श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
८ अप्रैल, १८८३ | परिच्छेद २९ | १८३
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के डिप्टी इन्स्पेक्टर रह चुके हैं। अब पेन्शन ले ली है। साधन-भजन पहले ही से कर रहे हैं। बड़े लड़के का देहान्त हो जाने से किसी तरह मन को सान्त्वना नहीं मिलती। इसीलिए अधर उन्हें श्रीरामकृष्ण के पास ले आये हैं। बहुत दिनों से अधर स्वयं भी श्रीरामकृष्ण को देखना चाहते थे।
श्रीरामकृष्ण की समाधि छूटी। आँखें खोलकर आपने देखा, कमरे भर के लोग आपकी ओर ताक रहे हैं। उस समय आप अपने आप कुछ कहने लगे।
क्या श्रीरामकृष्ण के मुँह से ईश्वर स्वयं उपदेश दे रहे हैं!
श्रीरामकृष्ण – “कभी कभी विषयी मनुष्यों मे ज्ञान का उन्मेष होता है, वह दीपशिखा की तरह दीख पड़ता है, – नहीं नहीं, सूर्य की किरण की तरह; छेद के भीतर से मानो किरण निकल रही है। विषयी मनुष्य और ईश्वर का नाम! उसमें अनुराग नहीं होता। जैसे बालक कहता है, तुझे भगवान् की कसम है। घर की स्त्रियों का झगड़ा सुनकर ‘भगवान् की कसम’ याद कर ली है।
“विषयी मनुष्यों में निष्ठा नहीं होती। हुआ हुआ, न हुआ तो न सही। पानी की जरूरत है, कुआँ खोद रहा है। खोदते खोदते जैसे ही कंकड़ निकला कि बस छोड़ दी वह जगह, दूसरी जगह खोदने लगा। लो, वहाँ भी बालू ही बालू निकलती है! बस वहाँ से भी अलग हुआ। जहाँ खोदना आरम्भ किया है, वहीं जब खोदता रहे तभी तो पानी मिलेगा।
“जीव जैसे कर्म करता है वैसे ही फल भी पाता है।
“इसीलिए गाने में कहा है –
(भावार्थ) – ‘“माँ श्यामा! दोष किसी का नहीं, मैं अपने ही हाथों खोदे हुए कुएँ के पानी में डूब रहा हूँ।’
‘“‘मैं’ ओर ‘मेरा’ अज्ञान है। विचार तो करो, देखोगे जिसे ‘मैं’ कह रहे हो, वह आत्मा के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। विचार करो – तुम शरीर हो या हाड़ हो या मांस या और कुछ? तब देखोगे, तुम कुछ नहीं हो। तुम्हारी कोई उपाधि नहीं। तब कहोगे, मैंने कुछ भी नहीं किया; मेरे न दोष हैं, न गुण; न पाप है, न पुण्य।
“यह सोना है और यह पीतल, ऐसे विचार को अज्ञान कहते हैं और सब कुछ सोना है, इसे ज्ञान।
“ईश्वरदर्शन होने पर विचार बन्द हो जाता है। फिर ऐसा भी है कि कोई ईश्वरलाभ करके भी विचार करता है। कोई भक्ति लेकर रहता है, उनका गुणगान करता है।
“बच्चा तभी तक रोता है जब तक उसे माता का दूध पीने को नहीं मिलता। मिला कि रोना बन्द हो गया। तब आनन्दपूर्वक पीता रहता है। परन्तु एक बात है। कभी कभी वह दूध पीते पीते खेलता भी है और आनन्द से किलकारियाँ भरता है।
| १८४ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | ८ अप्रैल, १८८३ |
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"वे ही सब कुछ हुए हैं। परन्तु मनुष्य में उनका प्रकाश अधिक है। जहाँ शुद्धसत्त्व बालकों का-सा स्वभाव है कि कभी हँसता है, कभी रोता है, कभी नाचता है, कभी गाता है, वहाँ वे प्रत्यक्ष भाव से रहते हैं।"
श्रीरामकृष्ण अधर का कुशलसमाचार ले रहे हैं। अधर ने अपने मित्र के पुत्रशोक का हाल कहा। श्रीरामकृष्ण अपने ही भाव में गाने लगे –
(भावार्थ) – "'जीव! समर के लिए तैयार हो जाओ। रण के वेश में काल तुम्हारे घर में घुस रहा है। भक्ति-रथ पर चढ़कर, ज्ञान-तूण लेकर रसना-धनुष में प्रेम गुण लगा, ब्रह्ममयी के नामरूपी ब्रह्मास्त्र का सन्धान करो। लड़ाई के लिए एक युक्ति और है। तुम्हें रथ-रथी की आवश्यकता न होगी यदि भागीरथी के तट पर तुम्हारी यह लड़ाई हो।'
"क्या करोगे? इस काल के लिए तैयार हो जाओ। काल घर में घुस रहा है। उनका नामरूपी अस्त्र लेकर लड़ना होगा। कर्ता वे ही हैं। मैं कहता हूँ, 'जैसा कराते हो, वैसा ही करता हूँ। जैसा कहाते हो, वैसा ही कहता हूँ। मैं यन्त्र हूँ, तुम यन्त्री; मैं घर हूँ, तुम घर के मालिक; मैं गाड़ी हूँ, तुम इंजिनियर।'
"आममुख़्तार उन्हीं को बनाओ। काम का भार अच्छे आदमी को देने से कभी अमंगल नहीं होता। उनकी जो इच्छा हो, करे।
"शोक भला क्यों नहीं होगा। आत्मज है न। रावण मरा तो लक्ष्मण दौड़े हुए गए, देखा, उसके हाड़ो में ऐसी जगह नहीं थी जहाँ छेद न रहे हो। लौटकर राम से बोले – भाई, तुम्हारे बाणों की बड़ी महिमा है, रावण की देह में ऐसी जगह नहीं है जहाँ छेद न हों! राम बोले – हाड के भीतरवाले छेद हमारे बाणों के नहीं है, मारे शोक के उसके हाड़ जर्जर हो गए हैं। वे छेद शोक के ही चिह्न हैं।
"परन्तु है यह सब अनित्य। गृह, परिवार, सन्तान, सब दो दिन के लिए है। ताड़ का पेड़ ही सत्य है। दो एक फल गिर जाते हैं। इसके लिए दुःख क्यों?
"ईश्वर तीन काम करते हैं, - सृष्टि, स्थिति और प्रलय। मृत्यु है ही। प्रलय के समय सब ध्वंस हो जाएगा, कुछ भी न रह जाएगा। माँ केवल सृष्टि के बीज बीनकर रख देंगी। फिर नयी सृष्टि होने के समय उन्हें निकालेंगी। घर की स्त्रियों के जैसे हण्डी रहती है जिसमें वे खीरे-कोहड़े के बीज, समुद्रफेन, नील का डला आदि छोटी छोटी पोटलियों में बाँधकर रख देती हैं।" (सब हँसते हैं।)
(६)
अधर को उपदेश
श्रीरामकृष्ण अधर के साथ अपने कमरे के उत्तरी ओर के बरामदे में खड़े होकर बातचीत कर रहे हैं।