श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in context८ जून, १८८३ परिच्छेद ३८ २२७
केदार का भाव नवरसिक समाज का है। वे श्रीरामकृष्ण के चरणों के अँगूठों को पकड़े हुए हैं। उनकी धारणा है कि इससे शक्ति का संचार होगा। श्रीरामकृष्ण कुछ प्रकृतिस्थ हो कह रहे हैं, “माँ! अँगूठों को पकड़कर वह मेरा क्या कर सकेगा?”
केदार विनीत भाव से हाथ जोड़े बैठे हैं।
श्रीरामकृष्ण (केदार से भावावेश में) – कामिनी और कांचन पर तुम्हारा मन खिंचता है। मुँह से कहने से क्या होगा कि मेरा मन उधर नहीं है!
“आगे बढ़ चलो। चन्दन की लकड़ी के आगे और भी बहुतकुछ हैं, – चाँदी की खान – सोने की खान – फिर हीरे और माणिक। थोड़ीसी उद्दीपना हुई है, इससे यह मत सोचो कि सब कुछ हो गया।”
श्रीरामकृष्ण फिर अपनी माता से बातें कर रहे हैं। कहते हैं, “माँ! इसे हटा दो।”
केदार का कण्ठ सूख गया है। भयभीत हो राम से कहते हैं, “ये यह क्या कह रहे हैं?
राखाल को देखकर श्रीरामकृष्ण फिर भावाविष्ट हो रहे हैं। उन्हें पुकारकर कहते हैं, “मैं यहाँ बहुत दिनों से आया हूँ। तू कब आया?”
क्या श्रीरामकृष्ण इशारे से कहते हैं कि वे भगवान् के अवतार हैं और राखाल उनके एक अन्तरंग पार्षद?
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