श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in context| २३० | श्रीरामकृष्णवचनामृत | १० जून, १८८३ |
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सकता था। कोई कहता था कि मै कालीयदमन नाटक-दल में था।”
एक भक्त नयी चद्दर ओढ़कर आए हैं। राखाल का बालक जैसा स्वभाव है - कैंची लाकर उनकी चद्दर के किनारे के सूतों को काटने जा रहे हैं। श्रीरामकृष्ण बोले, “क्यों काटता है? रहने दे। शाल की तरह अच्छा दिखायी देता है। हाँ जी, इसका क्या दाम है?” उन दिनों विलायती चद्दरों का दाम कम था। भक्त ने कहा, “एक रुपया छः आना जोड़ी।” श्रीरामकृष्ण बोले, “क्या कहते हो! जोड़ी! एक रुपया छः आना जोड़ी!”
थोड़ी देर बाद श्रीरामकृष्ण भक्त से कह रहे हैं, “जाओ, गंगा स्नान कर लो! अरे, इन्हें तेल दो तो थोड़ा'!”
स्नान के बाद जब वे लौटे तो श्रीरामकृष्ण ने ताक पर से एक आम लेकर उन्हे दिया। कहा, “यह आम इन्हें देता हूँ। तीन डिग्रियाँ पास हैं ये! अच्छा, तुम्हारा भाई अब कैसा है?”
भक्त – हाँ, दवा तो ठीक हो रही है, अब असर ठीक हो तो ठीक है!
श्रीरामकृष्ण – उसके लिए किसी नौकरी की व्यवस्था कर सकते हो? बुरा क्या है, तुम मुखिया बनोगे!
भक्त – स्वस्थ होने पर सभी सुविधाएँ हो जाएँगी।
(२)
साधन-भजन करो और व्याकुल होओ
श्रीरामकृष्ण भोजन के उपरान्त छोटे तख्त पर जरा बैठे हैं – अभी विश्राम करने का समय नहीं हुआ था। भक्तों का समागम होने लगा। पहले मणिरामपुर से भक्तों का एक दल आकर उपस्थित हुआ। एक व्यक्ति पी. डब्ल्यू. डी. में काम करते थे। इस समय पेन्शन पाते हैं। एक भक्त उन्हें लेकर आए हैं। धीरे धीरे बेलघर से भक्तों का एक दल आया। श्री मणि मल्लिक आदि भक्तगण भी धीरे धीरे आ पहुँचे।
मणिरामपुर के भक्तों ने कहा, “आपके विश्राम में विघ्न हुआ।”
श्रीरामकृष्ण बोले, “नहीं, नहीं, यह तो रजोगुण की बातें हैं कि वे अब सोएँगे।”
चाणक मणिरामपुर का नाम सुनकर श्रीरामकृष्ण को अपने बचपन के मित्र श्रीराम का स्मरण हुआ। श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, “श्रीराम की दूकान तुम्हारे वहीं पर है। श्रीराम मेरे साथ पाठशाला में पढ़ता था। थोड़े दिन हुए यहाँ पर आया था।”
मणिरामपुर के भक्तगण कह रहे हैं, “दया करके हमें जरा बता दीजिए कि किस उपाय से ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है।”
श्रीरामकृष्ण – थोड़ा साधन-भजन करना होता है। 'दूध में मक्खन है' केवल कहने से ही नहीं होता, दूध से दही बनाकर, मथन करके मक्खन उठाना पड़ता है। परन्तु बीच