श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
२ फरवरी १८८४ | परिच्छेद ७५ | ४३९
| २ फरवरी १८८४ | परिच्छेद ७५ | ४३९ |
|---|
बाँधेंगे। श्रीरामकृष्ण बालक की तरह हँस रहे हैं और कहते हैं, ऐहिक और पारत्रिक के मधूसूदन!
मधु – (सहास्य) – केवल नाम का बोझ ढो रहा हूँ।
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – कोई नाम कम थोड़े ही है? उनमें और उनके नाम में कोई भेद नहीं है। सत्यभामा जब तुला पर स्वर्ण, मणि और मुक्ताएँ रखकर श्रीकृष्ण को तौल रही थीं तब वजन पूरा न हुआ। जब रुक्मिणी ने तुलसी पर कृष्ण-नाम लिखकर एक ओर रख दिया तब वजन पूरा उतरा।
अब डाक्टर पटरियाँ बाँधेंगे, जमीन पर बिस्तरा लगाया गया, श्रीरामकृष्ण हँसते हुए बिस्तरे पर आकर लेटे गाने के ढंग से कह रहे हैं – “'राधिका की यह दशम दशा है। वृन्दा कहती है, अभी न जाने क्या क्या होगा!'”
चारों ओर भक्तगण बैठे हैं। श्रीरामकृष्ण फिर गा रहे हैं – 'सब सखि मिलि बैठल सरोवर-कूले।' श्रीरामकृष्ण भी हँस रहे हैं और भक्तगण भी हँस रहे हैं। बैंडेज बाँधना समाप्त हो जाने पर श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं –
“कलकत्ते के डाक्टरों पर मेरा उतना विश्वास नहीं होता। शम्भू को विकार की अवस्था थी, डाक्टर (सर्वाधिकार) कहता था, यह कुछ नहीं है; दवा की नशा है! उसके बाद ही शम्भू की देह छूट गयी।”
(४)
मुख्य बात – अहैतुकी भक्ति। अपने स्वरूप को जानो।
सन्ध्या के पश्चात् श्रीमन्दिर में आरती हो गयी। कुछ देर बाद कलकत्ते से अधर आये। भूमिष्ठ हो उन्होंने श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया। कमरे में महिमाचरण, राखाल और मास्टर हैं। हाजरा महाशय भी बीच-बीच में आते हैं।
अधर – आप कैसे हैं?
श्रीरामकृष्ण – (स्नेह-भरे शब्दों में) – यह देखो, हाथ में लगकर क्या हुआ है। (सहास्य) हैं और कैसे!
अधर जमीन पर भक्तों के साथ बैठे हैं। श्रीरामकृष्ण उनसे कह रहे हैं – “तुम एक बार इस पर हाथ तो फेर दो।”
अधर छोटी खाट की उत्तर ओर बैठकर श्रीरामकृष्ण की चरण-सेवा कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण फिर महिमाचरण से बातचीत कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – (महिमा के प्रति) – अहैतुकी भक्ति – तुम इसे अगर साध्य कर सको तो अच्छा हो।
“ 'मुक्ति, मान, रुपया, रोग अच्छा होना, कुछ नहीं चाहता, – मैं बस तुम्हें ही
| ४४० | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २ फरवरी, १८८४ |
|---|
चाहता हूँ!’ इसे अहैतुकी भक्ति कहते हैं। बाबू के पास कितने ही लोग आते हैं – अनेक कामनाएँ करते हैं, परन्तु यदि कोई ऐसा आदमी आता है जो कुछ नहीं चाहता, और केवल प्यार करने के लिए ही बाबू के पास आता है तो बाबू भी उसे प्यार करते हैं।
“प्रह्लाद की भक्ति अहैतुकी है। ईश्वर पर उनका शुद्ध और निष्काम प्यार है।”
महिमाचरण चुपचाप सुन रहे हैं। श्रीरामकृष्ण फिर कह रहे हैं।
“अच्छा, तुम्हारा भाव जैसा है उसी तरह की बातें कहता हूँ, सुनो –
(महिमा के प्रति) “वेदान्त के मत्त से अपने स्वरूप को पहचानना चाहिए, परन्तु अहं का बिना त्याग किये नहीं होता। अहं एक लाठी की तरह है – मानो पानी को उसने दो भागों में अलग कर रखा है। ‘मैं’ अलग और ‘तुम’ अलग।
“समाधि की अवस्था में इस अहं के चले जाने पर ब्रह्म की साक्षात् अनुभूति होती है।
“मैं महिमाचरण चक्रवर्ती हूँ, मैं विद्वान हूँ, इसी ‘मैं’ का त्याग करना होगा। विद्या के ‘मैं’ में दोष नहीं है। शंकराचार्य ने लोगों को शिक्षा देने के लिए विद्या का ‘मैं’ रखा था।
“स्त्रियों के सम्बन्ध में खूब सावधान रहे बिना ब्रह्मज्ञान नहीं होता इसीलिए गृहस्थी में उसकी प्राप्ति कठिन बात है। चाहे जितने बुद्धिमान क्यों न बनो, काजल की कोठरी में रहने से स्याही जरूर लग जायगी। युवतियों के साथ निष्काम मन में भी कामना की उत्पत्ति हो सकती है।
“परन्तु जो ज्ञान के पथ पर है उसके लिए अपनी पत्नी के साथ भोग कर लेना इतने दोष की बात नहीं – जैसे मल और मूत्र त्याग; वैसे ही यह भी – और जैसे शौच की बाद में हमें याद भी नहीं रहती।
“‘छेने की मिठाई कभी खा ही ली!’” महिमाचरण हँसते हैं।
संन्यासियों के कठिन नियम और श्रीरामकृष्ण
“संसारियों के लिए भोग उतने दोष की बात नहीं।
“पर संन्यासी के लिए इसमें बड़ा दोष है। संन्यासी को स्त्रियों का चित्र भी न देखना चाहिए। संन्यासी के लिए स्त्रीप्रसंग, थूककर चाटने के बराबर है।
“स्त्रियों के बीच में बैठकर संन्यासी को बातचीत न करनी चाहिए। चाहे स्त्री भक्त ही क्यों न हो, जितेन्द्रिय होने पर भी वार्तालाप न करना चाहिए।
“संन्यासी कामिनी-कांचन दोनों का त्याग करें – जैसे स्त्रियों का चित्र उन्हें न देखना चाहिए वैसे ही कांचन-रुपया भी न छूना चाहिए। रुपया पास रहने से भी बुराई है। हिसाब किताब, दुश्चिन्ता, रुपये का अहंकार, लोगों पर क्रोध आदि रुपया रहने से ही होता है। सूर्य दीख पड़ता था, बादलों ने आकर उसे घेर लिया।