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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

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DevanagariHindipublished711 pages

Page 245 of 711

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Page 245
२२२श्रीरामकृष्णवचनामृत५ जून, १८८३

करते, गाड़ी पर मुझे ले गए। छोटासा मकान और इधर एक बड़ी भारी गाड़ी पर एक बड़ा आदमी आया है; वह भी शरमा गयाऔर हम भी। फिर उसके लड़के का जनेऊ होनेवाला था। कहाँ बैठाए! हम लोग बाजू के कमरे में जाने लगे तो वह बोल उठा, 'वहाँ न जाइए, उस कमरे में औरतें हैं।' बड़ा असमंजस था। मथुरबाबू लौटते समय बोले, 'बाबा, तुम्हारी बात अब कभी न मानूँगा।' मैं हँसने लगा।

“कैसी अनोखी अवस्था थी! कुँवरसिंह ने साधुओ को भोजन कराना चाहा, मुझे भी न्योता दिया। जाकर देखा बहुतसे साधु आए हैं। मेरे बैठने पर साधुओ में से कोई कोई मेरा परिचय पूछने लगे – 'आप गिरी हैं या पुरी?' पर ज्योंही उन्होंने पूछा त्योंही मैं अलग जाकर बैठा। सोचा कि इतनी खबर काहे की? बाद को ज्योंही पत्तल बिछाकर भोजन के लिए बैठाया, किसी के कुछ कहने के पहले ही मैंने खाना शुरू कर दिया। साधुओं में से किसी किसी को कहते सुना, 'अरे यह क्या!'

(२)

साधु और अवतार में अन्तर

पाँच बजे हैं। श्रीरामकृष्ण अपने कमरे के बरामदे की सीढ़ी पर बैठे हैं। राखाल, हाजरा और मास्टर पास बैठे हैं।

हाजरा का भाव है – 'सोऽहं – मैं ही ब्रह्म हूँ।'

श्रीरामकृष्ण (हाजरा से) – हाँ, यह सोचने से सब गड़बड़ मिट जाती है, – वे ही आस्तिक हैं, वे ही नास्तिक; वे ही भले हैं, वे ही बुरे; वे ही नित्यवस्तु हैं, वे ही अनित्य जगत्; जागृति और निद्रा उन्हीं की अवस्थाएँ हैं; फिर वे ही इन सारी अवस्थाओं से परे भी हैं।

“एक किसान को बुढ़ापे में एक लड़का हुआ था। लड़के को वह बहुत यत्न से पालता था। धीरे धीरे लड़का बड़ा हुआ। एक दिन जब किसान खेत में काम कर रहा था, किसी ने आकर उसे खबर दी कि तुम्हारा लड़का बहुत बीमार है – अब-तब हो रहा है। उसने घर में आकर देखा, लड़का मर गया है। स्त्री खूब रो रही है; पर किसान की आँखों में आँसू तक नहीं। उसकी स्त्री अपनी पड़ोसिनों के पास इसलिए और भी शोक करनें लगी कि ऐसा लड़का चला गया, पर इनकी आँखों में आँसू का नाम नहीं! बड़ी देर बाद किसान ने अपनी स्त्री को पुकारकर कहा, 'मैं क्यों नहीं रोता, जानती हो? मैंने कल स्वप्न में देखा कि राजा हो गया हूँ और सात लड़कों का बाप बना हूँ। स्वप्न में ही देखा कि वे लड़के रूप और गुण में अच्छे हैं। क्रमशः वे बड़े हुए और विद्या तथा धर्म उपार्जन करने लगे। इतने में ही नींद खुल गयी। अब सोच रहा हूँ कि तुम्हारे इस एक लड़के के लिए रोऊँ या अपने उन सात लड़कों के लिए?' ज्ञानियों के मत से स्वप्न की अवस्था जैसी सत्य है,