श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
५ अगस्त, १८८२ | परिच्छेद ७ | ४९
५ अगस्त, १८८२ | परिच्छेद ७ | ४९
"चित्त को उन पर लगाना चाहिए, उन्हें प्यार करना चाहिए। वे सुधासागर हैं; अमृतसिन्धु हैं; इसमें डूबने से मनुष्य मरता नहीं, अमर हो जाता है। किसी किसी का यह विचार है कि ईश्वर को ज्यादा पुकारने से मस्तिष्क बिगड़ जाता है, पर बात ऐसी नहीं। यह तो सुधासमुद्र है, अमृतसिन्धु है। वेदों में इसे अमृत कहा है। इसमें डूब जाने से कोई मरता नहीं, अमर हो जाता है।"
निष्काम कर्म तथा जगतकल्याण
"पूजा, होम, याग, यज्ञ - ये कुछ नहीं हैं। यदि ईश्वर पर प्रीति पैदा हो जाय तो इन कर्मों की अधिक आवश्यकता नहीं। जब तक हवा नहीं बहती तभी तक पंखे की जरूरत होती है। यदि दक्षिणी हवा आप ही आने लगे तो पंखा रख देना पड़ता है। फिर पंखे का क्या काम?
"तुम जो काम कर रहे हो, ये सब अच्छे कर्म हैं। यदि 'मैं कर्ता हूँ' इस भाव को छोड़कर निष्काम भाव से कर्म कर सको तो और भी अच्छा है। यह कर्म करते करते ईश्वर पर भक्ति और प्रीति होगी। इस प्रकार निष्काम कर्म करते जाओ तो ईश्वर-लाभ भी होगा।
"उन पर जितनी ही भक्ति-प्रीति होगी, उतने ही तुम्हारे काम घटते जाएँगे। गृहस्थ की बहू जब गर्भिणी होती है, तब उसकी सास उसका काम कम कर देती है। नौ महीने पूरे होने पर बिलकुल काम छूने नहीं देती। उसे डर रहता है कि कहीं बच्चे को कोई हानि न पहुँचे, सन्तान-प्रसव में कोई विपत्ति न हो। (हास्य) तुम जो काम कर रहे हो, उससे तुम्हारा ही उपकार है। निष्काम भाव से कर्म कर सकोगे तो चित्त की शुद्धि होगी, ईश्वर पर तुम्हारा प्रेम होगा। प्रेम होते ही तुम उन्हें प्राप्त कर लोगे। संसार का उपकार मनुष्य नहीं करता, वे ही करते हैं जिन्होंने चन्द्र-सूर्य की सृष्टि की, माता-पिता को स्नेह दिया, सत्पुरुषों में दया का संचार किया और साधु-भक्तों को भक्ति दी। जो मनुष्य कामनाशून्य होकर कर्म करेगा वह अपना ही हित करेगा।
निष्काम कर्म का उद्देश्य – ईश्वरदर्शन
"भीतर सुवर्ण है, अभी तक तुम्हें पता नहीं चला। ऊपर कुछ मिट्टी पड़ी है। यदि एक बार पता चल जाय तो अन्य काम घट जाएँगे। गृहस्थ की बहू के लड़का होने से वह लड़के ही को लिए रहती है, उसी को उठाती बैठाती है। फिर उसकी सास उसे घर के काम में हाथ नहीं लगाने देती। (सब हँसे)
"और भी 'आगे बढ़ो।' लकड़हारा लकड़ी काटने गया था; ब्रह्मचारी ने कहा - आगे बढ़ जाओ। उसने आगे बढ़कर देखा तो चन्दन के पेड़ थे! फिर कुछ दिन बाद उसने सोचा कि ब्रह्मचारी ने बढ़ जाने को कहा था, सिर्फ चन्दन के पेड़ तक तो जाने को कहा नहीं। आगे चलकर देखा तो चाँदी की खान थी।
५० श्रीरामकृष्णवचनामृत ५ अगस्त, १८८२
फिर कुछ दिन बीतने पर और आगे बढ़ा और देखा तो सोने की खान मिली। फिर क्रमशः हीरे की - मणियों की। वह सब लेकर वह मालामाल हो गया।
“निष्काम कर्म कर सकने से ईश्वर पर प्रेम होता है। क्रमशः उनकी कृपा से उन्हें लोग पाते भी हैं। ईश्वर के दर्शन होते हैं, उनसे बातचीत होती है जैसे कि मैं तुमसे वार्तालाप कर रहा हूँ।” (सब निःशब्द हैं।)
(७)
अहेतुक कृपासिन्धु श्रीरामकृष्ण
सब की जबान बन्द हैं। लोग चुपचाप बैठे ये बातें सुन रहे हैं। श्रीरामकृष्ण की जिह्वा पर मानो साक्षात् वाग्वादिनी बैठी हुई जीवों के हित के लिए विद्यासागर से बातें कर रही हैं। रात हो रही है - नौ बजने को है। श्रीरामकृष्ण अब चलनेवाले हैं।
श्रीरामकृष्ण (विद्यासागर से, सहास्य) - यह सब जो कहा, वह तो ऐसे ही कहा। आप सब जानते हैं, किन्तु अभी आपको इसकी खबर नहीं। (सब हँसे।) वरुण के भण्डार में कितने ही रत्न पड़े हैं, परन्तु वरुण महाराज को कोई खबर नहीं।
विद्यासागर (हँसते हुए) - यह आप कह सकते हैं।
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) - हाँ जी, अनेक बाबू नौकरों के नाम तक नहीं जानते! (सब हँसते हैं।) घर में कहाँ कौनसी कीमती चीज पड़ी है, वे नहीं जानते।
वार्तालाप सुनकर लोग आनन्दित हो रहे हैं। थोड़ी देर के लिए सब लोग शांत हो गए। श्रीरामकृष्ण विद्यासागर से फिर प्रसंग उठाते हैं।
श्रीरामकृष्ण (हँसमुख) - एक बार बगीचा देखने जाइए, रासमणि का बगीचा बड़ी अच्छी जगह है।
विद्यासागर - जरूर जाऊँगा। आप आए और मैं न जाऊँगा?
श्रीरामकृष्ण - मेरे पास? राम राम
विद्यासागर - यह क्या! ऐसी बात आपने क्यों कही? मुझे समझाइए।
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) - हम लोग छोटी छोटी किश्तियाँ हैं जो खाई, नाले और बड़ी नदियों में भी जा सकती हैं। परन्तु आप हैं जहाज; कौन जानता है, जाते समय रेत में लग जाय! (सब हँसते हैं।)
विद्यासागर प्रफुल्लमुख किन्तु चुपचाप बैठे हैं। श्रीरामकृष्ण हँसते हैं।
श्रीरामकृष्ण - पर हाँ, इस समय जहाज भी जा सकता है।
विद्यासागर - (हँसते हुए) - हाँ, ठीक है, यह वर्षाकाल है। (लोग हँसे।)
मास्टर (स्वगत्) - नवानुराग की वर्षा, नवानुराग जब होता है, तब मान-अपमान का बोध क्या रह सकता है।