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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

परिच्छेद ८६

परिच्छेद ८६

साधना की आवश्यकता

(१)

पुनर्यात्रा दिन

श्रीरामकृष्ण बलराम बाबू के बैठकखाने में भक्तों के साथ बैठे हुए हैं। श्रीमुख पर प्रसन्नता झलक रही है, भक्तों से बातचीत कर रहे हैं।

आज रथ की पुनर्यात्रा है, दिन बृहस्पति है, ३ जुलाई १८८४, आषाढ़ की शुक्ला दशमी। श्रीयुत बलराम के यहाँ जगन्नाथजी की सेवा होती है, एक छोटा सा रथ भी है। उन्होंने पुनर्यात्रा के उपलक्ष्य में श्रीरामकृष्ण को निमन्त्रण भेजा था। यहाँ छोटा रथ, घर के बाहरवाले दुमंजले बरामदे में चलाया जाता है।

गत २५ जून बुधवार को रथयात्रा का प्रथम दिन था। श्रीरामकृष्ण ने श्रीयुत ईशान मुखोपाध्याय के यहाँ आकर निमन्त्रण स्वीकार किया था। उसी दिन पिछले पहर कालेज स्ट्रीट में भूधर के यहाँ पण्डित शशधर के साथ उनकी पहली मुलाकात हुई थी। तीन दिन की बात है, दक्षिणेश्वर में शशधर श्रीरामकृष्ण से मिले थे।

श्रीरामकृष्ण की आज्ञा पाकर बलराम ने आज शशधर को न्योता भेजा है। पण्डितजी हिन्दूधर्म की व्याख्या करके लोगों को शिक्षा देते हैं।

श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ बातचीत कर रहे हैं। पास ही राम, मास्टर, बलराम, मनोमोहन, कई बालक भक्त, बलराम के पिता आदि बैठे हैं। बलराम के पिता वैष्णव हैं, बड़े निष्ठावान हैं। वे प्रायः वृन्दावन में अपने ही प्रतिष्ठित कुंज में अकेले रहते हैं और श्रीश्यामसुन्दर विग्रह की सेवा करते हैं। वृन्दावन में वे अपना सारा समय देवसेवा में ही लगाते हैं। कभी कभी चैतन्य-चरितामृत आदि भक्तिग्रन्थों का पाठ करते हैं। कभी किसी भक्तिग्रन्थ की दूसरी लिपि उतारते हैं। कभी बैठे हुए स्वयं ही फूलों की माला तैयार करते हैं। कभी वैष्णवों का निमन्त्रण करके उनकी सेवा करते हैं। श्रीरामकृष्ण के दर्शन करने के लिए बलराम ने उन्हें पत्र पर पत्र भेजकर कलकत्ता बुलाया है। 'सभी धर्मों में साम्प्रदायिक भाव है, खासकर वैष्णवों में। दूसरे मत वाले एक दूसरे से विरोध करते हैं, वे समन्वय करना नहीं जानते।' – यही बात श्रीरामकृष्ण भक्तों से कह रहे हैं।

५६४ श्रीरामकृष्णवचनामृत ३ जुलाई, १८८४

श्रीरामकृष्ण – (बलराम के पिता और दूसरे भक्तों से) – वैष्णवों का एक ग्रन्थ है भक्तमाल, बड़ी अच्छी पुस्तक है। भक्तों की सब बातें उसमें हैं। परन्तु एक ही ढर्रे की है। एक जगह भगवती को विष्णुमन्त्र दिलाया है, तब पिण्ड छोड़ा है!

“‘मैंने वैष्णवचरण की बड़ी तारीफ करके सेजो बाबू के पास बुलवाया था। सेजो बाबू ने खूब खातिर की। चाँदी के बर्तन निकालकर उन्हीं में उनको जलपान कराया। फिर जब बातें होने लगीं, तब उसने सेजो बाबू के सामने कह डाला – ‘हमारे केशव-मन्त्र के बिना कुछ होने-जाने का नहीं।’ सेजो बाबू देवी के उपासक थे। इतना सुनते ही उनका मुँह लाल हो गया। मैंने वैष्णव चरण का हाथ दबा दिया।

“सुना है कि श्रीमद्भागवत जैसे ग्रन्थ में भी इस तरह की बातें हैं। ‘केशव का मन्त्र बिना लिये भवसागर के पार जाना कुत्ते की पूँछ पकड़कर महासमुद्र पार करना है।’ भिन्न-भिन्न मतवालों ने अपने ही मत को प्रधान बतलाया है।

“शाक्त भी वैष्णवों को छोटा सिद्ध करने की चेष्टा करते हैं। श्रीकृष्ण भव-नदी के नाविक हैं, पार कर देते हैं, इस पर शाक्त लोग कहते हैं – ‘हाँ, यह बिलकुल ठीक है, क्योंकि हमारी माँ राजराजेश्वरी हैं, भला वे कभी खुद आकर पार कर सकती हैं? – कृष्ण को पार करने के लिए नौकर रख लिया है।’ (सब हँसते हैं।)

“अपने मत पर लोग अहंकार भी कितना करते हैं! उस देश (कामारपुकुर), श्यामबाजार आदि स्थानों में कोरी बहुत हैं। उनमें बहुत से वैष्णव हैं। वे बड़ी लम्बी लम्बी बातें मारते हैं। कहते हैं, ‘अरे ये किस विष्णु को मानते हैं – पाता (पालनकर्ता) विष्णु को? – उसे तो हम लोग छुयेंगे भी नहीं! कौन शिव? – हम लोग तो आत्माराम शिव – आत्मारामेश्वर शिव को मानते हैं।’ कोई दूसरा बोल उठा, ‘तुम लोग समझाओ भी तो, किस हरि को मानते हो?’ इधर कपड़े बुनते हैं और उधर इतनी लम्बी लम्बी बातें!

“रति की माँ, रानी कात्यायनी की सहचरी है; – वैष्णवचरण के दल की है, कट्टर वैष्णवी। यहाँ बहुत आया-जाया करती थी। भक्ति का खूब दिखलावा था, ज्योंही मुझे उसने काली का प्रसाद पाते हुए देखा कि भागी।

“जिसने समन्वय किया है, वही मनुष्य है। अधिकतर आदमी एक खास ढर्रे के होते हैं। परन्तु मैं देखता हूँ, सब एक हैं। शाक्त, वैष्णव, वेदान्त मत, सब उसी एक को लेकर हैं; जो साकार हैं वे ही निराकार हैं, उन्हीं के अनेक रूप हैं। ‘निर्गुण मेरे पिता हैं, सगुण मेरी माँ; मैं किसकी निन्दा करूँ और किसकी वन्दना, दोनों ही पलड़े भारी हैं।’ वेदों में जिनकी बात है उन्हीं की बात तन्त्रों में है और पुराणों में भी उसी एक सच्चिदानन्द की बातें हैं। जो नित्य हैं, लीला भी उन्हीं की है।

“वेदों में है – ॐ सच्चिदानन्द ब्रह्म। तन्त्रों में है – ॐ सच्चिदानन्दः शिवः –