श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
२५ जून, १८८४ | परिच्छेद ८४ | ५३३
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श्रीश – ईश्वर हैं और वे ही सब कर रहे हैं। परन्तु उनके गुणों के सम्बन्ध में हमारी जो धारणा है, वह ठीक नहीं। आदमी उनके सम्बन्ध में क्या धारणा कर सकता है? अनन्त खेल हैं उनके!
श्रीरामकृष्ण – बगीचे में कितने पेड़ हैं, पेड़ों में कितनी डालियाँ हैं, इन सब का हिसाब लगाने से तुम्हारा क्या काम? तुम बगीचे में आम खाने के लिए आये हो, आम खाकर चले जाओ। उनमें भक्ति और प्रेम करने के लिए आदमी मनुष्य जन्म पाता है। तुम आम खाकर चले जाओ।
“तुम शराब पीने के लिए आये, तो शराबवाले की दूकान में कितने मन शराब है, इन सब का हिसाब करने से क्या प्रयोजन? तुम्हारे लिए तो एक गिलास ही काफी है। अनन्त लीलाओं के जानने से तुम्हें मतलब?
“कोटि कोटि वर्ष तक उनके गुणों का विचार करने पर उनके गुणों का अल्पांश भी न समझ पाओगे।”
श्रीरामकृष्ण कुछ देर चुप रहकर फिर बातचीत करने लगे। भाटपाड़ा के एक ब्राह्मण भी बैठे हैं।
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – संसार में कुछ नहीं। इनका (ईशान का) संसार अच्छा है, यही खैर है, नहीं तो अगर लड़के वेश्यागामी, गंजेड़ी, शराबी और उद्दण्ड होते, तो तकलीफ की हद हो जाती। सब का मन ईश्वर पर – विद्या का संसार – ऐसा अक्सर नहीं दीख पड़ता। ऐसे दो ही चार घर देखे। नहीं तो बस झगड़ा, ‘तू-तू – मैं-मैं’, हिंसा, और फिर रोग, शोक, दारिद्र। यही देखकर कहा – माँ, इसी समय मोड़ घुमा दो। देख न, नरेन्द्र कैसी विपत्ति में पड़ गया, बाप मर गया, घरवाले खाने को नहीं पाते, नौकरी की इतनी चेष्टा हो रही है, फिर भी कोई प्रबन्ध नहीं होता। अब देखो क्या करें? मास्टर! पहले तुम यहाँ इतना आते थे, अब उतना क्यों नहीं आते? जान पड़ता है, बीबी से प्रेम इस समय बढ़ा हुआ है।
“अच्छा है, दोष क्या है! चारों ओर कामिनी-कांचन है। इसीलिए कहता हूँ, माँ, अगर कभी शरीर ग्रहण करना पड़े तो संसारी न बना देना।”
भाटपाड़ा के ब्राह्मण – यह आपने कैसे कहा? गृहस्थ धर्म की तो बड़ी प्रशंसा है।
श्रीरामकृष्ण – हाँ, परन्तु बड़ा कठिन है।
श्रीरामकृष्ण दूसरी बात करने लगे।
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – हम लोगों ने कैसा अन्याय किया, वे लोग गा रहे हैं, नरेन्द्र गा रहा है, और हम लोग चले आये।
५३४ श्री रामकृष्णवचनामृत २५ जून, १८८४
(२)
कलि में भक्तियोग
दोपहर चार बजे के करीब, श्रीरामकृष्ण गाड़ी पर चढ़े। बड़े ही कोमलांग हैं, बड़ी सावधानी से देह की रक्षा होती है। इसीलिए रास्ता चलते तकलीफ होती है। गाड़ी न होने पर थोड़ी दूर भी चलते हैं, तो बड़ा कष्ट होता है। गाड़ी पर चढ़कर भावसमाधि में मग्न हो गये। उस समय नन्ही-नन्ही बूँदों की वर्षा हो रही थी। आकाश में बादल छाये हैं, रास्ते में कीचड़ है। भक्तगण गाड़ी के पीछे-पीछे पैदल चल रहे हैं। उन्होंने देखा, रथयात्रा का स्वागत लड़के ताड़ के पत्ते की बाँसुरी बजाकर कर रहे थे।
गाड़ी मकान के सामने पहुँची। द्वार पर घर के मालिक और उनके आत्मीयों ने आकर स्वागत किया।
ऊपर जाने की सीढ़ी के बगल में बैठकखाना है। ऊपर पहुँचकर श्रीरामकृष्ण ने देखा, शशधर उनकी अभ्यर्थना के लिए आ रहे हैं। पण्डितजी को देखकर मालूम हुआ कि वे यौवन पार कर चुके हैं, प्रौढ़ावस्था को प्राप्त हैं। रंग साफ गोरा है – गले में रुद्राक्ष की माला पड़ी है। उन्होंने बड़े विनय-भाव से श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया। फिर साथ ही उन्हें घर ले गये।
श्रीरामकृष्ण के पास बैठे हुए लोग उनकी बातचीत सुनने के लिए बड़े उत्सुक हो रहे हैं। नरेन्द्र, राखाल, राम, मास्टर और दूसरे भी बहुत से भक्त उपस्थित हैं। हाजरा भी श्रीरामकृष्ण के साथ दक्षिणेश्वर-कालीमन्दिर से आये हुए हैं।
पण्डितजी के देखते ही देखते श्रीरामकृष्ण को भावावेश होने लगा। कुछ देर बाद उसी अवस्था में हँसते हुए पण्डितजी की ओर देखकर कह रहे हैं – ‘बहुत अच्छा, बहुत अच्छा!’ फिर उनसे कहा, ‘तुम कैसे लेक्चर देते हो?’
शशधर – महाराज, मैं शास्त्रों के उपदेश समझाने की चेष्टा करता हूँ।
श्रीरामकृष्ण – कलिकाल के लिए नारदीय भक्ति है। शास्त्रों में जिन सब कर्मों की बात है, उनके साधन के लिए अब समय कहाँ है? आजकल के बुखार में दशमूल पाचन की व्यवस्था ठीक नहीं। दशमूल पाचन देने से इधर रोग ऐंठ जाता है। आजकल बस ‘फीवर-मिक्सचर’! कर्म करने के लिए अगर कहते हो, तो केवल सार की बात कह दिया करो। मैं आदमियों से कहता हूँ, तुम्हें ‘आपोधन्यन्या’ इतना यह सब न कहना होगा। गायत्री के जप से ही तुम्हारी बन जायगी। अगर कर्म की बात कहनी ही हो, तो ईशान की तरह के दो-एक कर्मियों से कह सकते हो।
“लाख लेक्चर दो, परन्तु विषयी मनुष्यों का कुछ कर न सकोगे। पत्थर की दीवार में क्या कभी कीला गाड़ सकते हो? कीला खुद चाहे टूट जाय – मुड़ जाय, पर पत्थर