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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

परिच्छेद ७९

परिच्छेद ७९

अवतारवाद

(१)

प्राणकृष्ण, मास्टर, राम, गिरीश, गोपाल आदि के संग में

शनिवार, ५ अप्रैल १८८४। सुबह के आठ बजे हैं। मास्टर ने दक्षिणेश्वर में पहुँचकर देखा, श्रीरामकृष्ण प्रसन्नचित्त हैं; अपनी छोटी खाट पर बैठे हैं। जमीन पर कई भक्त बैठे थे। उनमें श्रीयुत प्राणकृष्ण मुखोपाध्याय भी थे।

प्राणकृष्ण जनाई के मुखर्जियों के वंश के हैं। कलकत्ते में श्यामपुकुर में रहते हैं, मेकेंजी लायल के एक्सचेंज (Exchange) नामक नीलाम-घर के कार्याध्यक्ष हैं। ये गृहस्थ तो हैं परन्तु वेदान्तचर्चा में उनकी बड़ी प्रीति है। श्रीरामकृष्णदेव की बड़ी भक्ति करते हैं – कभी कभी उनके दर्शन कर जाया करते हैं। अभी अभी एक दिन श्रीरामकृष्णदेव को अपने घर ले जाकर उन्होंने उत्सव मनाया था। ये बागबाजार के घाट में रोज प्रातःकाल गंगास्नान करते हैं और वहाँ कोई नाव ठीक हो गयी तो उस पर चढ़कर सीधे दक्षिणेश्वर श्रीरामकृष्ण के दर्शन के लिए चले आते हैं। आज भी इसी तरह उन्होंने नाव किराये पर की थी। नाव जब किनारे से आगे बढ़ी तब उसमें लहरों की टक्कर लगने लगी। मास्टर भी उनके साथ थे। उन्होंने कहा, मुझे उतार दीजिये। प्राणकृष्ण और उनके दूसरे मित्र समझाने लगे, परन्तु उन्होंने कहा, नहीं, मुझे उतार दीजिये, मैं पैदल चलकर दक्षिणेश्वर जाऊँगा। लाचार हो उन्हें उतार देना पड़ा।

मास्टर ने पहुँचकर देखा, वे लोग कुछ पहले ही पहुँच गये हैं; श्रीरामकृष्ण से वार्तालाप कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण को साष्टांग प्रणाम करके वे भी एक ओर बैठे।

अवतारवाद

श्रीरामकृष्ण – (प्राणकृष्ण से) – परन्तु आदमी में उनका ज्यादा प्रकाश है। अगर कहो, अवतार कैसे सिद्ध होगा, जिनमें भूखप्यास ये सब जीवों के धर्म हैं – सम्भव है कि उनमें रोग-शोक भी हों – तो इसका उत्तर यह है कि पंचभूतों के फन्दे में पड़कर ब्रह्म रो रहे हैं।