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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

परिच्छेद ७८

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परिच्छेद ७८

ईश्वरलाभ ही जीवन का उद्देश्य है

(१)

दक्षिणेश्वर मन्दिर में राखाल, राम, आदि के साथ

रविवार, २३ मार्च १८८४। श्रीरामकृष्ण दोपहर के भोजन के बाद राखाल, राम आदि भक्तों के साथ बैठे हुए हैं। शरीर पूर्ण स्वस्थ नहीं है। अब तक हाथ में तख्ती बँधी हुई है।

शरीर अस्वस्थ रहने पर भी श्रीरामकृष्ण आनन्द की हाट लगाये हुए हैं। दल के दल भक्त आते हैं। सदैव ही ईश्वरी कथा-प्रसंग और आनन्द है। कभी कीर्तनानन्द और कभी समाधिमग्न होकर श्रीरामकृष्ण ब्रह्मानन्द का अनुभव कर रहे हैं। भक्तगण अवाक् होकर देखते हैं। श्रीरामकृष्ण वार्तालाप करने लगे।

राम – आर. मित्र की कन्या के साथ नरेन्द्र का विवाह ठीक हो रहा है। बहुत धन देने को कहता है।

श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – इसी तरह किसी दल का नेता बन जायगा। वह जिस-तरफ झुकेगा, उसी ओर बड़ा व्यक्ति होकर नाम पैदा करेगा।

श्रीरामकृष्ण ने फिर नरेन्द्र की बात ही न उठने दी।

श्रीरामकृष्ण – (राम से) – अच्छा, बीमार पड़ने पर मैं इतना अधीर क्यों हो जाया करता हूँ? कभी इससे पूछता हूँ, किस तरह अच्छा होऊँगा, कभी उससे पूछता हूँ!

“बात यह है कि विश्वास या तो सब पर करे या किसी पर न करे।

“वे ही डाक्टर और कविराज हुए हैं; इसलिए सभी चिकित्सकों पर विश्वास करना चाहिए। पर उन लोगों को आदमी सोचने पर विश्वास नहीं होता।

“शम्भू को घोर विकार था। डाक्टर सर्वाधिकारी ने देखकर बतलाया – दवा की गरमी है।

“हलधारी ने नाड़ी दिखायी, डाक्टर ने कहा – ‘आँख देखें – अच्छा! तुम्हारी प्लीहा बढ़ गयी है!’ हलधारी ने कहा – ‘मेरे प्लीहा-फीहा कहीं कुछ नहीं है।’

“मधु डाक्टर की दवा अच्छी है।”

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

४६६श्रीरामकृष्णवचनामृत२३ मार्च, १८८४

राम-दवा से फायदा नहीं होता, परन्तु इतना अवश्य होता है कि वह प्रकृति की बहुत कुछ सहायता जरूर करती है।

श्रीरामकृष्ण – दवा से अगर उपकार नहीं होता तो अफीम फिर कैसे दस्त रोक देती है?

राम केशव के देहान्त होने की बात कह रहे हैं।

राम – आपने तो ठीक ही कहा था – अच्छा गुलाब का पेड़ हुआ तो माली उसकी जड़ खोल देता है। ओस पाने पर पौधा और जोरदार होता है। सिद्धवचन का फल तो प्रत्यक्ष कर लिया।

श्रीरामकृष्ण – क्या जाने भाई, इतना तो हिसाब मैंने नहीं किया था, तुम्हीं कह रहे हो।

राम – उन लोगों ने आपकी बात समाचार-पत्रों में निकाल दी थी।

श्रीरामकृष्ण – छाप दी! यह क्या? अभी से छापना क्यों? मैं खाता हूँ – पड़ा रहता हूँ, बस, और मैं कुछ नहीं जानता।

“केशव सेन से मैंने कहा, छापा क्यों? उसने कहा – तुम्हारे पास लोग आयें इसलिए।

(राम आदि से) “आदमी की शक्ति से लोक-शिक्षा नहीं होती। ईश्वर की शक्ति के बिना अविद्या नहीं जीती जा सकती।

“दो आदमी कुश्ती लड़े – हनुमानसिंह और एक पंजाबी मुसलमान। मुसलमान खूब तगड़ा था। कुश्ती के दिन तथा उसके पन्द्रह दिन पहले उसने खूब मांस और घी खाया था। सब सोचते थे यही जीतेगा।

“हनुमानसिंह मैले कपड़े पहने रहता था। कुश्ती के कुछ दिन पहले वह बहुत कम खाया करता था, परन्तु महावीरजी का नाम खूब लेता था। जिस दिन कुश्ती होने की थी, उस दिन तो उसने निर्जल उपवास किया। लोग सोचने लगे, यह जरूर हारेगा।

“परन्तु जीता वही, और पन्द्रह दिन तक जिसने खूब खाया था, वह हार गया।

“धक्कमधक्का करने से क्या होगा? – जिसे लोक-शिक्षा देनी है, उसकी शक्ति ईश्वर के पास से आयेगी। और त्यागी हुए बिना लोक-शिक्षा नहीं होती।

“मैं हूँ मूर्खों का सिरमौर – ” (लोग हँसते हैं।)

एक भक्त – ऐसा है तो आप के मुँह से वेद-वेदान्त – इसके अलावा भी न जाने क्या क्या – कैसे निकलते हैं?

श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – परन्तु मेरे लड़कपन में लाहा बाबू के यहाँ साधु-महात्मा जो कुछ पढ़ते थे, वह सब मैं समझ लेता था, परन्तु कहीं कहीं समझ में आता भी नहीं था। कोई पण्डित आकर यदि संस्कृत बोलता है तो मैं समझ लेता हूँ। परन्तु खुद