Skip to content
SarvaKosh
श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished711 pages

Page 243 of 711

Read in context
Page 243
२२०श्रीरामकृष्णवचनामृत४ जून, १८८३

(२) (भावार्थ) – “श्यामा माँ के चरणरूपी आकाश में मन की पतंग उड़ रही थी। कलुष की कुवायु से वह चक्कर खाकर गिर पड़ी। ...”

(३) (भावार्थ) – “मन! अपने आप में रहो। किसी दूसरे के घर न जाओ। जो कुछ चाहोगे वह बैठे हुए ही पाओगे, अपने अन्तःपुर में जरा खोजो तो सही! ...”

<div align="center">

□ □ □

</div>