श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
३० जून, १८८४ | परिच्छेद ८५ | ५६१
३० जून, १८८४ | परिच्छेद ८५ | ५६१
पण्डितजी सन्ध्या करने गये। मास्टर और बाबूराम कलकत्ता जायेंगे, श्रीरामकृष्ण को प्रणाम कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण अब भी भावावेश में हैं।
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – बात नहीं निकलती, जरा ठहरो अभी।
मास्टर बैठे। श्रीरामकृष्ण की क्या आज्ञा होती है, इसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण ने इशारे से बाबूराम से बैठने के लिए कहा। बाबूराम ने मास्टर से कहा, जरा देर और बैठिये। श्रीरामकृष्ण ने बाबूराम से हवा करने के लिए कहा। बाबूराम पंखा झल रहे हैं, और मास्टर भी।
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से, सस्नेह) – तुम अब उतना नहीं आते, क्यों?
मास्टर – जी, कोई खास कारण नहीं है। घर में काम था।
श्रीरामकृष्ण – बाबूराम का घर कहाँ है, यह मैं कल समझा। इसीलिए तो इसे रखने की इतनी कोशिश कर रहा हूँ। चिड़िया समय समझकर अण्डे फोड़ती है। बात यह है कि ये सब शुद्धात्मा लड़के हैं, कभी कामिनी और कांचन में नहीं पड़े। है न?
मास्टर – जी हाँ। अभी तक कोई धक्का नहीं लगा।
श्रीरामकृष्ण – नयी हण्डी है, दूध रखा जाय तो बिगड़ नहीं सकता।
मास्टर – जी हाँ।
श्रीरामकृष्ण – बाबूराम के यहाँ रहने की जरूरत भी है। कभी कभी मेरी अवस्था ऐसी हो जाती है कि उस समय ऐसे आदमियों का रहना जरूरी हो जाता है। उसने कहा है, धीरे धीरे रहूँगा, नहीं तो घरवाले शोरगुल मचायेंगे। मैंने कहा है, शनिवार और रविवार को आ जाया कर।
इधर पण्डितजी सन्ध्या करके आ गये। उनके साथ भूधर और बड़े भाई भी थे। पण्डितजी अब जलपान करेंगे।
भूधर के बड़े भाई कह रहे हैं, हम लोगों का क्या होगा, जरा कुछ आज्ञा कर दीजिये।
श्रीरामकृष्ण – तुम लोग मुमुक्षु हो। व्याकुलता के होने से ईश्वर मिलते हैं। श्राद्ध का अन्न न खाया करो। संसार में व्यभिचारिणी स्त्री की तरह होकर रहो। व्यभिचारिणी स्त्री घर का सब काम बड़ी प्रसन्नता से करती है, परन्तु उसका मन दिन-रात उसके यार के साथ रहता है। संसार का काम करो, परन्तु मन ईश्वर पर रखो।
पण्डितजी जलपान कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण कहते हैं, आसन पर बैठकर खाओ।
उन्होंने पण्डितजी से फिर कहा, 'तुमने गीता पढ़ी होगी। जिसे सब लोग मानें उसमें ईश्वर की विशेष शक्ति है।'
पण्डितजी –
" 'यद्यत् विभूतिमत् सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।' "
श्रीरामकृष्ण – तुम्हारे भीतर अवश्य ही उनकी शक्ति है।
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५६२ श्रीरामकृष्णवचनामृत ३० जून, १८८४
पण्डितजी – जो व्रत मैंने लिया है, क्या इसे अध्यवसाय के साथ पूरा करने की कोशिश करूँ?
श्रीरामकृष्ण ने जैसे अनुरोध की रक्षा के लिए कहा, 'हाँ होगा,' परन्तु इस बात को दबाने के लिए दूसरा प्रसंग उठा दिया।
श्रीरामकृष्ण – शक्ति को मानना चाहिए। विद्यासागर ने कहा, क्या उन्होंने किसी को ज्यादा शक्ति भी दी है? मैंने कहा, नहीं तो फिर एक आदमी सौ आदमियों को कैसे मार डालता है? क्वीन विक्टोरिया का इतना मान – इतना नाम क्यों है अगर उनमें शक्ति न होती? मैंने पूछा, तुम यह मानते हो या नहीं? तब उसने कहा, हाँ, मानता हूँ।
पण्डितजी उठे और श्रीरामकृष्ण को भूमिष्ठ हो प्रणाम किया। साथवाले उनके मित्रों ने भी प्रणाम किया।
श्रीरामकृष्ण कहते हैं – "फिर आना। गंजेड़ी गंजेड़ी को देखता है, तो खुश होता है; कभी तो उसे गले से लगा लेता है। दूसरे आदमी देखकर मुँह छिपाते हैं। गाय अपने साथ की गायों को देखती है तो उनकी देह चाटती है, पर दूसरी गायों को सिर से ठोकर मारती है।" (सब हँसते हैं।)
पण्डितजी के चले जाने पर श्रीरामकृष्ण हँस हँसकर कह रहे हैं – "डाइल्यूट (Dilute = मुग्ध) हो गया है, एक ही दिन में। देखा, कैसा विनय-भाव है, और सब बातें समझकर ग्रहण कर लेता है।"
आषाढ़ की शुक्ला सप्तमी है। पश्चिमवाले बरामदे में चाँदनी छिटक रही है। श्रीरामकृष्ण अब भी वहीं बैठे हैं। मास्टर प्रणाम कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण स्नेहपूर्वक पूछ रहे हैं, क्या जाओगे?
मास्टर – जी हाँ, अब चलता हूँ।
श्रीरामकृष्ण – एक दिन मैंने सोचा कि सब के यहाँ एक-एक बार जाऊँगा – क्यों?
मास्टर – जी हाँ, बड़ी कृपा होगी।
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CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar