श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
परिच्छेद ६३
परिच्छेद ६३
ईश्वरदर्शन के उपाय
(१)
श्रीरामकृष्ण मणि के साथ पश्चिमवाले गोल बरामदे में बैठे हैं। सामने दक्षिणवाहिनी भागीरथी है। पास ही कनेर, बेला, जूही, गुलाब, कृष्णचूड़ा आदि अनेक प्रकार के फूले हुए पेड़ हैं। दिन के दस बजे होंगे।
आज रविवार, अगहन की कृष्णा द्वितीया है – १६ दिसम्बर १८८३।
श्रीरामकृष्ण मणि को देख रहे हैं और गा रहे हैं –
(भावार्थ) – “माँ तारा, मुझे तारना होगा, मैं शरणागत हूँ। पिंजड़े के पक्षी जैसी मेरी दशा हो रही है। मैंने असंख्य अपराध किए हैं। मैं ज्ञानहीन हूँ। मैं माया में मोहित हुआ व्यर्थ भटकता फिर रहा हूँ। बछड़ा खो जाने पर गाय की जो दशा होती है, वही दशा मेरी भी है।”
सीता की तरह व्याकुलता
श्रीरामकृष्ण – क्यों? – पिंजड़े की चिड़िया की तरह क्यों होगे? छि:!”
कहते ही कहते भावावेश में आ गए। शरीर, मन, सब स्थिर है; आँखों से धारा बह चली है।
कुछ देर बाद कह रहे हैं, “माँ, सीता की तरह कर दो। बिलकुल सब भूल गयी हैं – देह का ख्याल नहीं; हाथ, पैर, स्तन, योनि – किसी का होश नहीं! एकमात्र चिन्ता – 'राम कहाँ!' ”
किस तरह व्याकुल होने पर ईश्वरलाभ होता है, मणि को इसकी शिक्षा देने के लिए ही मानो श्रीरामकृष्ण के मन में सीता का उद्दीपन हुआ था। सीता राममयजीविता थीं, – श्रीरामचन्द्र की चिन्ता में ही वे पागल हो रही थीं, – इतनी प्रिय वस्तु जो देह है उसे भी वे भूल गयी थीं!
दिन के तीसरे प्रहर के चार बजे का समय है। श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ उसी कमरे में बैठे हुए हैं। जनाई के मुखर्जीबाबू आए हुए हैं, – ये श्री प्राणकृष्ण के आत्मीय हैं। उनके
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साथ एक शास्त्रज्ञ ब्राह्म मित्र हैं। मणि, राखाल, लाटू, हरीश, योगीन्द्रादि भक्त भी हैं।
योगीन्द्र दक्षिणेश्वर के सावर्ण चौधरियों के यहाँ के हैं। ये आजकल प्रायः रोज दिन ढलने पर श्रीरामकृष्ण के दर्शन करने आते हैं और रात को चले जाते हैं। योगीन्द्र ने अभी विवाह नहीं किया।
मुखर्जी (प्रणाम करके) – आपके दर्शन से बड़ा आनन्द हुआ।
श्रीरामकृष्ण – वे सभी के भीतर हैं, वही सोना सब के भीतर है, कहीं प्रकाश अधिक है। संसार में उस सोने पर बहुत मिट्टी पड़ी रहती है।
मुखर्जी (सहास्य) – महाराज, ऐहिक और पारमार्थिक में अन्तर क्या है?
श्रीरामकृष्ण – साधना के समय 'नेति' 'नेति' करके त्याग करना पड़ता है। उन्हें पा लेने पर समझ में आता है, सब कुछ वही हुए हैं।
“जब श्रीरामचन्द्र को वैराग्य हुआ, तब दशरथ को बड़ी चिन्ता हुई। वे वशिष्ठजी की शरण में गए, जिससे राम संसार का त्याग न करें। वशिष्ठजी ने श्रीरामचन्द्र के पास जाकर देखा, वे विमनस्क हुए बैठे हैं – अन्तर तीव्र वैराग्य से भरा हुआ है। वशिष्ठजी ने कहा, 'राम, तुम संसार का त्याग क्यों करोगे? संसार क्या कोई उनसे अलग वस्तु है? मेरे साथ विचार करो।' राम ने देखा, संसार भी उसी परब्रह्म से हुआ है, इसलिए चुपचाप बैठे रहे।
“जैसे जिस चीज से मट्ठा होता है, उसी से मक्खन भी होता है। अतएव मट्ठे का ही मक्खन और मक्खन का ही मट्ठा कहना चाहिए। बड़ी कठिनाइयों से मक्खन उठा लेने पर (अर्थात् ब्रह्मज्ञान होने पर) देखोगे, मक्खन रहने से मट्ठा भी है; जहाँ मक्खन है वहीं मट्ठा है। ब्रह्म है, इस ज्ञान के रहने से जीव, जगत्, चतुर्विंशति तत्त्व भी हैं।
“ब्रह्म क्या वस्तु है, यह कोई मुँह से नहीं कह सकता। सब वस्तुएँ जूठी हो गयी हैं, (अर्थात् मुँह से कही जा चुकी हैं) परन्तु ब्रह्म क्या है, यह कोई मुँह से नहीं कह सका, इसीलिए वह जूठा नहीं हुआ। यह बात मैंने विद्यासागर से कही थी। विद्यासागर सुनकर बड़े प्रसन्न हुए।
“विषयबुद्धि का लेशमात्र रहते भी यह ब्रह्मज्ञान नहीं होता। कामिनी-कांचन का भाव जब मन में बिलकुल न रहेगा, तब होगा। पार्वतीजी ने पर्वतराज से कहा, 'पिताजी, अगर आप ब्रह्मज्ञान चाहते हैं तो साधुओं का संग कीजिए।'”
क्या श्रीरामकृष्ण के कहने का तात्पर्य यही है कि मनुष्य चाहे संसारी हो या संन्यासी, कामिनी-कांचन में मग्न रहने पर उसे ब्रह्मज्ञान नहीं होता?
श्रीरामकृष्ण फिर मुखर्जी से कह रहे हैं –
“तुम्हारे धन-सम्पत्ति है फिर भी तुम ईश्वर को भी पुकारते हो, यह बहुत अच्छा है। गीता में है – जो लोग योगभ्रष्ट हो जाते हैं वही भक्त होकर धनी के घर जन्म लेते हैं।”
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१६ दिसम्बर, १८८३ परिच्छेद ६३ ३७९
मुखर्जी (अपने मित्र से सहास्य) – “शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते।”
श्रीरामकृष्ण – वे चाहे तो ज्ञानी को संसार में भी रख सकते हैं। उन्हीं की इच्छा से यह जीव-प्रपंच हुआ है। वे इच्छामय हैं।
मुखर्जी (सहास्य) – उनकी फिर कैसी इच्छा? क्या उन्हें भी कोई अभाव है?
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – इसमें दोष ही क्या है? पानी स्थिर रहे तो भी वह पानी है और जीव-जगत क्या मिथ्या है? तरंगें उठने पर भी वह पानी ही है।
“साँप चुपचाप कुण्डली बाँधकर बैठा रहे, तो भी वह साँप है और तिर्यग्-गति हो, टेढ़ा-मेढ़ा रेंगने से भी वह साँप ही है।
“बाबू जब चुपचाप बैठे रहते हैं, तब वे जो मनुष्य हैं, वही मनुष्य वे उस समय भी हैं जब वे काम करते हैं।
“जीव-प्रपंच को अलग कैसे कर सकते हो? इस तरह वजन तो घट जाएगा! बेल के बीज और खोपड़ा निकाल देने से पूरे बेल का वजन ठीक नहीं उतरता।
“ब्रह्म निर्लिप्त है। सुगन्ध और दुर्गन्ध वायु से मिलती है, परन्तु वायु निर्लिप्त है। ब्रह्म और शक्ति अभेद हैं। उसी आद्याशक्ति से जीव-प्रपंच बना है।”
मुखर्जी – योगभ्रष्ट क्यों होते हैं?
श्रीरामकृष्ण – कहते हैं न ‘जब मैं गर्भ में था तब योग में था, पृथ्वी पर गिरते ही मिट्टी खायी। धाई ने तो मेरा नार काटा; पर यह माया की बेड़ी कैसे काटूँ?’
“कामिनी-कांचन ही माया है। मन से इन दोनों के जाते ही योग होता है। आत्मा – परमात्मा – चुम्बक पत्थर है, जीवात्मा एक सूई है – उनके खींच लेने ही से योग हो गया। परन्तु सूई में अगर मिट्टी लगी हुई हो, तो चुम्बक नहीं खींचता – मिट्टी साफ कर देने से फिर खींचता है। कामिनी-कांचन मिट्टी है, इसे साफ करना चाहिए।”
मुखर्जी – यह किस तरह साफ हो?
श्रीरामकृष्ण – उनके लिए व्याकुल होकर रोओ। वही जल मिट्टी पर गिरने से मिट्टी धुल जाएगी। जब खूब साफ हो जाएगी तब चुम्बक खींच लेगा। योग तभी होगा।
मुखर्जी – अहा! कैसी बात है!
श्रीरामकृष्ण – उनके लिए रो सकने पर उनके दर्शन होते हैं – समाधि होती है। योग में सिद्ध होने से ही समाधि होती है। रोने से कुम्भक आप ही आप होता है। – उसके बाद समाधि।
“एक उपाय और है – ध्यान। सहस्त्रार कमल (मस्तक) में विशेष रूप से शिव का अधिष्ठान है – उसका ध्यान। शरीर आधार है और मन-बुद्धि जल। इस पानी पर उस सच्चिदानन्द सूर्य का बिम्ब गिरता है! उसी बिम्बसूर्य का ध्यान करते करते उनकी कृपा से यथार्थ सूर्य के भी दर्शन होते हैं।
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साधुसंग करो और आम-मुखतारी दे दो
“परन्तु संसारी मनुष्यों के लिए तो सदा ही साधुसंग की आवश्यकता है। यह सभी के लिए आवश्यक है; संन्यासियों के लिए भी। परन्तु संसारियों के लिए यह विशेषकर आवश्यक है। उन्हें रोग लगा ही हुआ है – कामिनी-कांचन में सदा ही रहना पड़ता है।”
मुखर्जी – जी हाँ, रोग लगा ही हुआ है।
श्रीरामकृष्ण – उन्हें आम-मुखतारी दे दो – वे जो चाहे सो करें। तुम बिल्ली के बच्चे की तरह उन्हें पुकारते भर रहो – व्याकुल होकर। उसकी माँ उसे चाहे जहाँ रखे – वह कुछ भी नहीं जानता; – कभी बिस्तर पर रखती है तो कभी रसोईघर में!
मुखर्जी – गीता आदि शास्त्र पढ़ना अच्छा है।
श्रीरामकृष्ण – केवल पढ़ने-सुनने से क्या होगा? किसी ने दूध का नाम मात्र सुना है, किसी ने दूध देखा है और किसी ने दूध पिया है। ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं और उनसे वार्तालाप भी किया जा सकता है।
“पहले प्रवर्तक है – वह पढ़ता-सुनता है। उसके बाद साधक हैं, – उन्हें पुकारता है, ध्यान-चिन्तन और नामगुण-कीर्तन करता है। इसके बाद सिद्ध – उसे हृदय में उनका अनुभव हुआ है, उनके दर्शन हुए हैं। इसके बाद है सिद्ध का सिद्ध – जैसे चैतन्यदेव की अवस्था – कभी वात्सल्य और कभी मधुर भाव।”
मणि, राखाल, योगीन्द्र, लाटू आदि भक्तगण ये सब देवदुर्लभ तत्त्वपूर्ण कथाएँ आश्चर्यचकित होकर सुन रहे हैं।
अब मुखर्जी और उनके साथवाले विदा होंगे। वे सब प्रणाम करके उठ खड़े हुए। श्रीरामकृष्ण भी, शायद उन्हें सम्मान दिखाने के उद्देश्य से खड़े हो गये।
मुखर्जी (सहास्य) – आपके लिए उठना और बैठना!
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – उठने और बैठने में हानि क्या है? पानी स्थिर होने पर भी पानी है और हिलने-डुलने पर भी पानी ही है। आँधी में जूठी पत्तल, हवा चाहे जिस ओर उड़ा ले जाय। मैं यन्त्र हूँ, वे यन्त्री हैं।
(२)
श्रीरामकृष्ण का दर्शन और वेदान्ततत्त्वों की गूढ़ व्याख्या
जनाई के मुखर्जी चले गए। मणि सोच रहे हैं, वेदान्तदर्शन के मत से सब स्वप्नवत् है। तो क्या जीव, जगत्, मैं – यह सब मिथ्या है?
मणि ने थोड़ा-बहुत वेदान्त पढ़ा है। फिर जिनके विचार मानो वेदान्त की ही अस्फुट प्रतिध्वनि है, उन कान्ट, हेगेल आदि जर्मन पण्डितों के भी कुछ ग्रन्थ पढ़े हैं।