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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

२८ सितम्बर, १८८४ | परिच्छेद ९३ | ६५३

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२८ सितम्बर, १८८४परिच्छेद ९३६५३

“गोविन्द राय के पास मैंने अल्ला मन्त्र लिया। कोठी में प्याज डालकर भात पकाया गया। मणि मल्लिक के बगीचे में मैंने तरकारी खायी, परन्तु उससे एक तरह की घृणा हो गयी।

“मैं देश (कामारपुकुर) गया, तब रामलाल का बाप* डरा। उसने सोचा कि यह तो इधर-उधर किसी के यहाँ भी खा लेता है। कहीं ऐसा न हो कि जाति से च्युत कर दिया जाऊँ; इसीलिए मैं अधिक दिन वहाँ न रह सका, वहाँ से चला आया।

“वेदों और पुराणों में शुद्धाचार की बात लिखी है। वेदों और पुराणों में जिसके लिए कहा है कि यह न करो, इनसे अनाचार होता है, तन्त्रों में उसी को अच्छा कहा है।

“मेरी कैसी कैसी अवस्थाएँ बीत गयी हैं। मुख आकाश और पाताल तक फैलाता था और तब मैं माँ कहता था, मानो माँ को पकड़े लिये आ रहा हूँ जैसे जाल डालकर जबरदस्ती मछली पकड़कर खींचना। एक गाने में है –

“अबकी बार, ऐ काली, तुम्हे ही मैं खा जाऊँगा। तारा, गण्डयोग में मेरा जन्म हुआ है। इस योग में पैदा होने पर बच्चा अपनी माँ को खा जाता है। अबकी बार, माँ, या तो तुम्हीं मुझे खा जाओगी या मैं ही तुम्हें खाऊँगा, दो में एक तो होगा ही। मैं हाथों में, पैरों में, सर्वांग में कालिख † पोत लूँगा। जब यमराज आकर मुझे बाँधने लगेंगे तब वही कालिख उसके मुँह में लगाऊँगा। मैं यह तो कहता हूँ कि तुझे खा जाऊँगा परन्तु माँ, यह समझ ले कि खाकर भी मैं तुझे उदरस्थ न करूँगा, हृदय-पद्म में तुझे बैठा लूँगा और तब अपनी मौज से तेरी पूजा करूँगा। अगर यह कहो कि काली को खा जाओगे तो फिर काल के हाथ से कैसे बचोगे, तो कहना यह है कि मैं काली कहकर काल से पिण्ड छुड़ाऊँगा।

... ‘मैं उसे अच्छी तरह जना दूँगा कि रामप्रसाद काली का बेटा है। उससे या तो मन्त्र की सिद्धि ही होगी या मेरा यह शरीर ही न रह जायगा।’

“पागल की अवस्था हो गयी थी – यह व्याकुलता है!”

नरेन्द्र गा रहे हैं – “माँ, मुझे पागल कर दे, ज्ञान के विचार से मुझे काम नहीं।”

गाना सुनते ही श्रीरामकृष्ण समाधिस्थ हो गये।

समाधि के छूटने पर पार्वती की माता का भाव अपने पर आरोपित करके श्रीरामकृष्ण ‘आगमनी’ (देवी के आगमन के समय का संगीत जो बंगाल में गाया जाता है) गा रहे हैं।

गाने के बाद श्रीरामकृष्ण भक्तों से कह रहे हैं, आज महाष्टमी है न, माँ आयी हुई


* श्रीरामकृष्ण के बडे भाई रामेश्वर।
† बंगला शब्द ‘काली’ से दो अर्थ निकलते हैं – स्याही और कालिका देवी। यहाँ उसी श्लेष से मतलब हैं।

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

६५४श्रीरामकृष्णवचनामृत२८ सितम्बर, १८८४

हैं। इसीलिए इतनी उद्दिपना हो रही है।

श्रीरामकृष्ण गा रहे हैं –

“सखी री! जिसके लिए मैं पागल हो गयी उसे अभी कहाँ पाया?”

श्रीरामकृष्ण गा रहे हैं, एकाएक ‘हरि बोल’ ‘हरि बोल’ कहकर विजय खड़े हो गये। श्रीरामकृष्ण भी भावोन्मत्त होकर विजय आदि भक्तों के साथ नृत्य करने लगे।

(४)

किस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिए

कीर्तन हो जाने पर श्रीरामकृष्ण, विजय, नरेन्द्र तथा दूसरे भक्तों ने आसन ग्रहण किया। सब की दृष्टि श्रीरामकृष्ण पर लगी हुई है। सन्ध्या होने में अभी कुछ देर है। श्रीरामकृष्ण भक्तों से बातचीत कर रहे हैं। उनसे कुशल-प्रश्न पूछ रहे हैं। केदार बड़े ही विनीत भाव से हाथ जोड़कर बहुत ही मृदु तथा मधुर शब्दों में श्रीरामकृष्ण से निवेदन कर रहे हैं। पास हैं नरेन्द्र, चुनी, सुरेन्द्र, राम, मास्टर और हरीश।

केदार – (श्रीरामकृष्ण से, विनयपूर्वक) – सिर का चक्कर खाना किस तरह अच्छा होगा?

श्रीरामकृष्ण – (सस्नेह) – ऐसा होता है; मुझे भी हुआ था। थोड़ा थोड़ा बादाम का तेल सिर में लगाकर मालिश कर लिया कीजिये। सुना है, इस तरह यह बीमारी अच्छी हो जाती है।

केदार – जो आज्ञा।

श्रीरामकृष्ण – (चुनी से) – क्यों जी, तुम सब कैसे हो?

चुनी – जी, इस समय तो सब कुशल है। वृन्दावन में बलराम बाबू और राखाल अच्छी तरह हैं।

श्रीरामकृष्ण – तुमने इतनी मिठाई क्यों भेज दी?

चुनी – जी, वृन्दावन से आ रहा हूँ।

चुनीलाल बलराम के साथ वृन्दावन गये हुए थे और कई महीने तक वहीं ठहरे थे। छुट्टी पूरी हो रही है, इसलिए अब कलकत्ता लौट आये हैं।

श्रीरामकृष्ण – (हरीश से) – तू दो-एक दिन बाद जाना। अभी बीमारी की हालत है, जाने पर वहाँ फिर बीमार पड़ जायगा।

(नारायण से, सस्नेह) “बैठ, आ मेरे पास आकर बैठ। कल जाना और वहीं खाना भी। (मास्टर की ओर इशारा करके) इनके साथ जाना। (मास्टर से) क्यों जी?”

मास्टर की इच्छा थी, वे उसी दिन श्रीरामकृष्ण के साथ दक्षिणेश्वर जायें, अतएव वे सोचने लगे। सुरेन्द्र बड़ी देर तक थे। बीच में एक बार घर गये थे। घर से लौटकर