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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

२५ मई, १८८४ | परिच्छेद ८१ | ५०७

२५ मई, १८८४परिच्छेद ८१५०७

गये हैं।

“किले में जब गाड़ी पर सवार होकर पहुँचा, तब जान पड़ा कि मैं साधारण रास्ते से होकर आया। वहाँ पहुँचने पर देखा तो चार मंजिल नीचे चला गया था। रास्ता ढालू था। जिसे भूत पकड़ता है, वह नहीं समझ सकता है कि उसे भूत लगा है। वह सोचता है, मैं बिलकुल ठीक हूँ।”

विजय – (सहास्य) – कोई ओझा मिल गया तो वह उतार देता है।

श्रीरामकृष्ण ने इसका विशेष उत्तर नहीं दिया, केवल कहा, वह ईश्वर की इच्छा है। वे फिर स्त्रियों के सम्बन्ध में कहने लगे।

श्रीरामकृष्ण – जिससे पूछता हूँ, वही कहता है, जी हाँ, मेरी स्त्री अच्छी है। किसी की स्त्री खराब नहीं निकली! (सब हँसते हैं।)

“जो लोग कामिनी-कांचन लेकर रहते हैं, वे नशे में कुछ समझ नहीं पाते। जो लोग शतरञ्ज खेलते हैं, वे बहुत समय तक नहीं समझते कि कौनसी चाल ठीक होगी; परन्तु जो लोग अलग से देखते हैं वे बहुत कुछ समझते हैं।

“स्त्री मायारूपिणी है। नारद राम की स्तुति करते हुए कहने लगे – ‘हे राम, जितने पुरुष हैं, सब तुम्हारे ही अंश से हुए हैं और जितनी स्त्रियाँ हैं, वे सब मायारूपिणी सीता के अंश से हुई हैं। मैं और कोई वरदान नहीं चाहता। यही करो जिससे तुम्हारे पादपद्मों में शुद्धा भक्ति हो। फिर तुम्हारे मोहिनी-माया में मुग्ध न होऊँ।’ ”

सुरेन्द्र के छोटे भाई गिरीन्द्र और उनके भतीजे नगेन्द्र आदि आये हुए हैं। नगेन्द्र वकालत के लिए तैयारी कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – (गिरीन्द्र आदि से) – तुम लोगों से कहता हूँ, तुम लोग संसार में न फँस जाना। देखो, राखाल को ज्ञान और अज्ञान का बोध हो गया है – सत् असत् का विचार पैदा हो गया है – अब मैं उससे कहता हूँ तू घर जा, कभी कभी यहाँ आना, दो एक रोज रह जाया करना।

“और तुम लोग आपस में मिलकर रहोगे, तभी तुम्हारा कल्याण होगा, और आनन्दपूर्वक रहोगे। नाटकवाले अगर एक स्वर से गाते हैं तो नाटक अच्छा होता है, और जो लोग सुनते हैं, उन्हें भी आनन्द मिलता है।

“ईश्वर पर अधिक मन रखकर और संसार में थोड़ा मन लगाकर संसार का काम करना।

“साधुओं का बारह आने मन ईश्वर पर रहता है, चार आने दूसरे कामों में लगाते हैं। साधु ईश्वर की ही कथा पर अधिक ध्यान रखते हैं। साँप की पूँछ पर पैर रखने से फिर रक्षा नहीं। शायद पूँछ में उसे अधिक चोट लगती है।”

श्रीरामकृष्ण झाऊतल्ले की ओर जाते समय सींती के गोपाल से छाते के बारे में कह

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५०८ श्रीरामकृष्णवचनामृत २५ मई, १८८४

गये हैं। गोपाल ने मास्टर से कहा, 'वे कह गये हैं, अपना छाता कमरे में रख देना।' पंचवटी में कीर्तन का आयोजन होने लगा। श्रीरामकृष्ण आकर बैठे। सहचरी गा रही है। भक्तगण चारों ओर बैठे हैं, कोई कोई खड़े भी हैं।

कल शनिवार अमावस्या थी। जेठ का महीना है। आज ही से मेघ दिखलायी देने लगे। एकाएक आँधी भी चल पड़ी। श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ अपने कमरे में चले आये। निश्चय हुआ कि कीर्तन उसी कमरे में होगा।

श्रीरामकृष्ण – (सींती के गोपाल से) – क्यों जी छाता ले आये हो?

गोपाल – जी नहीं, गाना सुनते ही सुनते भूल गया।

छाता पंचवटी में पड़ा हुआ है, गोपाल जल्दी से लेने के लिए चले गये।

श्रीरामकृष्ण – मै इतना लापरवाह तो हूँ, फिर भी इस दरजे को अभी नहीं पहुँचा।

"राखाल ने एक जगह निमन्त्रण की बात पर तेरह तारीख को कह दिया ग्यारह तारीख!

"और गोपाल आखिर गौओं के पाल (समूह) ही तो हैं! (सब हँसते हैं।)

"वही, जो एक सुनारों की कहानी है – एक कहता है 'केशव', दूसरा कहता है 'गोपाल', तीसरा कहता है 'हरि', चौथा कहता है 'हर'! उसमें, उस गोपाल का अर्थ है, गौओं का पाल (समूह)!" (सब हँसते हैं।)

सुरेन्द्र गोपाल को लक्ष्य करके हँसते हुए कह रहे हैं – 'कान्हा कहाँ हैं?'

(३)

कीर्तन करनेवाली गौरांग के संन्यास का कीर्तन गा रही है। श्रीरामकृष्ण गौरांग-संन्यास का कीर्तन सुनते सुनते खड़े होकर समाधिमग्न हो गये। उसी समय भक्तों ने उनके गलें में फूलों की माला डाल दी। भवनाथ और राखाल श्रीरामकृष्ण को पकड़े हुए हैं कि कहीं गिर न जायँ। श्रीरामकृष्ण उत्तर की ओर मुँह किये हुए हैं। विजय, केदार, राम, मास्टर, मनमोहन, लाटू आदि भक्तगण मण्डलाकार उन्हें घेरकर खड़े हैं।

कृष्ण ही अखण्ड सच्चिदानन्द हैं वे ही जीव-जगत् हैं

धीरे धीरे समाधि छूट रही है। श्रीरामकृष्ण सच्चिदानन्द श्रीकृष्ण से बातचीत कर रहे हैं। 'कृष्ण' इस नाम का एक एक बार उच्चारण कर रहे हैं। कभी कभी साफ उच्चारण भी नहीं होता। कह रहे हैं – "कृष्ण! कृष्ण! सच्चिदानन्द! – कहाँ हो, आजकल तुम्हारा रूप देखने को नहीं मिलता! अब तुम्हें भीतर भी देख रहा हूँ और बाहर भी। जीव, जगत्, चौबीस तत्त्व सब तुम्हीं हो। मन, बुद्धि सब तुम्हीं हो। गुरु के प्रणाम में है –

अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar