श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
परिच्छेद १३
परिच्छेद १३
केशवचन्द्र सेन के साथ श्रीरामकृष्ण का नौका विहार, आनन्द और वार्तालाप
(१)
समाधि में
आज शरत्-पूर्णिमा है। लक्ष्मीजी की पूजा है। शुक्रवार, २७ अक्टूबर १८८२। श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर कालीमन्दिर के उसी पूर्व-परिचित कमरे में बैठे हैं। विजय गोस्वामी और हरलाल से बातचीत कर रहे हैं। एक आदमी ने आकर कहा, 'केशव सेन जहाज पर चढ़कर घाट पर आए हैं।' केशव के शिष्यों ने प्रणाम करके कहा, 'महाराज, जहाज आया है। आपको चलना होगा; चलिए, जरा घूम आइएगा। केशवबाबू जहाज में हैं, हमें भेजा है।'
शाम के चार बज गए हैं। श्रीरामकृष्ण नाव पर होते हुए जहाज पर चढ़ रहे हैं। साथ विजय हैं। नाव पर चढ़ते ही बाह्यज्ञानरहित समाधिमग्न हो गए।
मास्टर जहाज में खड़े खड़े यह समाधिचित्र देख रहे हैं। वे दिन के तीन बजे केशव के साथ जहाज पर चढ़कर कलकत्ते से आए हैं। बड़ी इच्छा है, श्रीरामकृष्ण और केशव का मिलन, उनका आनन्द देखेंगे और उनकी बातें सुनेंगे। केशव ने अपने साधुचरित्र और वक्तृता के बल से मास्टर जैसे अनेक वंगीय युवकों का मन हर लिया है। अनेकों ने उन्हें अपना परम आत्मीय जानकर अपने हृदय का प्रेम समर्पित कर दिया है। केशव अंग्रेजी जानते हैं, अंग्रेजी दर्शन और साहित्य जानते हैं, फिर बहुत बार देव-देवियों की पूजा को पौत्तलिकता भी कहते हैं। इस प्रकार के मनुष्य श्रीरामकृष्ण को भक्ति और श्रद्धा की दृष्टि से देखते हैं। और बीच बीच में दर्शन करने आते हैं, यह बात अवश्य विस्मयजनक है। उनके मन में मेल कहाँ और किस प्रकार हुआ, यह रहस्य-भेद करने के लिए मास्टर आदि अनेकों को कौतूहल हुआ है। श्रीरामकृष्ण निराकारवादी तो हैं, किन्तु साकारवादी भी हैं। ब्रह्म का चिन्तन करते हैं, और फिर देव-देवियों के सामने पुष्प-चन्दन से पूजा और प्रेम से मतवाले होकर नृत्यगीत भी करते हैं। खाट और बिछौने पर बैठते हैं, लाल धारीदार
८० श्रीरामकृष्णवचनामृत २७ अक्टूबर, १८८२
धोती, कुर्ता, मोजा, जूता पहनते हैं; परन्तु संसार से स्वतन्त्र हैं। सारे भाव संन्यासियों के से हैं, इसीलिए लोग परमहंस कहते हैं। इधर केशव निराकारवादी है; स्त्री-पुत्रवाले गृही हैं; अंग्रेजी में व्याख्यान देते हैं; अखबार लिखते हैं; विषयकर्मों की देखरेख भी करते हैं।
केशव आदि ब्राह्मभक्त जहाज पर से मन्दिर की शोभा देख रहे हैं। जहाज के पूर्व ओर पास ही बँधा घाट और मन्दिर का चाँदनीमण्डप है। बायीं ओर - चाँदनीमण्डप के उत्तर, बारह शिवमन्दिर में से छः मन्दिर हैं; दक्षिण की ओर भी छः मन्दिर है। शरद् के नील आकाश की पृष्ठभूमि पर भवतारिणी के मन्दिर का कलश तथा उत्तर की ओर पंचवटी और देवदार वृक्षों के शिरोभाग दीखते हैं। एक नौबतखाना बकुलतला के पास है और कालीमन्दिर के दक्षिण प्रान्त में एक और नौबतखाना है। दोनों नौबतखानों के बीच में बगीचे का रास्ता है जिसके दोनों ओर कतार के कतार फूलों के पेड़ लगे हैं। शरत्-काल के आकाश की नीलिमा श्रीगंगा के वक्ष पर पड़कर अपूर्व शोभा दे रही है। बाहरी संसार में भी कोमल भाव है और ब्राह्मभक्तों के हृदय में भी कोमल भाव है। ऊपर सुन्दर नीला अनन्त आकाश है, सामने सुन्दर ठाकुरबाड़ी है, नीचे पवित्रसलिला गंगा हैं जिनके किनारे आर्यऋषियों ने परमात्मा का स्मरण-मनन किया है। फिर एक महापुरुष आये हैं, जो साक्षात् सनातन धर्म हैं! इस प्रकार के दर्शन मनुष्यों को सर्वदा नहीं होते। ऐसे समाधिमग्न महापुरुष पर किसकी भक्ति नहीं होगी, ऐसा कौन कठोर मनुष्य है जो द्रवीभूत न होगा?
(२)
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही॥ (गीता, २-२२)
समाधि में। आत्मा अविनश्वर है। पवहारी बाबा
नाव आकर जहाज से लगी। सभी श्रीरामकृष्ण को देखने के लिए उत्सुक हो रहे हैं। अच्छी भीड़ है। श्रीरामकृष्ण को निर्विघ्न उतारने के लिए केशव आदि व्यग्र हो रहे हैं। बड़ी मुश्किल से उन्हें होश में लाकर कमरे के भीतर ले गए। अभी तक भावस्थ है, एक भक्त का सहारा लेकर चल रहे हैं। सिर्फ पैर हिल रहे हैं। कैबिन-घर में आपने प्रवेश किया। केशव आदि भक्तों ने प्रणाम किया किन्तु आपको होश नहीं। कमरे के भीतर एक मेज और कुछ कुर्सियाँ हैं। एक कुर्सी पर श्रीरामकृष्ण बैठाए गए, एक पर केशव बैठे। विजय बैठे। दूसरे भक्त फर्श पर जहाँ जगह मिली वहीं बैठ गए। अनेक मनुष्यों को जगह नहीं मिली। वे सब बाहर से झाँक-झाँककर देखने लगे। श्रीरामकृष्ण बैठे हुए फिर समाधिस्थ हो गए, - सम्पूर्ण बाह्यज्ञानशून्य। सभी एक नजर से देख रहे हैं।
केशव ने देखा कि कमरे के भीतर बहुत आदमी हैं और श्रीरामकृष्ण को तकलीफ