श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
परिच्छेद ९३
परिच्छेद ९३
प्रार्थना-रहस्य
(१)
साधारण ब्राह्म-समाज मन्दिर में श्रीरामकृष्ण। 'समन्वय'
आज श्रीरामकृष्ण कलकत्ता आये हुए हैं। आज नवरात्रि की सप्तमी-पूजा है। शुक्रवार, २६ सितम्बर, १८८४। श्रीरामकृष्ण को बहुत से काम हैं। शारदीय महोत्सव है - हिन्दुओं के यहाँ आज प्रायः घर-घर में यह महोत्सव मनाया जा रहा है, फिर राजधानी कलकत्ते की बात ही क्या है। श्रीरामकृष्ण अधर के यहाँ जाकर प्रतिमा-पूजन देखेंगे और आनन्दमयी के आनन्दोत्सव में भाग लेंगे। उनकी एक इच्छा और है। वे श्रीयुत शिवनाथ शास्त्री के दर्शन करेंगे।
दिन के दोपहर से साधारण ब्राह्मसमाज के फुटपाथ पर हाथ में छाता लिये प्रतीक्षा में मास्टर टहल रहे हैं। एक बजा, दो बजे, श्रीरामकृष्ण न आये। श्रीयुत महलानवीस के कारखाने की सीढ़ी पर बैठकर कभी पूजा के उत्सव में आबाल-वृद्ध नरनारियों को आनन्द करते हुए देखते हैं।
तीन बज गये। कुछ देर बाद श्रीरामकृष्ण की गाड़ी आकर पहुँच गयी। साथ में हाजरा तथा दो-एक भक्त और हैं। मास्टर को श्रीरामकृष्ण के दर्शनों से अपार आनन्द हुआ है। उन्होंने श्रीरामकृष्ण की चरणवन्दना की। श्रीरामकृष्ण ने कहा, मैं शिवनाथ के घर जाऊँगा। श्रीरामकृष्ण के आने की बात सुनकर कई ब्राह्मभक्त वहाँ आ पहुँचे। श्रीरामकृष्ण को अपने साथ वे ब्राह्ममुहल्ले के भीतर शिवनाथ के यहाँ ले आये। शिवनाथ घर में न थे। अब क्या किया जाय? देखते ही देखते श्रीयुत विजय, श्रीयुत महलानवीस आदि ब्राह्मसमाज के संचालक आ गये। वे श्रीरामकृष्ण का स्वागत करके उन्हें समाज-मन्दिर के अन्दर ले गये। श्रीरामकृष्ण जरा देर के लिए बैठ गये, यह आशा थी कि तब तक शिवनाथ भी आयेंगे।
श्रीरामकृष्ण सदा ही आनन्दमय बने रहते हैं। हँसकर उन्होंने आसन ग्रहण किया। वेदी के नीचे जिस जगह संकीर्तन होता है, वहीं बैठने का आसन कर दिया गया। विजय आदि बहुतेरे ब्राह्मभक्त सामने बैठे।
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६४६ श्रीरामकृष्णवचनामृत २६ सितम्बर, १८८४
श्रीरामकृष्ण – (विजय से, हँसते हुए) – मैंने सुना है कि यहाँ कोई साइनबोर्ड है। दूसरे मतों के आदमी यहाँ नहीं आने पाते। नरेन्द्र ने कहा, समाज में जाने की जरूरत नहीं, आप शिवनाथ के यहाँ जाइयेगा।
“मैं कहता हूँ, उनको सभी पुकार रहे हैं। द्वेष की क्या जरूरत है? कोई साकार कहता है और कोई निराकार। मैं कहता हूँ, जिसका विश्वास साकार पर है, वह साकार की ही चिन्ता करे और जिसका विश्वास निराकार पर है, वह निराकार की चिन्ता करे। तात्पर्य यह कि इस कट्टरता की कोई आवश्यकता नहीं कि मेरा ही धर्म ठीक है, तथा अन्य सब वाहियात हैं। 'मेरा धर्म ठीक है, पर दूसरों के धर्म में सच्चाई है या वह गलत है, यह मेरी समझ में नहीं आता', ऐसा भाव अच्छा है, क्योंकि बिना ईश्वर का साक्षात्कार किये उनका स्वरूप समझ में नहीं आता। कबीर कहते थे, साकार मेरी माँ है और निराकार मेरा बाप।
'काको निन्दौं काको बन्दौं दोनों पल्ला भारी।'
“हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, शाक्त, वैष्णव, शैव, ऋषियों के समय के ब्रह्मज्ञानी और आजकल के ब्राह्मसमाजवाले तुम लोग, सब एक ही वस्तु की चाह रखते हो। अन्तर इतना ही है कि जिससे जिसका हाजमा नहीं बिगड़ता, उसी की व्यवस्था उसके लिए माँ ने की है।
“बात यह है कि देश, काल और पात्र के भेद से ईश्वर ने अनेक धर्मों की सृष्टि की है। परन्तु सब मत ही उनके रास्ते हैं, पर मत कभी ईश्वर नहीं है। बात यह है कि आन्तरिक भक्ति के द्वारा एक मत का आश्रय लेने पर उनके पास तक पहुँचा जाता है। अगर किसी मत का आश्रय लेने पर कोई भूल उसमें रहती है, तो आन्तरिकता के होने पर वे भूल सुधार देते हैं। अगर कोई आन्तरिक भक्ति के साथ जगन्नाथजी के दर्शनों के लिए निकलता है और भूलकर दक्षिण की ओर न जाकर उत्तर की ओर चला जाता है, तो रास्ते में उसे कोई अवश्य ही कह देता है, 'क्यों भाई, उस तरफ कहाँ जाते हो, दक्षिण की ओर जाओ।' वह आदमी कभी न कभी जगन्नाथजी के दर्शन अवश्य ही करेगा।
“परन्तु इस बात की आलोचना हमारे लिए निष्प्रयोजन है कि दूसरों का मत गलत है। जिनका यह संसार है, वे सोच रहे हैं। हमारा तो यह कर्तव्य है कि किसी तरह जगन्नाथजी के दर्शन करें। और तुम्हारा मत अच्छा तो है। उन्हें निराकार कह रहे हो, यह अच्छा तो है। मिश्री की रोटी सीधी तरह से खाओ या टेढ़ी करके खाओ, मीठी जरूर लगेगी।
“केवल कट्टरता अच्छी नहीं होती। तुम लोगों ने बहुरूपिये की कहानी सुनी होगी। आदमी ने जंगल में जाकर पेड़ पर एक गिरगिट देखा। मित्रों के पास लौटकर उसने कहा, मैंने एक लाल गिरगिट देखा। उसको विश्वास था कि वह बिलकुल लाल है। एक आदमी और उस पेड़ के नीचे से लौटकर आया और उसने आकर कहा, मैं एक हरा
CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar