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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

२४ मई, १८८४ | परिच्छेद ८० | ४९३

२४ मई, १८८४परिच्छेद ८०४९३

रविवार या किसी दूसरे अवकाश के दिन आते हैं।”

विद्या – हमारा रविवार तीन मास का होता है। श्रावण, भाद्रपद और पौष - वर्षकाल और धान काटने का समय। जी, आपके पास आयें, यह तो हमारा अहोभाग्य है!

“दक्षिणेश्वर में आते समय दो व्यक्तियों का नाम सुना था – आपका और ज्ञानार्णव का।”

श्रीरामकृष्ण – भाइयों के साथ मेल रखकर रहना। मेल रहने से ही देखने सुनने में सब भला होता है। नाटक में नहीं देखा? चार व्यक्ति गाना गा रहे हैं, परन्तु यदि प्रत्येक व्यक्ति अलग अलग तान छेड़ दे तो नाटक पर ही पानी फिर जायगा!

विद्या – जाल में अनेक पक्षी फँसे पड़े हैं। यदि एक साथ चेष्टा करके जाल लेकर एक ही दिशा में उड़ जायें तो बहुत कुछ बचाव हो सकता है। परन्तु यदि प्रत्येक पक्षी अलग अलग दिशा में उड़ने की चेष्टा करे, तो कुछ नहीं होता। नाटक में भी देखने में आता है, सिर पर घड़ा, और नाच रहा है।

श्रीरामकृष्ण – गृहस्थी करो, परन्तु सिर पर घड़े को ठीक रखो अर्थात् ईश्वर की ओर मन को स्थिर रखो।

“मैंने पल्टन के सिपाहियों से कहा था, तुम लोग संसार का कामकाज करोगे, परन्तु कालरूपी (मृत्युरूपी) मूसल हाथ पर पड़ेगा, इसका ख्याल रखना।

“उस देश में बढ़ई लोगों की औरतें ओखली में चिउड़ा कूटती हैं। एक औरत मूसल को उठाती और गिराती है, और दूसरी चिउड़ा उलट देती है – यह ध्यान रखती है कि कहीं मूसला हाथ पर न पड़ जाय। इधर बच्चे को स्तन-पान भी कराती है और एक हाथ से भीगे धान को चूल्हे पर रखकर पतीले में भून लेती है। फिर ग्राहक के साथ बातचीत भी करती है, कहती है, तुम्हारे ऊपर इतने पैसे पहले के उधार हैं, दे जाना।

“ईश्वर में मन रखकर इसी प्रकार संसार में अनेकानेक कामकाज कर सकते हो, परन्तु अभ्यास चाहिए और होशियार रहना चाहिए, तब दोनों ओर की रक्षा होती है।”

आत्मदर्शन या ईश्वरदर्शन का उपाय-साधुसंग

या विज्ञान (साइन्स)?

विद्या – जी, इसका क्या प्रमाण है कि आत्मा शरीर से पृथक् है?

श्रीरामकृष्ण – प्रमाण? ईश्वर को देखा जा सकता है। तपस्या करने पर उनकी कृपा से ईश्वर का दर्शन होता है। ऋषियों ने आत्मा का साक्षात्कार किया था। साइन्स से ईश्वरतत्त्व जाना नहीं जाता, उसके द्वारा केवल इन इन्द्रियग्राह्य बातों का पता लगता है कि इसके साथ उसे मिलाने पर यह होता है और उसके साथ इसे मिलाने पर यह होता है;

४९४ श्रीरामकृष्णवचनामृत २४ मई, १८८४

इसीलिए इस बुद्धि के द्वारा यह सब समझा नहीं जाता। साधुसंग करना होता है। वैद्य के साथ रहते रहते नाड़ी परखना आ जाता है।

विद्या – जी, अब समझा।

श्रीरामकृष्ण – तपस्या चाहिए, तब वस्तु की प्राप्ति होगी। शास्त्र के श्लोकों को रट लेने से भी कुछ न होगा। 'गांजा गांजा' मुँह से कहने से नशा नहीं होता। गांजा पीना पड़ता है।

“ईश्वर-दर्शन की बात लोगों को समझायी नहीं जा सकती। पाँच वर्ष के बालक को पति-पत्नी के मिलने के आनन्द की बात समझायी नहीं जा सकती।”

विद्या – जी, आत्मदर्शन किस उपाय से हो सकता है?

इसी समय राखाल कमरे में भोजन करने बैठ रहे थे। परन्तु वहाँ अनेक लोग हैं, इसलिए सोच-विचार कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण आजकल राखाल का गोपाल-भाव से पालन कर रहे हैं। – ठीक मानो माँ यशोदा का वात्सल्य-भाव।

श्रीरामकृष्ण (राखाल के प्रति) – खा न रे! ये लोग नहीं तो उठकर एक ओर खड़े हो जायँ। (एक भक्त के प्रति) राखाल के लिए बर्फ रखो। (राखाल के प्रति) तू फिर बन-हुगली जायगा? धूप में न जाना।

राखाल भोजन करने बैठे। श्रीरामकृष्ण फिर विद्या का अभिनय करनेवाले लड़के के साथ वार्तालाप कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – (विद्या के प्रति) – तुम सब ने मन्दिर में प्रसाद क्यों नहीं लिया? यहीं पर भोजन करते।

विद्या – जी, सभी की राय तो एक-सी नहीं है, इसीलिए अलग रसोई बन रही है। सभी लोग अतिथिशाला में भोजन करना नहीं चाहते।

राखाल भोजन करने बैठे हैं; श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ बरामदे में बैठकर फिर बातचीत कर रहे हैं।

(२)

आत्मदर्शन का उपाय

श्रीरामकृष्ण – (विद्या अभिनेता के प्रति) – आत्मदर्शन का उपाय है व्याकुलता। मन, वचन और कर्म से उन्हें पाने की चेष्टा। जब देह में काफी पित्त जम जाता है, तो सभी चीजें पीली दिखती हैं; पीले के अतिरिक्त दूसरा कोई रंग नहीं दिखता।

“तुम नाटकवालों में जो लोग केवल औरतों का काम करते हैं, उनका प्रकृतिभाव हो जाता है। औरतों का चिन्तन करके औरतों की तरह चलना-फिरना, सभी कुछ उनके समान हो जाता है। इसी प्रकार रात-दिन ईश्वर का चिन्तन करने पर उन्हीं का स्वभाव प्राप्त