श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
२१ सितम्बर, १८८४ | परिच्छेद ९२ | ६४३
२१ सितम्बर, १८८४ | परिच्छेद ९२ | ६४३
नित्यानन्द के वंशज थे। वे श्रीरामकृष्ण की कुर्सी के पीछे खड़े हुए। उम्र तीस पैंतीस की होगी। श्रीरामकृष्ण को उन्हें देखकर अपार आनन्द हुआ। उनका हाथ पकड़कर उनसे कितनी ही बातें कह रहे हैं। कभी कभी उनसे कहते हैं - 'यहाँ बैठो, बैठो न, तुम्हारे यहाँ रहने पर बड़ी उद्दीपना होगी।' स्नेहपूर्वक उनका हाथ पकड़ मानो खेल कर रहे हैं। उनके मुँह पर हाथ फेरकर कितना ही स्नेह कर रहे हैं।
गोस्वामी के चले जाने पर मास्टर से कह रहे हैं - "वह बड़ा पण्डित है। उसका बाप बड़ा भक्त है। जब मैं खड़दह के श्यामसुन्दर का दर्शन करने गया था, तब सौ रुपये देने पर भी जो भोग नहीं मिलता, वही भोग लाकर मुझे उसने खिलाया था।
"इसके लक्षण बड़े अच्छे हैं। जरा हिला-डुला देने से चेतना हो जायगी। उसे देखते ही उद्दीपना होती है और खूब होती है। और जरा देर रहता तो मैं खड़ा हो जाता।"
पर्दा उठ गया। राजपथ पर नित्यानन्द सिर पर हाथ लगाये हुए खून का बहना रोक रहे हैं। मधाई ने कलसी का टुकड़ा फेंककर मारा है। परन्तु नित्यानन्द का ध्यान मधाई की ओर नहीं है। गौरांग के प्रेम से वे पूरे मतवाले हो रहे हैं। श्रीरामकृष्ण को भावावेश हुआ है। देख रहे हैं, मारकर पश्चाताप करनेवाले मधाई को और उसके साथी जगाई को नित्यानन्द गले से लगा रहे हैं।
अब निमाई शची देवी से संन्यास की बात कह रहे हैं।
सुनकर शची देवी मूर्च्छित हो गयीं। उनको मूर्च्छित देखकर कितने ही दर्शक हाहाकार कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण तिल भर भी विचलित न होकर एकदृष्टि से देख रहे हैं। केवल आँखों के कोरों में एक एक बूँद आँसू झलक रहा हैं।
(८)
श्रीरामकृष्ण का भक्त-प्रेम
अभिनय समाप्त हो गया। श्रीरामकृष्ण गाड़ी पर चढ़ रहे हैं। एक भक्त ने पूछा, आपने कैसा देखा? श्रीरामकृष्ण ने हँसते हुए कहा, असल और नकल एक देखा।
गाड़ी महेन्द्र मुखर्जी के कारखाने में जा रही है। एकाएक श्रीरामकृष्ण को भावावेश हो गया। कुछ देर बाद प्रेमपूर्वक आप ही आप कह रहे हैं - "हा कृष्ण! हे कृष्ण! ज्ञान कृष्ण! प्राण कृष्ण! मन कृष्ण! आत्मा कृष्ण! देह कृष्ण!" फिर कह रहे हैं - "प्राण हे गोविन्द मेरे जीवन!"
गाड़ी मुखर्जी के कारखाने में पहुँची। बड़े आदर-सत्कार के साथ महेन्द्र ने श्रीरामकृष्ण को भोजन कराया। मणि पास बैठे हुए हैं। श्रीरामकृष्ण स्नेहपूर्वक उनसे कह रहे हैं, तुम भी कुछ खाओ। हाथ से उठाकर मिष्टान्न प्रसाद दिया।
अब श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर कालीमन्दिर जा रहे हैं। गाड़ी में महेन्द्र मुखर्जी तथा और
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६४४ श्रीरामकृष्णवचनामृत २१ सितम्बर, १८८४
भी दो-तीन भक्त हैं। महेन्द्र कुछ आगे बढ़कर छोड़ आयेंगे। श्रीरामकृष्ण आनन्दपूर्वक श्रीगौरांग पर रचा गया एक गाना गा रहे हैं। साथ साथ मणि भी गा रहे हैं।
महेन्द्र तीर्थ जायेंगे। श्रीरामकृष्ण से उसी सम्बन्ध की बातें कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – (महेन्द्र से सहास्य) – प्रेम के अंकुर के बिना उगते ही जाओगे, सब सूख न जायेगा?
"परन्तु जल्दी आना। अहा, बहुत दिनों से तुम्हारे यहाँ आने की इच्छा हो रही थी। एक बार देख लिया, अच्छा हुआ।"
महेन्द्र – जी, हम लोगों का जन्म और जीवन सार्थक हो गया।
श्रीरामकृष्ण – सार्थक तो तुम हो ही। तुम्हारे पिता भी अच्छे हैं। उस दिन देखा, अध्यात्म रामायण पर विश्वास है।
महेन्द्र – जी, कृपा रखियेगा, जिससे भक्ति हो।
श्रीरामकृष्ण – तुम बड़े उदार और सरल हो। उदार हुए बिना कोई ईश्वर को पा नहीं सकता। वे कपट से बहुत दूर हैं।
महेन्द्र श्यामबाजार के पास बिदा हुए। गाड़ी जा रही है।
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – यदु मल्लिक ने क्या किया?
मास्टर – (मन ही मन) – श्रीरामकृष्ण सब की कल्याण-कामना कर रहे हैं।
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