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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

१६ अक्टूबर, १८८२ परिच्छेद १० ६५

१६ अक्टूबर, १८८२ परिच्छेद १० ६५

कीर्तन समाप्त होने पर श्रीरामकृष्ण ने नरेन्द्र को बार बार छाती से लगाया और कहा - "अहा, आज तुमने मुझे कैसा आनन्द दिया!"

आज श्रीरामकृष्ण के हृदय में प्रेम का स्रोत उमड़ रहा है। रात के आठ बजे होंगे, तो भी प्रेमोन्मत्त होकर बरामदे में अकेले टहल रहे हैं। उत्तरवाले लम्बे बरामदे में आए हैं और अकेले एक छोर से दूसरे छोर तक जल्दी जल्दी टहल रहे हैं। बीच बीच में जगन्माता के साथ कुछ बातचीत कर रहे हैं। एकाएक उन्मत्त की भाँति बोल उठे, "तू मेरा क्या बिगाड़ेगी?"

क्या आप यही कह रहे हैं कि जगन्माता जिसे सहारा दे रही है, माया उसका क्या बिगाड़ सकती है?

नरेन्द्र, प्रिय और मास्टर रात को रहेंगे। नरेन्द्र रहेंगे - बस, श्रीरामकृष्ण फूले नहीं समाते। रात का भोजन तैयार हुआ। श्रीमाताजी* नौबतखाने में हैं - आपने अपने भक्तों के लिए रोटी, दाल आदि बनाकर भेज दिया है। भक्त लोग बीच बीच में रहा करते हैं; सुरेन्द्र प्रतिमास कुछ खर्च देते हैं।

कमरे के दक्षिण-पूर्ववाले बरामदे में भोजन के चौके लगाए जा रहे हैं। पूर्ववाले दरवाजे के पास नरेन्द्र आदि बातचीत कर रहे हैं।

नरेन्द्रादि लोगों को स्कूल तथा अन्य विषय-चर्चा करने का निषेध

नरेन्द्र - आजकल के लड़कों को कैसा देख रहे हैं?

मास्टर - बुरे नहीं, पर धर्म के उपदेश कुछ नहीं पाते हैं।

नरेन्द्र - मैंने खुद जो देखा है उससे तो जान पड़ता है कि सब बिगड़ रहे हैं। चुरुट पीना, ठट्ठेबाजी, ठाटबाट, स्कूल से भागना - ये सब हरदम होते देखे जाते हैं; यहाँ तक कि खराब जगहों में भी जाया करते हैं।

मास्टर - जब हम पढ़ते थे तब तो ऐसा न देखा, न सुना।

नरेन्द्र - शायद आप उतना मिलते-जुलते नहीं थे। मैंने यह भी देखा कि खराब लोग उन्हें नाम से पुकारते हैं। कब उनसे मिले हैं, कौन जाने!

मास्टर - क्या आंश्चर्य की बात!

नरेन्द्र - मैं जानता हूँ कि बहुतों का चरित्र बिगड़ गया है। स्कूल के संचालक और लड़कों के अभिभावक इस विषय पर ध्यान दें तो अच्छा हो।

ईश्वर-चर्चा ही असल। "आत्मानं वा विजानीथ अन्यां वाचं विमुञ्चथ।"

इस तरह बातें हो रही थीं कि श्रीरामकृष्ण कोठरी के भीतर से उनके पास आये और


* श्रीरामकृष्णदेव की धर्मपत्नी श्रीसारदादेवी

६६ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | १६ अक्टूबर, १८८२

हँसते हुए कहते हैं, “भला तुम्हारी क्या बातचीत हो रही है?” नरेन्द्र ने कहा, “इनसे स्कूल की चर्चा हो रही थी। लड़कों का चरित्र ठीक नहीं रहता।” श्रीरामकृष्ण थोड़ी देर तक उन बातों को सुनकर मास्टर से गम्भीर भाव से कहते हैं, “ऐसी बातचीत अच्छी नहीं। ईश्वर की बातों को छोड़ दूसरी बातें अच्छी नहीं। तुम इनसे उम्र में बड़े हो, तुम सयाने हुए हो, तुम्हें ये सब बातें उठने देना उचित न था।”

उस समय नरेन्द्र की उम्र उन्नीस-बीस रही होगी और मास्टर की सत्ताईस-अट्ठाईस।

मास्टर लज्जित हुए, नरेन्द्र आदि भक्त चुप रहे।

श्रीरामकृष्ण खड़े होकर हँसते हुए नरेन्द्र आदि भक्तों को भोजन कराते हैं। आज उनको बड़ा आनन्द हुआ है।

भोजन के बाद नरेन्द्र आदि भक्त श्रीरामकृष्ण के कमरे में फर्श पर बैठे विश्राम कर रहे हैं और श्रीरामकृष्ण से बातें कर रहे हैं। आनन्द का मेला-सा लग गया है। बातों बातों में श्रीरामकृष्ण नरेन्द्र से कहते हैं – ‘चिदाकाश में पूर्ण प्रेमचन्द्र का उदय हुआ’ जरा इस गाने को तो गा।

नरेन्द्र ने गाना शुरू किया। साथ ही अन्य भक्त मृदंग और करताल बजाने लगे। गीत का आशय इस प्रकार था –

“चिदाकाश में पूर्ण प्रेमचन्द्र का उदय हुआ। क्या ही आनन्दपूर्ण प्रेमसिन्धु उमड़ आया! जय दयामय, जय दयामय, जय दयामय! चारों ओर भक्तरूपी ग्रह जगमगाते हैं। भक्तसखा भगवान भक्तों के संग लीलारसमय हो रहे हैं। जय दयामय! स्वर्ग का द्वार खोल, आनन्द का तूफान उठाते हुए नवविधान* रूपी वसन्त-समीर चल रहा है। उससे लीलारस और प्रेमगन्धवाले कितने ही फूल खिल जाते हैं जिनकी महक से योगीवृन्द योगानन्द में मतवाले हो जाते हैं। जय दयामय! संसार-ह्रद के जल पर नवविधान-रूपी कमल में आनन्दमयी माँ विराजती हैं, और भावावेश से आकुल भक्तरूपी भौंरे उसमे सुधापान कर रहे हैं। वह देखो माता का प्रसन्न वदन – जिसे देखकर चित्त खिल उठता है और जगत् मुग्ध हो जाता है। और देखो – माँ के श्रीचरणों के पास साधुओं का समूह, वे मस्त होकर नाच-गा रहे हैं। अहा, कैसा अनुपम रूप है – जिसे देखकर प्राण शीतल हो गए। ‘प्रेमदास’ सब के चरण पकड़कर कहता है कि भाई, सब मिलकर माँ की जय गाओ।”

कीर्तन करते करते श्रीरामकृष्ण नृत्य कर रहे हैं। भक्त भी उन्हें घेरकर नाच रहे हैं।

कीर्तन समाप्त होने पर श्रीरामकृष्ण उत्तर-पूर्ववाले बरामदे में टहल रहे हैं। श्रीयुत हाजरा उसी के उत्तर भाग में बैठे हैं। श्रीरामकृष्ण जाकर वहाँ बैठे। मास्टर भी वहीं बैठे हैं


* श्री केशव सेन द्वारा स्थापित ब्राह्मसमाज का नाम