श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
२८ नवम्बर, १८८३ | परिच्छेद ५९ | ३४५
२८ नवम्बर, १८८३ | परिच्छेद ५९ | ३४५
लोगों ने एक कोच पर ले जाकर बैठाया।
कोच पर बैठते ही श्रीरामकृष्ण फिर बाह्यज्ञान-रहित भावाविष्ट हो गये।
कोच पर दृष्टि डालकर आवेश में मानो कुछ कह रहे हैं, – "पहले इन सब चीजों की आवश्यकता थी, अब क्या आवश्यकता है?" (राखाल को देखकर) "राखाल, तू भी आया है?"
जगन्माता के साथ वार्तालाप
कहते ही कहते फिर न जाने क्या देख रहे हैं। कहते हैं – "यह लो, माँ आ गयीं। और अब बनारसी साड़ी पहनकर क्या दिखलाती हो! माँ, गोलमाल न करो, बैठो – बैठो भी।"
श्रीरामकृष्ण पर महाभाव का नशा चढ़ा हुआ है। कमरे में प्रकाश भर रहा है। ब्राह्मभक्त चारों ओर से घेरे हुए हैं। लाटू, राखाल, मास्टर आदि पास बैठे हुए हैं। श्रीरामकृष्ण भावावस्था में आप ही आप कह रहे हैं –
"देह और आत्मा। देह बनी है और बिगड़ भी जाएगी आत्मा अमर है। जैसे सुपारी – पकी सुपारी छिलके से अलग रहती है; कच्ची अवस्था में फल और छिलके को अलग अलग करना बड़ा कठिन है। उनके दर्शन करने पर, उन्हें प्राप्त करने पर देहबुद्धि दूर हो जाती है। तब समझ में आ जाता है कि आत्मा पृथक् है और देह भी।"
केशव कमरे में आ रहे हैं। पूर्व ओर के द्वार से आ रहे हैं। जिन लोगों ने उन्हें ब्राह्मसमाज-मन्दिर में अथवा टाउन-हाल में देखा था, वे उनकी अस्थि-चर्मावशिष्ट मूर्ति देखकर चकित हो गए। केशव खड़े नहीं हो सकते, दीवार के सहारे आगे बढ़ रहे हैं। बहुत कष्ट करके कोच के सामने आकर बैठे।
श्रीरामकृष्ण इतने ही में कोच से उतरकर नीचे बैठे। केशव श्रीरामकृष्ण के दर्शन पाकर भूमिष्ठ हो बड़ी देर तक उन्हें प्रणाम करते रहे। प्रणाम करके उठकर बैठ गए श्रीरामकृष्ण अब भी भावावेश में हैं। आप ही आप कुछ कह रहे हैं। श्रीरामकृष्ण माता के साथ बातचीत कर रहे हैं।
(३)
ब्रह्म और शक्ति अभेद। नरलीला। सिद्ध और साधक में भेद
अब केशव ने उच्च स्वर से कहा, "मैं आया – मैं आया।" यह कहकर उन्होंने श्रीरामकृष्ण का बायाँ हाथ पकड़ लिया और उसी हाथ पर अपना हाथ फेरने लगे। श्रीरामकृष्ण भावावेश में पूरे मतवाले हो गये हैं; आप ही आप कितनी ही बातें कर रहे हैं। भक्तगण निर्वाक् होकर सुन रहे हैं।
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| ३४६ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २८ नवम्बर, १८८३ |
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श्रीरामकृष्ण – जब तक उपाधि है, तभी तक अनेक का बोध हो सकता है, जैसे केशव, प्रसन्न, अमृत – ये सब। पूर्ण ज्ञान होने पर एकमात्र चैतन्य का ही बोध होता है।
“पूर्ण ज्ञान होने पर मनुष्य देखता है, वही एकमात्र चैतन्य यह जीव-प्रपंच, ये चौबीसों तत्त्व बने हैं।
“परन्तु शक्ति की विशेषता पायी जाती है। यह सच है कि सब कुछ वे ही बने हैं, परन्तु कहीं तो उनकी शक्ति का प्रकाश अधिक है और कहीं कम।
“विद्यासागर ने कहा था, क्या ईश्वर ने किसी को अधिक शक्ति और किसी को कम शक्ति दी है मैंने कहा, अगर ऐसा न होता तो एक आदमी पचास आदमियों को हराता कैसे – और तुम्हें ही फिर क्यों हम लोग देखने आते ?
“वे जिस आधार में अपनी लीला का विकास दिखलाते हैं, वहाँ शक्ति की विशेषता रहती है।
“जमींदार सब जगह पर रहते हैं। परन्तु उन्हें लोग किसी खास बैठकखाने में अक्सर बैठते हुए देखते हैं। ईश्वर का बैठकखाना भक्तों का हृदय है। वहाँ अपनी लीला दिखाना उन्हें अधिक पसन्द है। वहाँ उनकी विशेष शक्ति अवतीर्ण होती है।
“इसका लक्षण क्या है? जहाँ कार्य की अधिकता है वहाँ शक्ति का विशेष प्रकाश है।
“यह आद्याशक्ति और परब्रह्म दोनों अभेद हैं। एक को छोड़ दूसरे का चिन्तन नहीं किया जा सकता। जैसे ज्योति और मणि। मणि को छोड़ मणि की ज्योति के बारे में सोचा नहीं जा सकता और न ज्योति को अलग करके मणि के बारे में ही सोचा जा सकता है। जैसे सर्प और उसकी वक्रगति। न सर्प को छोड़ उसकी तिर्यग्-गति सोची जा सकती है और न तिर्यग्-गति को छोड़ सर्प को।
सिद्ध और साधक मे भेद
“आद्याशक्ति ने ही इस जीव-प्रपंच, इस चतुर्विंशति तत्त्व का स्वरूप धारण किया है – अनुलोम और विलोम। राखाल, नरेन्द्र तथा और और लड़कों के लिए क्यों मैं इतना सोच विचार किया करता हूँ? हाजरा ने कहा, तुम उन लोगों के लिए इतना सोचते क्यों हो, ईश्वर-चिन्तन फिर कब करोगे (केशव तथा दूसरों का मुसकराना)
“तब मुझे बड़ी चिन्ता हुई। मैंने कहा, माँ यह क्या हुआ! हाजरा कहता है, उन लोगों के लिए क्यों सोचते रहते हो? फिर मैंने भोलानाथ से पूछा। उसने कहा, इसका उदाहरण महाभारत में है। समाधिस्थ मनुष्य समाधि से उतरकर ठहरे कहाँ? वह इसीलिये सतोगुणी मनुष्यों को लेकर रहता है। महाभारत का यह उदाहरण जब मिला तब जी में जी आया। (सब हँसते हैं।)
CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar