श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
८ अप्रैल, १८८३ | परिच्छेद २९ | १७९
८ अप्रैल, १८८३ | परिच्छेद २९ | १७९
की तृष्णा छूटती ही नहीं, अब मैं कैसे जीवित रह सकता हूँ? सर्वमंगले, जो कुछ कहता हूँ सब अनित्य प्रलाप है। आँखों से माया की नींद किसी तरह नहीं छूटती। पेट में हिंसा की कृमि हो गयी है। व्यर्थ कामों में घूमते रहने का भ्रमरोग हो गया है। जब तुम्हारे नाम ही पर अरुचि है, तब भला इस रोग से मैं कैसे बच सकूँगा?''
श्रीरामकृष्ण – उनके नाम में अरुचि। रोग में यदि अरुचि हो गयी तो फिर बचने की राह नहीं रह जाती। यदि जरा भी रुचि हो तो बचने की बहुत-कुछ आशा है। इसीलिए नाम में रुचि होनी चाहिए। ईश्वर का नाम लेना चाहिए – दुर्गानाम, कृष्णनाम, शिवनाम, चाहे जिस नाम से पुकारो। यदि नाम लेने में दिनदिन अनुराग बढ़ता जाय, आनन्द हो तो फिर कोई भय नहीं, – विकार दूर होगा ही, उनकी कृपा अवश्य होगी।
आन्तरिक भक्ति तथा दिखावटी भक्ति। भगवान मन देखते हैं।
“जैसा भाव होता है लाभ भी वैसा ही होता है। रास्ते से दो मित्र जा रहे थे। एक जगह भागवत पाठ चल रहा था। एक मित्र ने कहा, “आओ भाई, जरा भागवत सुने। दूसरे ने जरा झाँककर देखा। फिर वहाँ से वेश्या के घर चला गया। वहाँ कुछ देर बाद उसके मन में बड़ी विरक्ति हो आयी। वह आप ही आप कहने लगा, 'मुझे धिक्कार है! मेरा मित्र तो भागवत सुन रहा है और मैं यहाँ कहाँ पड़ा हूँ!' इधर जो व्यक्ति भागवत सुन रहा था वह भी अपने मन को धिक्कार रहा था। वह कह रहा था, मैं कैसा मूर्ख हूँ! यह पण्डित न जाने क्या बक रहा है और मैं यहाँ बैठा हुआ हूँ! मेरा मित्र वहाँ कैसे आनन्द में होगा!' जब ये दोनों मरे तब जो भागवत सुन रहा था, उसे तो यमदूत ले गए और जो वेश्या के घर गया था, उसे विष्णु के दूत वैकुण्ठ में ले गए।
“भगवान् मन देखते हैं। कौन क्या कर रहा है, कहाँ पड़ा हुआ है, यह नहीं देखते। 'भावग्राही जनार्दनः।'
“कर्ताभिजा सम्प्रदाय के लोग मन्त्रदीक्षा देने के समय कहते हैं, 'अब मन तेरा है'। अर्थात् अब सब कुछ तेरे मन पर निर्भर है।
“वे कहते हैं, जिसका मन ठीक है, उसका करण ठीक है, वह अवश्य ईश्वर को प्राप्त करेगा।
“मन के ही गुण से हनुमान समुद्र पार कर गए। 'मैं श्रीरामचन्द्र का दास हूँ, मैंने रामनाम उच्चारण किया है, मैं क्या नहीं कर सकता' – विश्वास इसे कहते हैं।
ईश्वरदर्शन क्यों नहीं होते? – अहंभाव के कारण
“जब तक अहंकार है तब तक अज्ञान है। अहंकार के रहते मुक्ति नहीं होती।
“गौएँ 'हम्मा' 'हम्मा' करती है और बकरे 'में' 'में' करते हैं। इसीलिए उनको इतना
१८० श्रीरामकृष्णवचनामृत ८ अप्रैल, १८८३
कष्ट भोगना पड़ता है। कसाई काटते है, चमड़े से जूते बनते हैं, ढोल मढ़ा जाता है - दुःख की पराकाष्ठा हो जाती है। हिन्दी में अपने को 'हम' कहते हैं और 'मैं' भी कहते हैं। 'मैं' 'मैं' करने के कारण कितने कर्म भोगने पड़ते हैं! अन्त में आँतों से धनुहे की ताँत बनायी जाती है। धनुहे के हाथ में जब वह पड़ती है, तब 'तू' 'तू' कहती है। 'तू' कहने के बाद निस्तार होता है। फिर दुःख नहीं उठाना पड़ता।
“हे ईश्वर, तुम कर्ता हो और मैं अकर्ता हूँ, इसी का नाम ज्ञान है।
“नीचे आने से ही ऊँचे उठा जाता है। चातक पक्षी का घोसला नीचे रहता है, परन्तु वह बहुत ऊँचे उड़ जाता है। ऊँची जमीन में कृषि नहीं होती। नीची जमीन चाहिए। पानी उसी में रुकता है। तभी कृषि होती है।
साधुसंग तथा प्रार्थना
“कुछ कष्ट उठाकर सत्संग करना चाहिए। घर में तो केवल विषय-चर्चा होती है, रोग लगा ही रहता है। जब चिड़िया सीखचे पर बैठती है तभी 'राम राम' बोलती है, जब वन में उड़ जाती है तब वही 'टें टें' करने लगती है।
“धन होने से ही कोई बड़ा आदमी नहीं हो जाता। बड़े आदमी के घर का यह लक्षण है कि सब कमरों में दिये जलते रहते हैं। गरीब तेल नहीं खर्च कर सकते; इसीलिए दिये का वैसा बन्दोबस्त नहीं कर सकते। यह देहमन्दिर अँधेरे में न रखना चाहिए, ज्ञानदीप जला देना चाहिए! 'ज्ञानदीप जलाकर ब्रह्ममयी का मुँह देखो।'
“ज्ञान सभी को हो सकता है। जीवात्मा और परमात्मा। प्रार्थना करो, उस परमात्मा के साथ सभी जीवों का योग हो सकता है। गैस का नल सब घरों में लगाया हुआ है और गैस गैसकम्पनी के यहाँ मिलती है। अर्जी भेजो, गैस का बन्दोबस्त हो जायगा, घर में गैसबत्ती जल जायगी। सियालदह में आफिस है। (सब हँसते हैं।)
“किसी किसी को चैतन्य हुआ है इसके लक्षण भी हैं। ईश्वरी प्रसंग को छोड़ और कुछ सुनने को उसका जी नहीं चाहता। ईश्वरी प्रसंग के सिवा कोई दूसरी बात करना उसे अच्छा नहीं लगता। जैसे सातों समुद्र, गंगा-यमुना और सब नदियों में पानी है, परन्तु चातक को वर्षा की बूँदों की ही रट रहती है। चाहे मारे प्यास के छाती फट जाय, परन्तु वह दूसरा पानी कभी नहीं पीता।”
(४)
गोपीप्रेम। 'अनुरागरूपी बाघ'
श्रीरामकृष्ण ने कुछ गाने के लिए कहा। रामलाल और कालीमन्दिर के एक ब्राह्मण कर्मचारी गाने लगे। ठेका लगाने के लिए एक बायाँ मात्र था। कुछ भजन गाये गये।