Skip to content
SarvaKosh
श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished711 pages

Page 246 of 711

Read in context
Page 246

५ जून, १८८३ परिच्छेद ३७ २२३

जाग्रत् अवस्था भी वैसी ही सत्य है।

“ईश्वर ही कर्ता हैं, उन्हीं की इच्छा से सब कुछ हो रहा है।”

हाजरा – पर यह समझना बड़ा कठिन है। भू-कैलास के साधु को कितना कष्ट दिया गया, जो एक तरह से उनकी मृत्यु का कारण हुआ। वे समाधि की हालत में मिले थे। होश में लाने के लिए लोगों ने उन्हें कभी जमीन में गाड़ा, कभी जल में डुबोया और कभी उनका शरीर दाग दिया। इस तरह उन्हें चैतन्य कराया। इन यन्त्रणाओं के कारण उनका शरीर छूट गया। लोगों ने उन्हें कष्ट भी दिया और इधर ईश्वर की इच्छा से उनकी मृत्यु भी हुई।

श्रीरामकृष्ण – जिसका जैसा कर्म है, उसका फल वह पाएगा। किन्तु ईश्वर की इच्छा से उन साधु का शरीर-त्याग हुआ। वैद्य बोतल के अन्दर मकरध्वज तैयार करते हैं। उसके चारों ओर मिट्टी लीपकर वे उसे आग में रख देते हैं। बोतल के अन्दर का सोना आग की गर्मी से और कई चीजों के साथ मिलकर मकरध्वज बन जाता है। तब वैद्य बोतल को उठाकर उसे धीरे धीरे तोड़ता है और उससे मकरध्वज निकालकर रख लेता है। उस समय बोतल रहे चाहे नष्ट हो जाए, उससे क्या? उसी तरह लोग सोचते हैं कि साधु मार डाले गए, पर शायद उनकी चीज बन चुकी होगी। भगवान् का लाभ होने के बाद शरीर रहे भी तो क्या, और जाय तो भी क्या?

“भू-कैलास के वे साधु समाधिस्थ थे। समाधि अनेक प्रकार की होती है। हृषीकेश के साधु के कथन से मेरी अवस्था मिल गयी थी। कभी शरीर में चींटी की तरह वायु चलती हुई जान पड़ती है; कभी बड़े वेग के साथ, जैसे बन्दर एक डाल से दूसरी डाल पर कूदते हैं; कभी मछली की तरह गति होती है। जिसको हो वही जान सकता है। जगत् का ख्याल जाता रहता है। मन के कुछ उतरने पर मैं कहता हूँ, 'माँ, मुझे अच्छा कर दो, मैं बातें करना चाहता हूँ।'

“ईश्वरकोटि जैसे अवतार आदि, न होने पर कोई समाधि से नहीं लौट सकता। जीवकोटि के कोई कोई साधना के बल से समाधिस्थ होते तो हैं; पर वे फिर नहीं लौटते। जब ईश्वर स्वयं मनुष्य होकर आते हैं, अवतार रूप में आते हैं और जीवों की मुक्ति की चाबी उनके हाथ में रहती है, तब वे समाधि के बाद लौटते हैं – लोगों के कल्याण के लिए।”

मास्टर (मन ही मन) – क्या श्रीरामकृष्ण के हाथ में जीवों की मुक्ति की चाबी है?

हाजरा – ईश्वर को सन्तुष्ट करने से सब कुछ हुआ। अवतार हों या न हों।

श्रीरामकृष्ण (हँसकर) – हाँ, हाँ। विष्णुपुर में रजिस्ट्री का बड़ा दफ्तर है, वहाँ रजिस्ट्री हो जाने पर फिर 'गोघाट' में कोई बखेड़ा नहीं होता।