस बाबू के घरद्वार नहीं है – या तो बिक गया – वह बाबू कैसा! (सब हँसे।) ईश्वर षडैश्वर्यपूर्ण है। यदि उसके ऐश्वर्य न होता तो कौन उसकी परवाह करता? (सब हँसे।)

विभु के रूप में एक – किन्तु शक्तिविशेष

“देखो न, यह जगत् कैसा विचित्र है! कितने प्रकार की वस्तुएँ – चन्द्र, सूर्य, नक्षत्र – कितने प्रकार के जीव इसमें हैं! बड़ा-छोटा, अच्छा-बुरा; किसी में शक्ति अधिक है, किसी में कम।”

विद्यासागर – क्या ईश्वर ने किसी को अधिक शक्ति दी है और किसी को कम?

श्रीरामकृष्ण – वह विभु के रूप में सब प्राणियों में है – चींटियों तक में है। पर शक्ति का तारतम्य होता है; नहीं तो क्यों कोई दस आदमियों को हरा देता है, और कोई एक ही आदमी से भागता है? और ऐसा न हो तो भला तुम्हें ही सब कोई क्यों मानते हैं? क्या तुम्हारे दो सींग निकले हैं? (हास्य।) औरों की अपेक्षा तुममें अधिक दया है, विद्या है, इसीलिए तुमको लोग मानते हैं और देखने आते हैं। क्या तुम यह बात नहीं मानते हो?

विद्यासागर मुसकराते हैं।

केवल पाण्डित्य, पुस्तकी विद्या असार है – भक्ति ही सार है।

श्रीरामकृष्ण – केवल पण्डिताई में कुछ नहीं है। लोग किताबें इसलिए पढ़ते हैं कि वे ईश्वरलाभ में सहायता करेंगी – उनसे ईश्वर का पता लगेगा। 'आपकी पोथी में क्या है?' – किसी ने एक साधु से पूछा। साधु ने उसे खोलकर दिखाया। हरएक पन्ने में 'ॐ रामः' लिखा था, और कुछ नहीं।

“गीता का अर्थ क्या है? उसे दस बार कहने से जो होता है वही। दस बार 'गीता' 'गीता' कहने से 'त्यागी' 'त्यागी' निकल आता है। गीता यह शिक्षा दे रही है कि हे जीव,

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परिच्छेद ७
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तू सब छोड़कर ईश्वर-लाभ की चेष्टा कर। कोई साधु हो चाहे गृहस्थ, मन से सारी आसक्ति दूर करनी चाहिए।

“जब चैतन्यदेव दक्षिण में तीर्थ-भ्रमण कर रहे थे तो उन्होंने देखा कि एक आदमी गीता पढ़ रहा है। एक दूसरा आदमी थोड़ी दूर बैठ उसे सुन रहा है और सुनकर रो रहा है – आँखों से आँसू बह रहे हैं। चैतन्यदेव ने पूछा, ‘क्या तुम यह सब समझ रहे हो?’ उसने कहा, ‘प्रभु, इन श्लोकों का अर्थ तो मैं नहीं समझता हूँ।’ उन्होंने पूछा, ‘तो रोते क्यों हो?’ भक्त ने जवाब दिया, मैं देखता हूँ कि अर्जुन का रथ है और उसके सामने भगवान् और अर्जुन बातचीत कर रहे हैं। बस, यही देखकर मैं रो रहा हूँ।’ ”

(५)

भक्तियोग का रहस्य

श्रीरामकृष्ण – विज्ञानी क्यों भक्ति लिए रहते हैं? इसका उत्तर यह है कि ‘मैं’ नहीं दूर होता। समाधि-अवस्था में दूर तो होता है, परन्तु फिर आ जाता है। साधारण जीवों का ‘अहम्’ नहीं जाता। पीपल का पेड़ काट डालो, फिर उसके दूसरे दिन अंकुर निकल आता है। (सब हँसे।)

“ज्ञानलाभ के बाद भी, न जाने कहाँ से ‘मैं’ फिर आ जाता है। स्वप्न में तुमने बाघ देखा; इसके बाद जागे, तो भी तुम्हारी छाती धड़कती है। जीवों को जो दुःख होता है, ‘मैं’ से ही होता है। बैल ‘हम्बा, हम्बा’ (हम, हम) करता है, इसी से तो इतनी यातना मिलती है। हल में जोता जाता है, वर्षा और धूप सहनी पड़ती है और फिर कसाई लोग काटते हैं, चमड़े से जूते बनते हैं, ढोल बनता है, – तब खूब पिटता है। (हास्य)

“फिर भी निस्तार नहीं। अन्त में आँतों से ताँत बनती है और उसे धुनिया अपने धनुहे में लगाता है। तब वह ‘मैं’ नहीं कहता, तब कहता है ‘तू-ऊँ, तू-ऊँ’ (अर्थात् तुम, तुम)। जब ‘तुम’ ‘तुम’ कहता है तब निस्तार होता है। हे ईश्वर! मैं दास हूँ, तुम प्रभु हो; मैं सन्तान हूँ, तुम माँ हो।

“राम ने पूछा, हनुमान, तुम मुझे किस भाव से देखते हो? हनुमान ने कहा, राम! जब मुझे ‘मैं’ का बोध रहता है, तब देखता हूँ, तुम पूर्ण हो, मैं अंश हूँ, तुम प्रभु हो, मैं दास हूँ; और राम! जब तत्त्वज्ञान होता है तब देखता हूँ, तुम्हीं ‘मैं’ हो और मैं ही ‘तुम’ हूँ।

“सेव्य-सेवक भाव ही अच्छा है। ‘मैं’ जब कि हटने का ही नहीं तो बना रहने दो साले को ‘दास मैं’।

४६श्रीरामकृष्णवचनामृत५ अगस्त, १८८२

'मैं' और 'मेरा' अज्ञान है

“मैं और मेरा – ये दोनों अज्ञान हैं। यह भाव कि मेरा घर है, मेरे रुपये हैं, मेरी विद्या है, मेरा यह सब ऐश्वर्य है – अज्ञान से पैदा होता है और यह भाव ज्ञान से कि हे ईश्वर, तुम कर्ता हो और ये सब तुम्हारी चीजें हैं – घर-परिवार, लड़के-बच्चे, स्वजनवर्ग, बन्धु-बान्धव – ये सब तुम्हारी वस्तुएँ हैं।

“मृत्यु का सर्वदा स्मरण रखना चाहिए। मरने के बाद कुछ भी न रह जाएगा। यहाँ कुछ कर्म करने के लिए आना हुआ है। जैसे कि देहात में घर है, परन्तु काम करने के लिए कलकत्ते आया जाता है। यदि कोई दर्शक बगीचा देखने को आता है तो धनी मनुष्यों के बगीचे का कर्मचारी कहता है – यह बगीचा हमारा है, यह तालाब हमारा है; परन्तु किसी कसूर पर जब वह नौकरी से अलग कर दिया जाता है, तब आम की लकड़ी के बने हुए सन्दूक को ले जाने का भी उसे अधिकार नहीं रह जाता, सन्दूक दरवान के हाथ भेज दिया जाता है। (हास्य)

“भगवान् दो बातों पर हँसते हैं। एक तो जब वैद्य रोगी की माँ से कहता है – माँ, क्या भय है? मैं तुम्हारे लड़के को अच्छा कर दूँगा। उस समय भगवान् यह सोचकर हँसते हैं कि मैं मार रहा हूँ और यह कहता है, मैं बचाऊँगा। वैद्य सोचता है – मैं कर्ता हूँ। ईश्वर कर्ता है – यह वह भूल गया है। दूसरा अवसर वह होता है जब दो भाई रस्सी लेकर जमीन नापते हैं और कहते हैं – इधर की मेरी है, उधर की तुम्हारी। तब ईश्वर और एक बार हँसते हैं; यह सोचकर हँसते हैं कि जगत्-ब्रह्माण्ड मेरा है, पर ये कहते हैं, यह जगह मेरी है और वह तुम्हारी।”

उपाय – विश्वास और भक्ति

श्रीरामकृष्ण – उन्हें क्या कोई विचार द्वारा जान सकता है? दास होकर – शरणागत होकर उन्हें पुकारो।

(विद्यासागर के प्रति, हँसते हुए) – “अच्छा, तुम्हारा भाव क्या है?”

विद्यासागर मुसकरा रहे हैं। कहते हैं, “अच्छा, यह बात आपसे किसी दिन निर्जन में कहूँगा।” (सब हँसे।)

श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – उन्हें पाण्डित्य द्वारा विचार करके कोई जान नहीं सकता।

यह कहकर श्रीरामकृष्ण प्रेम से मतवाले होकर गाने लगे। संगीत का मर्म है –

“कौन जानता है कि काली कैसी है? षड्दर्शनों ने उसका दर्शन नहीं पाया। मूलाधार और सहस्रार में योगी लोग सदा उसका ध्यान करते हैं। वह पद्मवन में हंस के साथ हंसी जैसे रमण करती है। वह आत्माराम की आत्मा है, प्रणव का प्रमाण है। वह इच्छामयी अपनी इच्छा के अनुसार घट घट में विराजमान है। माता के जिस उदर में यह ब्रह्माण्ड समाया हुआ है, समझो कि वह कितना बड़ा हो सकता है। काली का माहात्म्य