श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
२८ नवम्बर, १८८३ | परिच्छेद ५९ | ३४७
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“हाजरा का दोष नहीं है। साधक अवस्था में सम्पूर्ण मन ‘नेति’ ‘नेति’ करके उन्हें दे देना पड़ता है। सिद्ध-अवस्था की बात दूसरी है। उन्हें प्राप्त कर लेने पर अनुलोम और विलोम एक से प्रतीत होते हैं। मट्ठा अलग करने पर जब मक्खन मिलता है तब जान पड़ता है कि मट्ठे का ही मक्खन है और मक्खन का ही मट्ठा। तब ठीक ठीक समझ में आता है कि सब कुछ वे ही हुए हैं। कहीं उनका अधिक प्रकाश है, कहीं कम।
“भावसमुद्र उमड़ने पर स्थल में भी एक बाँस पानी हो जाता है। पहले नदी से होकर समुद्र में जाते समय बहुत-कुछ चक्कर लगाकर जाना पड़ता है, ओर जब बाढ़ आती है तब सूखी जमीन पर भी एक बाँस पानी हो जाता है। तब नाव सीधे चलाकर लोग जगह पर पहुँच जाते हैं। फिर चक्कर मारकर नहीं जाना पड़ता। इसी तरह धान कट जाने पर मेंड़ से चक्कर काटकर नहीं आना पड़ता। सीधे एक रास्ते से निकल जाओ।
“उन्हें प्राप्त कर लेने पर फिर सभी वस्तुओं में उनके दर्शन होते हैं। मनुष्य के भीतर उनका अधिक प्रकाश है। मनुष्यों में सतोगुणी भक्तों में उनका और अधिक प्रकाश रहता है – जिनमें कामिनी और कांचन के भोग की बिलकुल ही इच्छा नहीं रहती। (सब स्तब्ध हैं।) समाधिस्थ मनुष्य जब उतरता है तब भला वह कहाँ ठहरे? – किस पर अपना मन रमाये? कामिनी और कांचन का त्याग करनेवाले सतोगुणी शुद्ध भक्तों की आवश्यकता उन्हें इसीलिए होती है। नहीं तो फिर वे क्या लेकर रहें?
“जो ब्रह्म हैं, वे ही आद्याशक्ति भी हैं। जब वे निष्क्रिय हैं, तब उन्हें ब्रह्म कहते हैं, पुरुष कहते हैं। जब सृष्टि, स्थिति, प्रलय ये सब करते हैं, तब उन्हें शक्ति कहते हैं, प्रकृति कहते हैं। पुरुष और प्रकृति। जो पुरुष हैं, वे ही प्रकृति भी हैं। आनन्दमय और आनन्दमयी।
“जिसे पुरुष-ज्ञान है, उसे स्त्री-ज्ञान भी है। जिसे पिता का बोध है, उसे माता का भी बोध है। (केशव हँसते हैं।)
“जिसे अँधेरे का ज्ञान है, उसे उजाले का भी ज्ञान है। जिसे रात का ज्ञान है, उसे दिन का भी ज्ञान है। जिसे सुख का ज्ञान है, उसे दुःख का भी। यह बात समझे”?
केशव (सहास्य) – जी हाँ, समझा।
श्रीरामकृष्ण – माँ! कौनसी माँ! जगत् की माँ – जिन्होंने जगत् की सृष्टि की; जो उसका पालन कर रही हैं; जो अपनी सन्तानों की सदा रक्षा करती हैं; और धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष – जो जो कुछ चाहता है, उसे वही देती हैं। जो उनकी यथार्थ सन्तान है, वह उन्हें छोड़कर नहीं रह सकती। उसकी माता ही सब कुछ जानती हैं। वह तो बस खाता है, खेलता है, और घूमता है। इसके सिवाय वह और कुछ नहीं जानता।
केशव – जी हाँ।
३४८ श्रीरामकृष्णवचनामृत २८ नवम्बर, १८८३
(४)
ब्राह्मसमाज और ईश्वर का ऐश्वर्य-वर्णन।
त्रिगुणातीत भक्त
वार्तालाप करते हुए श्रीरामकृष्ण प्रकृतिस्थ हो गए हैं। केशव के साथ हँसते हुए बातचीत कर रहे हैं। कमरे भर के लोग एकाग्र चित्त से उनकी सब बातें सुनते और उन्हें देखते हैं। सभी निर्वाक् हैं कि 'तुम कैसे हो' आदि व्यावहारिक बातें तो होती ही नहीं, केवल भगवत्-प्रसंग छिड़ा हुआ है।
श्रीरामकृष्ण (केशव से) – ब्राह्मभक्त इतनी महिमा क्यों गाया करते हैं? 'हे ईश्वर, तुमने चन्द्र की सृष्टि की, सूर्य को पैदा किया, नक्षत्र बनाए' – इन सब बातों की क्या आवश्यकता है? बहुतसे लोग बगीचे की ही प्रशंसा करते हैं; पर मालिक से कितने लोग मिलना चाहते हैं? बगीचा बड़ा है या मालिक?
"शराब पी चुकने पर कलाल की दूकान में कितने मन शराब है, इसकी जाँच-पड़ताल से हमारा क्या काम? हमारा तो मतलब एक ही बोतल से निकल जाता है।
"नरेन्द्र को देखकर मैंने कभी नहीं पूछा, तेरे पिता का क्या नाम है? तेरे पिता की कितनी कोठियाँ हैं?
"कारण जानते हो? मनुष्य स्वयं ऐश्वर्य का आदर करता है, इसलिए वह समझता है कि ईश्वर भी उसका आदर करते हैं। सोचता है, उनके ऐश्वर्य की प्रशंसा करने पर वे प्रसन्न होंगे। शम्भु ने कहा था, 'अब तो इस समय यही आशीर्वाद दीजिये जिससे यह ऐश्वर्य उनके पादपद्मों में अर्पित करके मरूँ।' मैंने कहा, 'यह तुम्हारे लिए ही ऐश्वर्य है; उन्हें तुम क्या दे सकते हो! उनके लिए यह सब काठ और मिट्टी के बराबर है।'
"जब विष्णुघर के कुल गहने चुरा लिए गए तब मैं और मथुरबाबू, दोनों श्रीठाकुरजी को देखने के लिए गए। मथुरबाबू ने कहा, 'चलो महाराज, तुममें कोई शक्ति नहीं है। तुम्हारी देह से कुल गहने निकाल लिये गये और तुम कुछ न कर सके!' मैंने उससे कहा, 'यह तुम्हारी कैसी बात है! तुम जिसके सामने गहने गहने चिल्लाते हो, उनके लिए ये सब मिट्टी के ढेले हैं। लक्ष्मी जिनकी शक्ति हैं, क्या वे तुम्हारे चोरी गए इन कुछ रुपयों के लिए परेशान होंगे! ऐसी बात नहीं कहनी चाहिए।'
"क्या ईश्वर ऐश्वर्य के भी वश है? वे तो भक्ति के वश हैं। जानते हो, वे क्या चाहते हैं? वे रुपया नहीं चाहते – भाव, प्रेम, भक्ति, विवेक, वैराग्य यह सब चाहते हैं।
"जिसका जैसा भाव होता है, वह ईश्वर को वैसा ही देखता है। जो तमोगुणी भक्त है, वह देखता है कि माँ बकरा खाती है वह बकरे की बलि भी देता है। रजोगुणी भक्त नाना प्रकार के व्यंजन और अन्न-पकवान चढ़ाता है। सतोगुणी भक्त की पूजा में आडम्बर