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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

४ जून, १८८३ | परिच्छेद ३६ | २१९

४ जून, १८८३परिच्छेद ३६२१९

श्रीरामकृष्ण और सतीत्त्व धर्म

शाम हो गयी। दासी कमरे में धूनी दे गयी। मणिलाल आदि के चले जाने के बाद दो एक भक्त अभी बैठे हैं। कमरा शान्त और धूने से सुवासित है। श्रीरामकृष्ण अपने छोटे तख्त पर बैठे हुए जगन्माता का चिंतन कर रहे हैं। मास्टर और राखाल जमीन पर बैठे हैं।

थोड़ी देर बाद मथुरबाबू के घर की दासी भगवती ने आकर दूर से श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया। आपने उसे बैठने के लिए कहा। भगवती बाबू की बहुत पुरानी दासी है। बहुत साल से बाबू के यहाँ रह रही है। श्रीरामकृष्ण उसे बहुत दिनों से जानते हैं। पहले पहल उसका स्वभाव अच्छा न था; पर श्रीरामकृष्ण दया के सागर, पतितपावन हैं, इसीलिए उससे पुरानी बातें कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – अब तो तेरी उम्र बहुत हुई है। जो रुपये कमाए हैं उनसे साधु-वैष्णवों को खिलाती है या नहीं?

भगवती (मुसकराकर) – यह भला कैसे कहूँ?

श्रीरामकृष्ण – काशी, वृन्दावन यह सब तो हो आयी?

भगवती (थोड़ा सकुचाती हुई) – कैसे बतलाऊँ? एक घाट बनवा दिया है उसमें पत्थर पर मेरा नाम लिखा है।

श्रीरामकृष्ण – ऐसी बात!

भगवती – हाँ, नाम लिखा है, 'श्रीमती भगवती दासी।'

श्रीरामकृष्ण (मुसकराकर) – बहुत अच्छा।

भगवती ने साहस पाकर श्रीरामकृष्ण के चरण छूकर प्रणाम किया।

बिच्छू के काटने से जैसे कोई चौंक उठता है और अस्थिर हो खड़ा हो जाता है, वैसे ही श्रीरामकृष्ण अधीर हो, 'गोविन्द' 'गोविन्द' उच्चारण करते हुए खड़े हो गए। कमरे के कोने में गंगाजल का एक मटका था – और अब भी है – हाँफते हाँफते, मानो घबराए हुए, उसी के पास गए और पैर के जिस स्थान को दासी ने छुआ था, उसे गंगाजल से धोने लगे।

दो-एक भक्त जो कमरे में थे, स्तब्ध और चकित हो एकटक यह दृश्य देख रहे हैं। दासी जीवन्मृत की तरह बैठी है। दयासिन्धु पतितपावन श्रीरामकृष्ण ने दासी से करुणा से सने हुए स्वर में कहा, "तुम लोग ऐसे ही प्रणाम करना।" यह कहकर फिर आसन पर बैठकर दासी को बहलाने की चेष्टा करते रहे। उन्होंने कहा, "कुछ गाते हैं, सुन।" यह कहकर उसे गाना सुनाने लगे। –

(१) (भावार्थ) – "मेरा मनमधुप श्यामापद-नीलकमल में मस्त हो गया। कामादि पुष्पों में जितने विषय-मधु थे सब तुच्छ हो गए। ..."

२२०श्रीरामकृष्णवचनामृत४ जून, १८८३

(२) (भावार्थ) – “श्यामा माँ के चरणरूपी आकाश में मन की पतंग उड़ रही थी। कलुष की कुवायु से वह चक्कर खाकर गिर पड़ी। ...”

(३) (भावार्थ) – “मन! अपने आप में रहो। किसी दूसरे के घर न जाओ। जो कुछ चाहोगे वह बैठे हुए ही पाओगे, अपने अन्तःपुर में जरा खोजो तो सही! ...”

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