Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

DevanagariHindipublished711 pages

१९ अगस्त, १८८३ | परिच्छेद ४९ | २८३

Page 306Permalink

१९ अगस्त, १८८३ | परिच्छेद ४९ | २८३

(४)

सच्चिदानन्द-लाभ का उपाय। ज्ञानी और भक्त में अन्तर

समाधि टूटी। इसी बीच में नरेन्द्र उन्हें समाधिस्थ देखकर कमरे से बाहर पूर्ववाले बरामदे में चले गए हैं। वहाँ हाजरा महाशय एक कम्बल के आसन पर हरिनाम की माला हाथ में लिए बैठे हैं। नरेन्द्र उनसे बातें कर रहे हैं। इधर कमरा दर्शकों से भरा है। समाधि-भंग के बाद श्रीरामकृष्ण ने भक्तों की ओर दृष्टि डाली तो देखा कि नरेन्द्र वहाँ नहीं हैं। तम्बूरा सूना पड़ा है। सब भक्त उनकी ओर उत्सुक होकर देख रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – आग लगा गया है, अब चाहे वह रहे या न रहे!

(कप्तान आदि से) “चिदानन्द का आरोप करो तो तुम्हें भी आनन्द मिलेगा। चिदानन्द तो है ही, – केवल आवरण और विक्षेप है।* विषय पर आसक्ति जितनी घटेगी, उतनी ही ईश्वर पर रुचि बढ़ेगी।

कप्तान – कलकत्ते के घर की ओर जितना ही बढ़ोगे, वाराणसी से उतनी ही दूर होते जाओगे।

श्रीरामकृष्ण – श्रीमती (राधिका) कृष्ण की ओर जितना बढ़ती थीं उतनी ही कृष्ण की देहगन्ध उन्हें मिलती जाती थी। मनुष्य जितना ही ईश्वर के पास जाता है उतनी ही उसकी उन पर भाव-भक्ति होती जाती है। नदी जितनी ही समुद्र के समीप होती है उतना ही उसमें ज्वार-भाटा होता है।

“ज्ञानी के भीतर मानो गंगा एक-सी बहती रहती है। उसके लिए सभी स्वप्नवत् है। वह सदा स्व-स्वरूप में स्थित रहता है। पर भक्त की गंगा एक गति से नहीं बहती। भक्त कभी हँसता, कभी रोता है; कभी नाचता और कभी गाता है। भक्त ईश्वर के साथ विलास करना चाहता है – वह कभी तैरता है, कभी डूबता है और कभी फिर ऊपर आता है – जैसे बर्फ का टुकड़ा पानी में कभी ऊपर और कभी नीचे आता-जाता रहता है! (हँसी)

ब्रह्म और शक्ति अभिन्न हैं

“ज्ञानी ब्रह्म को जानना चाहता है। भक्त के लिए भगवान् – सर्वशक्तिमान् षडैश्वर्यपूर्ण भगवान् हैं। परन्तु वास्तव में ब्रह्म और शक्ति अभिन्न हैं। जो सच्चिदानन्दमय हैं वे ही सच्चिदानन्दमयी हैं। जैसे मणि और उसकी ज्योति। मणि की ज्योति कहने से ही मणि का बोध होता है और मणि कहने से ही उसकी ज्योति का। बिना मणि को सोचे उसकी ज्योति की धारणा नहीं हो सकती, वैसे ही बिना मणि की ज्योति को सोचे मणि को भी सोचा नहीं जा सकता।


* अर्थात वह ढक गया है और उसकी जगह दूसरी चीज का आभास हो रहा है।

Page 307Permalink

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri

२८४श्रीरामकृष्णवचनामृत१९ अगस्त, १८८३

“एक ही सच्चिदानन्द का शक्ति के भेद से उपाधिभेद होता है। इसलिए उनके विविध रूप होते हैं। 'तारा, वह तो तुम्हीं हो।' जहाँ कहीं कार्य (सृष्टि, स्थिति, प्रलय) हैं वहीं शक्ति है। परन्तु जल स्थिर रहने पर भी जल है और हिलोरें, बुलबुले आदि उठने पर भी जल ही है। सच्चिदानन्द ही आद्याशक्ति हैं – जो सृष्टि, स्थिति, प्रलय करती हैं। जैसे कप्तान जब कोई काम नहीं करते तब भी वही हैं, जब पूजा करते हैं तब भी वही हैं, और जब वे लाटसाहब के पास जाते हैं तब भी वही हैं, केवल उपाधि का भेद है।”

कप्तान – जी हाँ।

श्रीरामकृष्ण – मैंने यही बात केशव सेन से कही थी।

कप्तान – केशव सेन भ्रष्टाचार, स्वेच्छाचार हैं; वे बाबू हैं, साधु नहीं।

श्रीरामकृष्ण (भक्तों से) – कप्तान मुझे केशव सेन के यहाँ जाने को मना करता है।

कप्तान – महाराज, आप तो जाएँगे ही, भला उस पर मैं क्या करूँ?

श्रीरामकृष्ण (नाराज होकर) – तुम लाटसाहब के पास रुपये के लिए जा सकते हो, और मैं केशव सेन के पास नहीं जा सकता? वह तो ईश्वरचिन्तन करता है, हरि का नाम लेता है। इधर तुम्हीं तो कहते हो, 'ईश्वर ही अपनी माया से जीव और जगत् हुए हैं।'

(५)

ज्ञानयोग और भक्तियोग का समन्वय

यह कहकर श्रीरामकृष्ण एकाएक कमरे से उत्तर-पूर्ववाले बरामदे में चले गये। कप्तान और अन्य भक्त कमरे में ही बैठे उनकी प्रतीक्षा करने लगे। मास्टर भी उनके साथ बरामदे में आये। बरामदे में नरेन्द्र हाजरा से बातें कर रहे थे। श्रीरामकृष्ण जानते थे कि हाजरा को शुष्क ज्ञानविचार बड़ा प्यारा है; वे कहा करते हैं, 'जगत् स्वप्नवत् है, पूजा और चढ़ावा आदि सब मन का भ्रम है, केवल अपने यथार्थ रूप की चिन्ता करना ही हमारा लक्ष्य है, और मैं ही वह परमात्मा हूँ – सोऽहम्।'

श्रीरामकृष्ण (हँसते हुए) – तुम लोगों की क्या बातचीत हो रही है?

नरेन्द्र (हँसते हुए) – कितनी लम्बी लम्बी बातें हो रही हैं।

श्रीरामकृष्ण (हँसते हुए) – किन्तु शुद्ध ज्ञान और शुद्धा भक्ति एक ही है। शुद्ध ज्ञान जहाँ ले जाता है वहीं शुद्धा भक्ति भी ले जाती है। भक्ति का मार्ग बड़ा सरल है।

नरेन्द्र – 'ज्ञानविचार का और प्रयोजन नहीं माँ, अब मुझे पागल बना दो!' (मास्टर से) देखिये, हैमिल्टन की एक किताब में मैंने पढ़ा – ‘A learned ignorance is the end of Philosophy and beginning of Religion.’

श्रीरामकृष्ण (मास्टर से) – इसका अर्थ क्या है?

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar