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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

५ जून, १८८३ | परिच्छेद ३७ | २२५

५ जून, १८८३परिच्छेद ३७२२५

पान लाना। भवनाथ की भक्ति कैसी है, देखी है तुमने? भवनाथ और नरेन्द्र मानो स्त्री और पुरुष हैं। भवनाथ नरेन्द्र का अनुगत हैं। नरेन्द्र को गाड़ी पर ले आना। कुछ खाने की चीज लाना। इससे बहुत भला होता है।

ज्ञानपथ और नास्तिकता

“ज्ञान और भक्ति – दोनों ही मार्ग हैं। भक्तिमार्ग में आचार कुछ अधिक पालन करना पड़ता है। ज्ञानमार्ग में यदि कोई अनाचार भी करे तो वह मिट जाता है। खूब आग जलाकर एक केले का पेड़ भी झोंक दो, वह भी भस्म हो जाता है।

“ज्ञानी का मार्ग विचारमार्ग है। विचार करते करते कभी कभी नास्तिकपन भी आ सकता है। पर भगवान् को जानने के लिए भक्त की यदि हार्दिक इच्छा हो, तो नास्तिकता आने पर भी वह ईश्वरचिन्तन नहीं त्यागता। जिसके बाप-दादे किसानी करते आ रहे हैं, अतिवृष्टि और अनावृष्टि के कारण किसी साल फसल न होने पर भी वह खेती करता ही रहता है।”

श्रीरामकृष्ण लेटे लेटे बातें कर रहे हैं। बीच में मणि से बोले, “मेरा पैर थोड़ा दर्द कर रहा है, जरा हाथ फेर दो।”

अहेतुक कृपासिन्धु गुरुदेव के कमलचरणों की सेवा करते हुए, मणि उनके श्रीमुख से वे अपूर्व तत्त्व सुन रहे हैं।