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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

५ मार्च, १८८२ | परिच्छेद ३ | १३

५ मार्च, १८८२परिच्छेद ३१३

से व्यवहार या अधिक हेल-मेल नहीं चल सकता। किसी से सिर्फ बातचीत भर कर लेनी चाहिए और किसी से वह भी नहीं। ऐसे आदमियों से अलग रहना चाहिए।”

एक भक्त – महाराज, यदि दुष्ट जन अनिष्ट करने पर उतारू हों या कर डालें तो क्या चुपचाप बैठे रहना चाहिए ?

गृहस्थ तथा तमोगुण

श्रीरामकृष्ण – दुष्ट जनों के बीच रहने से उनसे अपना जी बचाने के लिए कुछ तमोगुण दिखाना चाहिए; परंतु कोई अनर्थ कर सकता है, यह सोचकर उलटा उसी का अनर्थ न करना चाहिए।

“किसी जंगल में कुछ चरवाहे गौएँ चराते थे। वहाँ एक बड़ा विषधर सर्प रहता था। उसके डर से लोग बड़ी सावधानी से आया-जाया करते थे। किसी दिन एक ब्रह्मचारीजी उसी रास्ते से आ रहे थे। चरवाहे दौड़ते हुए उनके पास आये और उनसे कहा – ‘महाराज, इस रास्ते से न जाइए; यहाँ एक साँप रहता है, बड़ा विषधर है।’ ब्रह्मचारीजी ने कहा – ‘तो क्या हुआ, बेटा, मुझे कोई डर नहीं, मैं मन्त्र जानता हूँ।’ यह कहकर ब्रह्मचारीजी उसी ओर चले गए। डर के मारे चरवाहे उनके साथ न गए। इधर साँप फन उठाये झपटता चला आ रहा था, परन्तु पास पहुँचने के पहले ही ब्रह्मचारीजी ने मन्त्र पढ़ा। साँप आकर उनके पैरों पर लोटने लगा। ब्रह्मचारीजी ने कहा – ‘तू भला हिंसा क्यों करता है? ले, मैं तुझे मन्त्र देता हूँ। इस मन्त्र को जपेगा तो ईश्वर पर भक्ति होगी, तुझे ईश्वर के दर्शन होंगे; फिर यह हिंसावृत्ति न रह जाएगी।’ यह कहकर ब्रह्मचारीजी ने साँप को मन्त्र दिया। मन्त्र पाकर साँप ने गुरु को प्रणाम किया, और पूछा – ‘भगवन्, मैं क्या साधना करूँ?’ गुरु ने कहा – ‘इस मन्त्र को जप और हिंसा छोड़ दे।’ चलते समय ब्रह्मचारीजी फिर आने का वचन दे गए।

“इस प्रकार कुछ दिन बीत गए। चरवाहों ने देखा कि साँप अब काटता नहीं, ढेला मारने पर भी गुस्सा नहीं होता, केंचुए की तरह हो गया है। एक दिन चरवाहों ने उसके पास जाकर पूँछ पकड़कर उसे घुमाया और वहीं पटक दिया। साँप के मुँह से खून बह चला, वह बेहोश पड़ा रहा; हिल-डुल तक न सकता था। चरवाहों ने सोचा कि साँप मर गया और यह सोचकर वहाँ से वे चले गए।

“जब बहुत रात बीती तब साँप होश में आया और धीरे धीरे अपने बिल के भीतर गया। देह चूर चूर हो गयी थी, हिलने तक की शक्ति नहीं रह गयी थी। बहुत दिनों के बाद जब चोट कुछ अच्छी हुई तब भोजन की खोज में बाहर निकला। जब से मारा गया तब से सिर्फ रात को ही बाहर निकलता था। हिंसा करता ही न था। सिर्फ घास-फूस, फल-फूल खाकर रह जाता था।

१४ श्रीरामकृष्णवचनामृत ५ मार्च, १८८२

“सालभर बाद ब्रह्मचारी फिर आए। आते ही साँप की खोज करने लगे। चरवाहों ने कहा, ‘वह तो मर गया है’, पर ब्रह्मचारीजी को इस बात पर विश्वास न आया। वे जानते थे कि जो मन्त्र वे दे गए हैं, वह जब तक सिद्ध न होगा तब तक उसकी देह छूट नहीं सकती। ढूँढ़ते हुए उसी ओर वे अपने दिए हुए नाम से साँप को पुकारने लगे। बिल से गुरुदेव की आवाज सुनकर साँप निकल आया और बड़े भक्तिभाव से प्रणाम किया। ब्रह्मचारीजी ने पूछा, ‘क्यों कैसा है?’ उसने कहा, ‘जी अच्छा हूँ।’ ब्रह्मचारीजी – ‘तो तू इतना दुबला क्यों हो गया?’ साँप ने कहा – ‘महाराज, जब से आप आज्ञा दे गए, तब से मैं हिंसा नहीं करता; फल-फूल, घास-पात खाकर पेट भर लेता हूँ; इसीलिए शायद दुबला हो गया हूँ।’ सत्त्वगुण बढ़ जाने के कारण किसी पर वह क्रोध न कर सकता था। इसी से मार की बात भी वह भूल गया था। ब्रह्मचारीजी ने कहा, ‘सिर्फ न खाने ही से किसी की यह दशा नहीं होती, कोई दूसरा कारण अवश्य होगा, तू अच्छी तरह सोच तो।’ साँप को चरवाहों की मार याद आ गयी। उसने कहा – ‘हाँ महाराज, अब याद आयी, चरवाहों ने एक दिन मुझे पटक-पटककर मारा था। उन अज्ञानियों को तो मेरे मन की अवस्था मालूम थी नहीं। वे क्या जानें कि मैंने हिंसा करना छोड़ दिया है!’ ब्रह्मचारीजी बोले – ‘राम राम, तू ऐसा मूर्ख है? अपनी रक्षा करना भी तू नहीं जानता? मैंने तो तुझे काटने ही को मना किया था, पर फुफकारने से तुझे कब रोका था? फुफकार मारकर उन्हें भय क्यों नहीं दिखाया?’

“इस तरह दुष्टों के पास फुफकार मारना चाहिए, भय दिखाना चाहिए, जिससे कि वे अनिष्ट न कर बैठें; पर उनमें विष न डालना चाहिए, उनका अनिष्ट न करना चाहिए।”

भिन्न भिन्न स्वभाव। क्या सब आदमी बराबर हैं?

श्रीरामकृष्ण – परमात्मा की सृष्टि में नाना प्रकार के जीवजन्तु और पेड़-पौधे हैं। पशुओं में अच्छे हैं और बुरे भी। उनमें बाघ जैसा हिंस्र प्राणी भी है। पेड़ों में अमृत जैसे फल लगें ऐसे भी पेड़ हैं और विष जैसे फल हों ऐसे भी हैं। इसी प्रकार मनुष्यों में भी भले-बुरे और साधु-असाधु हैं। उनमें संसारी जीव भी हैं और भक्त भी।

“जीव चार प्रकार के होते हैं। बद्ध, मुमुक्षु, मुक्त और नित्य।

“नारदादि नित्यजीव हैं। ऐसे जीव औरों के हित के लिए उन्हें शिक्षा देने के लिए संसार में रहते हैं।

“बद्ध जीव विषय में फँसा रहता है। वह ईश्वर को भूल जाता है, भगवच्चिन्तन वह कभी नहीं करता।

“मुमुक्षु जीव वह है जो मुक्ति की इच्छा रखता है। मुमुक्षुओं में से कोई कोई मुक्त हो जाते हैं, कोई कोई नहीं हो सकते।