Skip to content
SarvaKosh
श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished711 pages

Page 247 of 711

Read in context
Page 247

२२४ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | ५ जून, १८८३

गुरुशिष्य-संवाद

शाम हुई। मन्दिर में आरती हो रही है। बारह शिवमन्दिरों तथा श्रीराधाकान्त के और माता भवतारिणी के मन्दिर में शंख घण्टा आदि मंगल-वाद्य बज रहे हैं। आरती समाप्त होने के कुछ समय बाद श्रीरामकृष्ण अपने कमरे से दक्षिण के बरामदे में आ बैठे। चारों ओर घना अन्धकार है, केवल मन्दिर में स्थान स्थान पर दीपक जल रहे हैं। गंगाजी के वक्ष पर आकाश की काली छाया पड़ी है। आज अमावस्या है। श्रीरामकृष्ण सहज ही भावमय हैं, आज भाव और भी गम्भीर हो रहा है। बीच बीच में प्रणव उच्चारण कर रहे हैं और देवी का नाम ले रहे हैं। गर्मी का मौसम है, कमरे के भीतर गर्मी बहुत है। इसलिए बरामदे में आए हैं। किसी भक्त ने एक कीमती चटाई दी है। वही बरामदे में बिछायी गयी है। श्रीरामकृष्ण को सर्वदा माँ का ध्यान लगा रहता है। लेटे हुए आप मणि से धीरे धीरे बातें कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – देखो, ईश्वर के दर्शन होते हैं। अमुक को दर्शन मिले हैं, परन्तु किसी से कहना मत। तुम्हें ईश्वर का रूप पसन्द है या निराकार-चिन्ता?

मणि – इस समय तो निराकार-चिन्ता कुछ अच्छी लगती है, पर यह भी कुछ कुछ समझ में आया है कि वे ही साकार हो इन अनेक रूपों में विराजते हैं।

श्रीरामकृष्ण – देखो, मुझे गाड़ी पर बेलघरिया में मोती शील की झील को ले चलोगे? वहाँ चारा फेंक दो, मछलियाँ आकर उसे खाने लगेंगी। अहा! मछलियों को खेलती हुई देखकर क्या आनन्द होता है, तुम्हें उद्दीपना होगी कि मानो सच्चिदानन्दरूपी सागर में आत्मारूपी मछली खेल रही है। उसी तरह लम्बे-चौड़े मैदान में खड़े होने से ईश्वरीय भाव आ जाता है, जैसे किसी हण्डी में रखी हुई मछली तालाब को पहुँच गयी हो।

“उनके दर्शन के लिए साधना चाहिए। मुझे कठोर साधनाएँ करनी पड़ीं। बिल्ववृक्ष के नीचे तरह तरह की साधनाएँ कर चुका। वृक्ष के नीचे पड़ा रहता था, – यह कहते हुए कि माँ, दर्शन दो। रोते रोते आँसुओं की झड़ी लग जाती थी।

मणि – जब आप ही इतनी साधनाएँ कर चुके तब दूसरे लोग क्या एक ही क्षण में सब कर लेंगे? मकान के चारों ओर उँगली फेर देने ही से क्या दीवाल बन जाएगी?

श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – अमृत कहता है, एक आदमी के आग जलाने पर दस आदमी उसके ताप से लाभ उठाते हैं। एक बात और है, – नित्य को पहुँचकर लीला में रहना अच्छा है।

मणि – आपने तो कहा है कि लीला विलास के लिए है।

श्रीरामकृष्ण – नहीं, लीला भी सत्य है। और देखो, जब यहाँ आओगे तब अपने साथ थोड़ा कुछ लेते आना। खुद नहीं कहना चाहिए, इससे अभिमान होता है। अधर सेन से भी कहता हूँ, एक पैसे का कुछ लेकर आना। भवनाथ से कहता हूँ कि एक पैसे का