सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

२४ मई, १८८४ | परिच्छेद ८० | ५०१

२४ मई, १८८४ | परिच्छेद ८० | ५०१

हैं। साथ हैं अधर, मास्टर आदि भक्तगण। इसी समय विष्णुघर के सेवक पुजारी श्री राम चटर्जी ने आकर समाचार दिया - श्री श्रीमाँ की नौकरानी को हैजा हुआ है।

राम चटर्जी - (श्रीरामकृष्ण के प्रति) - मैंने तो दस बजे ही कहा था, आप लोगों ने नहीं सुना।

श्रीरामकृष्ण - मैं क्या करूँ?

राम चटर्जी - आप क्या करेंगे? राखाल, रामलाल ये सब थे, उनमें से किसी ने कुछ न किया।

मास्टर - किशोरी (गुप्त) दवा लाने गया है, आलमबाजार से।

श्रीरामकृष्ण - क्या अकेला ही? कहाँ से लायेगा?

मास्टर - और कोई साथ नहीं है। आलमबाजार से लायेगा।

श्रीरामकृष्ण - (मास्टर के प्रति) - जो लोग रोगी की देखभाल कर रहे हैं उन्हें समझा दो कि रोग बढ़ने पर क्या करना होगा। और रोग कम होने पर क्या खायेगी यह भी बता दो।

मास्टर - जी, अच्छा।

अब भक्त स्त्रियों ने आकर प्रणाम किया। उन्होंने बिदा ली।

श्रीरामकृष्ण उनसे फिर बोले, “शिवपूजा जैसे कहा वैसे किया करो; और खा-पीकर आया करो। नहीं तो मुझे कष्ट होता है। स्नान-यात्रा के दिन फिर आने की चेष्टा करना।”

अब श्रीरामकृष्ण पश्चिम के गोल बरामदे में आकर बैठे हैं। बन्द्योपाध्याय, हरि, मास्टर आदि पास बैठे हैं। बन्द्योपाध्याय के सब पारिवारिक कष्ट श्रीरामकृष्ण जानते हैं।

श्रीरामकृष्ण - देखो, 'एक कौपीन' के लिए सब कष्ट हैं। विवाह करके बालबच्चे हुए हैं, इसीलिए नौकरी करनी पड़ती है। साधु कौपीन लेकर परेशान है। संसारी परेशान है भार्या लेकर। फिर घरवालों के साथ बनाव नहीं है, इसीलिए अलग मकान करना पड़ा। (हँसकर) चैतन्यदेव ने नित्यानन्द से कहा था, 'सुनो, सुनो, नित्यानन्दभाई, संसारी जीव की कभी गति नहीं है।'

मास्टर - (मन ही मन) - सम्भव है, श्रीरामकृष्ण अविद्या के संसार की बात कर रहे हैं। सम्भव है, अविद्या के संसार में 'संसारी जीव' रहते हैं।

श्रीरामकृष्ण - (मास्टर को दिखाकर बन्द्योपाध्याय के प्रति) - ये सभी अलग मकान लेकर रहते हैं। एक समय दो मनुष्यों की भेंट हुई। एक ने दूसरे से पूछा, 'तुम कौन हो?' दूसरे ने कहा, 'मैं हूँ विदेशी।' फिर उसने पहले से पूछा, 'और तुम कौन हो?' - 'मैं हूँ विरही।' (सभी हँसे।) दोनों में अच्छा मेल होगा!

“परन्तु शरणागत होने पर फिर भय नहीं रहता, वे ही रक्षा करेंगे।”

५०२ श्रीरामकृष्णवचनामृत २४ मई, १८८४

हरि – अच्छा, कुछ लोगों को उन्हें प्राप्त करने में उतना विलम्ब क्यों होता है?

श्रीरामकृष्ण – बात क्या है, जानते हो? – भोग और कर्म समाप्त हुए बिना व्याकुलता नहीं आती। वैद्य कहता है, 'दिन बीतने दो, उसके बाद साधारण औषधि से ही लाभ होगा।'

"नारद ने राम से कहा, 'राम! तुम अयोध्या में बैठे हो, रावण का वध कैसे होगा? तुम तो उसी के लिए अवतीर्ण हुए हो।' राम ने कहा, 'नारद! समय होने दो, रावण का कर्मक्षय होने दो, तब उसके वध की तैयारी होगी।' "

श्रीरामकृष्ण की विज्ञानि स्थिति

हरि – अच्छा, संसार में इतने दुःख क्यों हैं?

श्रीरामकृष्ण – यह संसार उनकी लीला है, खेल की तरह। इस लीला में सुख-दुःख, पाप-पुण्य, ज्ञान-अज्ञान, भला-बुरा सब कुछ है; दुःख, पाप ये सब न रहने से लीला नहीं चलती।

"लुका-लुकौअल खेल में खूँटी छूना पड़ता है। खेल के प्रारम्भ में ही ढाई छूने पर वह सन्तुष्ट नहीं होती। ईश्वर (ढाई) की इच्छा है कि खेल कुछ देर तक चलता रहे। उसके बाद – 'लाखों पतंगों में से दो एक कटते हैं, माँ, तब तुम हँसती हुई हथेली बजाती हो!'

"अर्थात् ईश्वर का दर्शन करके एक-दो व्यक्ति मुक्त हो जाते हैं – बहुत तपस्या के बाद, उनकी कृपा से। तब माँ आनन्द से हथेली बजाती है – 'ओहो! कट गया' यह कहकर।"

हरि – परन्तु इसी खेल में तो हमारे प्राण जो निकलते हैं!

श्रीरामकृष्ण – (हँसकर) – तुम कौन हो कहो न! ईश्वर ही सब कुछ बने हुए हैं – माया, जीव, जगत्, चौबीस तत्त्व।

"साँप बनकर काटता हूँ, और ओझा बनकर झाड़-फूक करता हूँ। वे विद्या, अविद्या दोनों ही बने हुए हैं। अविद्या-माया द्वारा अज्ञानी जीव बने हुए हैं, विद्या-माया द्वारा तथा गुरु के रूप में ओझा बनकर झाड़-फूक कर रहे हैं।

"अज्ञान, ज्ञान, विज्ञान। ज्ञानी देखते हैं, वे ही कर्ता हैं। सृष्टि, स्थिति तथा संहार कर रहे हैं। विज्ञानी देखता है कि वे ही यह सब बने हुए हैं।

"महाभाव, प्रेम होने पर देखता है, उनके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है।

"भाव के सामने भक्ति फीकि है। भाव पकने पर महाभाव, प्रेम!

(बन्योपाध्याय के प्रति) "क्या तुम अभी भी ध्यान के समय घण्टे का शब्द सुनते हो?"

बन्यो. – रोज उसी शब्द को सुनता हूँ। फिर रूप का दर्शन! एक बार मन द्वारा