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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages
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इह प्र ब्रूहि यतमः सो अग्ने यो यातुधानो य इदं कृणोति.
तमा रभस्व समिधा यविष्ठ नृचक्षसंश्कक्षुषे रन्धयैनम्.. (८)
हे अग्नि! उस राक्षस को भगाओ जो यज्ञ में विघ्न डालता है. हे अतिशय युवा अग्नि!
तुम समिधाओं द्वारा प्रज्वलित होकर राक्षस को मारो. हे मानवों को देखने वाले अग्नि! तुम
राक्षस को अपने तेज के वश में करो. (८)
तीक्ष्णेनाग्ने चक्षुषा रक्ष यज्ञं प्राञ्चं वसुभ्यः प्र णय प्रचेतः.
हिंस्रं रक्षांस्यभि शोशुचानं मा त्वा दभन्यातुधाना नृचक्षः.. (९)
हे अग्नि! तुम अपने तीखे तेज से हमारे यज्ञ की रक्षा करो. हे उत्तम ज्ञान वाले अग्नि!
इस यज्ञ को धन के अनुकूल बनाओ. हे प्रदीप्त एवं मानवदर्शक अग्नि! तुम राक्षसों को मारो.
वे तुम्हें न मार सकें. (९)
नृचक्षा रक्षः परि पश्य विक्षु तस्य त्रीणि प्रति शृणीह्यग्रा.
तस्याग्ने पृष्टीर्हरसा शृणीहि त्रेधा मूलं यातुधानस्य वृश्च.. (१०)
हे मानवदर्शक अग्नि! तुम मानवहिंसक राक्षस को देखो तथा उसके तीन मस्तकों को
काट डालो. (१०)
त्रियातुधानः प्रसितिं त एत्वृतं यो अग्ने अनृतेन हन्ति.
तमर्चिषा स्फूर्जयञ्जातवेदः समक्षमेनं गृणते नि वृङ्धि.. (११)
हे अग्नि! राक्षस तीन बार तुम्हारी लपटों में जावे. जो राक्षस असत्य से सत्य को मारता
है, उसे तुम अपने तेज से भस्म कर दो. हे जातवेद अग्नि! इस राक्षस को मेरे सामने ही
टुकड़े-टुकड़े कर दो. (११)
तदग्ने चक्षुः प्रति धेहि रेभे शफारुजं येन पश्यसि यातुधानम्.
अथर्ववज्ज्योतिषा दैव्येन सत्यं धूर्वन्तमचितं न्योष.. (१२)
हे अग्नि! गर्जन करते हुए इस राक्षस पर वह दृष्टि डालो जो तुम खुरों के समान नाखूनों
द्वारा सज्जनों को भग्न करने वाले राक्षस पर डालते हो. दध्यङ् अथर्वा ऋषि जिस प्रकार
अपने तेज से राक्षसों को मारते हैं, उसी प्रकार तुम अपने तेज से असत्य द्वारा सत्य का हनन
करने वाले राक्षस को मारो. (१२)
यदग्ने अद्य मिथुना शपातो यद्वाचस्तृष्टं जनयन्त रेभाः.
मन्योर्मनसः शरव्या३ जायते या तया विध्य हृदये यातुधानान्.. (१३)
हे अग्नि! आज स्त्रीपुरुष आपस में लड़ रहे हैं और स्तोता कड़वी बातें कह रहे हैं. इस
कारण मन में क्रोध होने पर जो बाण फेंका जाता है, उसी बाण से तुम राक्षसों का हृदय बेध
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दो. (१३)
परा शृणीहि तपसा यातुधानान्पराग्ने रक्षो हरसा शृणीहि.
पराचिंषा मूरदेवाञ्छृणीहि परासुतृपो अभि शोशुचानः.. (१४)
हे अग्नि! तुम अपनी गरमी से राक्षसों को जलाओ तथा अपने तेज से राक्षसों को
समाप्त करो. मूढ़ राक्षसों को तुम अपने परम तेज से नष्ट करो. जो राक्षस दूसरों के प्राण
हरण करके तृप्त होते हैं, उन्हें तुम शोकमग्न करो. (१४)
पराद्य देवा वृजिनं शृणन्तु प्रत्यगेनं शपथा यान्तु तृष्टाः.
वाचास्तेनं शरव ऋच्छन्तु मर्मन्विश्वस्यैतु प्रसितिं यातुधानः.. (१५)
आज महान् देव पापी राक्षस को समाप्त करें. हमारी बुरी उक्तियां इस राक्षस को लगें.
हमारे बाण इस असत्यवादी राक्षस को लगें. राक्षस व्याप्त अग्नि के जाल में फंसे. (१५)
यः पौरुषेयेण क्रविषा समङ्क्ते यो अश्व्येन पशुना यातुधानः.
यो अघ्न्याया भरति क्षीरमग्ने तेषां शीर्षाणि हरसापि वृश्च.. (१६)
हे अग्नि! जो राक्षस पुरुष का मांस अपने पास लाता है. जो अश्व आदि उपयोगी पशुओं
का मांस एकत्र करता है अथवा जो गाय का दूध चुराता है, उसके सिर को काट दो. (१६)
संवत्सरीणं पय उस्रियायास्तस्य माशीद्यातुधानो नृचक्षः.
पीयूषमग्ने यतमस्तितृप्सात्तं प्रत्यञ्चमर्चिषा विध्य मर्मन्.. (१७)
हे मानवदर्शक अग्नि! गाय के एक वर्ष तक के दूध को राक्षस न पी सकें. जो राक्षस
इस अमृततुल्य गोदुग्ध को पीने के लिए आगे आवे, उसके मर्म को तुम अपनी ज्वालाओं द्वार
छिन्न-भिन्न कर डालो. (१७)
विषं गवां यातुधानाः पिबन्त्वा वृश्च्यन्तामदितये दुरेवाः.
परैनान्देवः सविता ददातु परा भागमोषधीनां जयन्ताम्.. (१८)
हे अग्नि! राक्षसों द्वारा दिया हुआ गोदुग्ध विष हो जाए एवं राक्षस काटकर अग्नि को
भेंट किए जावें. सूर्य इन राक्षसों को हिंसकों को सौंप दें. राक्षस ओषधियों का असार अंश
प्राप्त करें. (१८)
सनादग्ने मृणसि यातुधानान्न त्वा रक्षांसि पृतनासु जिग्युः.
अनु दह सहमूरान्क्रव्यादो मा ते हेत्या मुक्षत दैव्यायाः.. (१९)
हे अग्नि! तुम बहुत समय से राक्षसों को बाधा पहुंचा रहे हो. राक्षस तुम्हें युद्ध में नहीं
जीत पाए. तुम मांसभक्षक राक्षसों को समूल नष्ट करो. वे तुम्हारे दिव्य आयुधों से बच न
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सकें. (१९)
त्वं नो अग्ने अधरादुदक्तात्त्वं पश्चादुत रक्षा पुरस्तात्.
प्रति ते ते अजरासस्तपिष्ठा अघशंसं शोशुचतो दहन्तु.. (२०)
हे अग्नि! तुम हमें दक्षिण, उत्तर, पश्चिम एवं पूर्व दिशाओं से बचाओ. तुम्हारी अतिशय
तप्त, जरारहित एवं ज्वलित किरणें पापी राक्षसों को भस्म कर दें. (२०)
पश्चात्पुरस्तादधरादुदक्तात्कविः काव्येन परि पाहि राजन्.
सखे सखायमजरो जरिम्णेऽग्ने मर्ताँ अमर्त्यस्त्वं नः.. (२१)
हे दीप्त एवं कार्यकुशल अग्नि! तुम अपने कौशल द्वारा हमें पश्चिम, पूर्व, दक्षिण एवं
उत्तर दिशाओं से बचाओ. हे जरामरणरहित एवं सखा अग्नि! मैं तुम्हारा मित्र हूं. तुम मुझे
जरा एवं मृत्यु को प्रदान न करो. (२१)
परि त्वाग्ने पुरं वयं विप्रं सहस्य धीमहि.
धृषद्वर्णं दिवेदिवे हन्तारं भङ्गुरावताम्.. (२२)
हे बल के पुत्र अग्नि! तुम पूरक मेधावी धर्षक एवं कुटिल राक्षसों का प्रतिदिन नाश
करने वाले हो. हम तुम्हारा ध्यान करते हैं. (२२)
विषेण भङ्गुरावतः प्रति ष्म रक्षसो दह.
अग्ने तिग्मेन शोचिषा तपुरग्राभिर्ऋष्टिभिः (२३)
हे अग्नि! तुम तोड़फोड़ करने वाले राक्षसों को अपने व्याप्त एवं तीखे तेज से जलाओ.
उन्हें ऐसे खड्गों से मारो, जिनका अगला भाग गरम है. (२३)
प्रत्यग्ने मिथुना दह यातुधाना किमीदिना.
सं त्वा शिशाभि जागृह्यदब्धं विप्र मन्मभिः.. (२४)
हे अग्नि! जो राक्षस पतिपत्नी के रूप में यह देखते हुए घूमते हैं कि कहां क्या हो रहा
है. उन्हें तुम जलाओ. हे अपराजेय एवं ज्ञानी अग्नि! मैं सुंदर स्तुतियों से तुम्हारी प्रशंसा करता
हूं. तुम जागो. (२४)
प्रत्यग्ने हरसा हरः शृणीहि विश्वतः प्रति.
यातुधानस्य रक्षसो बलं वि रुज वीर्यम्.. (२५)
हे अग्नि! तुम अपने तेज से राक्षसों का तेज चारों ओर नष्ट कर दो. तुम राक्षसों के बल
और तेज को नष्ट करो. (२५)
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सूक्त—८८ देवता—अग्नि व सूर्य
हविष्पान्तमजरं स्वर्विदि दिविस्पृश्याहुतं जुष्टमग्नौ.
तस्य भर्मणे भुवनाय देवा धर्मणे कं स्वधया पप्रथन्त.. (१)
पीने योग्य, जरारहित एवं देवों का प्रिय सोमरसरूपी हव्य सूर्य को जानने वाले एवं
स्वर्गस्थ अग्नि को होम किया जाता है. देवगण सोम उत्पादन पूर्ति और धारण के लिए
सुखकर अग्नि को अन्न से बढ़ाते हैं. (१)
गीर्णं भुवनं तमसापगूळ्हमाविः स्वरभवज्जाते अग्नौ.
तस्य देवाः पृथिवी द्यौरुतापोऽरणयन्नोषधीः सख्ये अस्य.. (२)
अंधकार द्वारा निगला हुआ एवं अंधकार में छिपा हुआ संसार अग्नि के उत्पन्न होने पर
प्रकट होता है. उस अग्नि के मैत्रीपूर्ण कार्य से देवगण पृथ्वी स्वर्ग, जल एवं ओषधियां—सब
प्रसन्न होते हैं. (२)
देवेभिर्न्विषतो यज्ञियेभिरग्निं स्तोषायजरं बृहन्तम्.
यो भानुना पृथिवीं द्यामुतेमामाततान रोदसी अन्तरिक्षम्.. (३)
यज्ञ के योग्य देवों द्वारा शीघ्र प्रेरित मैं जरारहित एवं विशाल अग्नि की स्तुति करता हूं.
अग्नि ने अपने तेज से धरती, द्यौ, इनके मध्यभाग एवं आकाश को विस्तृत किया है. (३)
यो होतासीत्प्रथमो देवजुष्टो यं समाञ्जन्त्राज्येना वृणानाः.
स पतत्रीत्वरं स्था जगद्यच्छ्वात्रमग्निरकृणोज्जातवेदाः.. (४)
जो अग्नि देवों द्वारा सेवित होकर पहले होता बने थे एवं वर के अभिलाषी यजमान
जिन्हें घी से सींचते हैं, उन अग्नि ने अपने तेज से पक्षियों गतिशील सांप आदि तथा
स्थावरजंगम रूप संसार को शीघ्र ही उत्पन्न किया. (४)
यज्जातवेदो भुवनस्य मूर्धन्नतिष्ठो अग्ने सह रोचनेन.
तं त्वाहेम मतिभिर्गीर्भिरुक्थैः स यज्ञियो अभवो रोदसिप्राः.. (५)
हे जातवेद अग्नि! तुम आदित्य के साथ तीनों लोकों के सिर पर स्थित होते हो. हम
तुम्हें अर्चनीय स्तुतियों एवं मंत्रों द्वारा प्राप्त करते हैं. तुम यज्ञ के पात्र एवं द्यावा-पृथिवी को
पूर्ण करने वाले हो. (५)
मूर्धा भुवो भवति नक्तमग्निस्ततः सूर्यो जायते प्रातरुद्यन्.
मायामू तु यज्ञियानामेतामपो यत्तूर्णिश्चरति प्रजानन्.. (६)
अग्नि रात के समय सभी प्राणियों के मूर्धारूप बन जाते हैं एवं प्रातः उदय होते हुए सूर्य
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बन जाते हैं. अग्नि को यज्ञ-संपादक देवों की बुद्धि कहा जाता है एवं वे सबको जानते हुए
सब स्थानों में जल्दी-जल्दी चलते हैं. (६)
दृशेन्थो यो महिना समिद्धोऽरोचत दिवियोनिर्विभावा.
तस्मिन्नग्नौ सूक्तवाकेन देवा हविर्विश्व आजुहुवुस्तनूपाः.. (७)
जो अग्नि अपने महत्त्व के कारण दर्शनीय, प्रज्वलित स्वर्ग में स्थित एवं तेजस्वी बनकर
दीप्त होते हैं, उन्हीं अग्नि के अंगरक्षक देवों ने स्तुतियां पढ़ते हुए हव्य डाला. (७)
सूक्तवाकं प्रथममादिदग्निमादिद्धविर्जनयन्त देवाः.
स एषां यज्ञो अभवत्तनूपास्तं द्यौर्वेद तं पृथिवी तमापः.. (८)
देवों ने सबसे पहले मन से सूक्त वचन का चिंतन किया. इसके पश्चात् हव्य को उत्पन्न
किया. वे अग्नि देवों के यज्ञपात्र एवं शरीररक्षक बने. उन अग्नि को द्युलोक, पृथ्वी और
अंतरिक्ष जानते हैं. (८)
यं देवासोऽजनयन्ताग्निं यस्मिन्नाजुहुवुर्भुवनानि विश्वा.
सो अर्चिषा पृथिवीं द्यामृतेमामृजूयमानो अतपन्महित्वा.. (९)
जिस अग्नि को देवों ने उत्पन्न किया, जिस अग्नि में विश्व की सब वस्तुओं का हवन
किया जाता है. वह ही सरल गति वाले अग्नि अपनी विशाल ज्वाला से इस धरती और स्वर्ग
को तृप्त करते हैं. (९)
स्तोमेन हि दिवि देवासो अग्निमजीजनञ्छक्तिभी रोदसिप्राम्.
तमू अकृण्वन् त्रेधा भुवे कं स ओषधीः पचति विश्वरूपाः.. (१०)
देवों ने स्वर्ग में केवल स्तुतियों द्वारा द्यावा-पृथिवी को पूर्ण करने वाले अग्नि को अपनी
शक्ति से उत्पन्न किया. उस सुखकारक अग्नि को देवों ने तीन भागों में विभक्त किया. वही
अग्नि समस्त ओषधियों को पकाती है. (१०)
यदेदेनमधुर्यज्ञियासो दिवि देवाः सूर्यमादितेयम्.
यदा चरिष्णू मिथुनावभूतामादित्प्रापश्यन्भुवनानि विश्वा.. (११)
जिस समय यज्ञ के पात्र देवों ने इस अग्नि और अदितिपुत्र देवों को स्वर्ग में स्थापित
किया, वे उस समय जोड़े से विचरण करने वाले बन गए तभी सब प्राणियों ने उन्हें देखा.
(११)
विश्वस्मा अग्निं भुवनाय देवा वैश्वानरं केतुमह्नामकृण्वन्.
आ यस्ततानोषसो विभातीरपो ऊर्णोति तमो अर्चिषा यन्.. (१२)
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देवों ने सारे संसार के कल्याण के लिए वैश्वानर अग्नि को दिनों का ज्ञान कराने वाला
बनाया है. अग्नि विशेष-प्रकाश वाली उषाओं को विस्तृत करते हैं एवं जाते समय सारे संसार
को अंधकार के समूह में डुबा देते हैं. (१२)
वैश्वानरं कवयो यज्ञियासोऽग्निं देवा अजनयन्नजुर्गम्.
नक्षत्रं प्रत्नममिनच्चरिष्णु यक्षस्याध्यक्षं तविषं बृहन्तम्.. (१३)
विद्वान् एवं यज्ञपात्र देवों ने जरारहित सूर्यरूपी वैश्वानर अग्नि को उत्पन्न किया. अग्नि ने
प्राचीन, घूमने वाले, विस्तृत एवं महान् नक्षत्रों को देवों के सामने ही तेजहीन कर दिया. (१३)
वैश्वानरं विश्वहा दीदिवांसं मन्त्रैरग्निं कविमच्छा वदाम:.
यो महिम्ना परिबभूवोर्वी उतावस्तादुत देवः परस्तात्.. (१४)
सर्वदा प्रकाशमय, पैनी मेधा वाले और संसार का उपकार करने वाले अग्नि की हम
स्तुति करते हैं. वे वैश्वानर अग्नि अपनी महिमा से द्यावा-पृथिवी को भी तिरस्कृत कर
ऊपरनीचे तपते हैं. (१४)
द्वे स्रुती अशृणवं पितॄणामहं देवानामुत मर्त्यानाम्.
ताभ्यामिदं विश्वमेजत्समेति यदन्तरा पितरं मातरं च.. (१५)
मैंने पितरों, देवों एवं मानवों के दो मार्ग सुने हैं. आगे बढ़ता हुआ यह संसार उन्हीं पर
जाता है. माता और पिता से जन्मा हुआ इन्हीं से जाता है. (१५)
द्वे समीची बिभृतश्चरन्तं शीर्षतो जातं मनसा विमृष्टम्.
स प्रत्यङ्ङ्विश्वा भुवनानि तस्थावप्रयुच्छन्तरणिर्भ्राजमानः.. (१६)
परस्पर संगत द्यावा-पृथिवी में विचरण करते हुए सबसे शीर्षरूप आदित्य से उत्पन्न व
स्तुतियों से संस्कृत अग्नि को धारण करने वाले, प्रभावहीन, शीघ्रता करने वाले एवं तेजस्वी
वैश्वानर सभी लोकों के सम्मुख ठहरते हैं. (१६)
यत्रा वदेते अवरः परश्च यज्ञन्योः कतरो नौ वि वेद.
आ शेकुरित्सधमादं सखायो नक्षन्त यज्ञं क इदं वि वोचत्.. (१७)
जिस समय पार्थिव अग्नि और वायु परस्पर विवाद करते हैं कि हम यज्ञकर्म के नेताओं
में यज्ञ को कौन अधिक जानता है, उस समय मित्र ऋत्विज् यज्ञ करते हैं. वे यह निर्णय नहीं
कर पाते कि कौन ठीक है? (१७)
कत्यग्नयः कति सूर्यासः कत्युषासः कत्यु स्विदापः.
नोपस्पिजं वः पितरो वदामि पृच्छामि वः कवयो विद्मने कम्.. (१८)
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हे विद्वान् पितरो! मैं तुमसे स्पर्धा वाली बात नहीं कर रहा हूं. मैं केवल जानने के लिए
पूछ रहा हूं कि अग्नियां, सूर्य उषाएं एवं जल कितने हैं. (१८)
यावन्मात्रमुषसो न प्रतीकं सुपर्ण्यो३वसते मातरिश्वः.
तावद्दधात्युप यज्ञमायन्ब्राह्मणो होतुरवरो निषीदन्.. (१९)
हे वायु! जब तक रात्रियां उषा के मुख से परदा नहीं हटा देतीं, तब तक नीचे स्थित
होता और स्तोता पार्थिव अग्नि यज्ञ के समीप आकर बैठ जाते हैं. (१९)
सूक्त—८९ देवता—इंद्र
इन्द्रं स्तवा नृतमं यस्य मह्ना विबबाधे रोचना वि ज्मो अन्तान्.
आ यः पप्रौ चर्षणीधृद्वरोभिः प्र सिन्धुभ्यो रिरिचानो महित्वा.. (१)
हे स्तोता! नेताओं में श्रेष्ठ इंद्र की स्तुति करो. उनके महत्त्व से दूसरों के तेज हार जाते
हैं. उनकी महिमा सारी धरती को पराभूत करती है. वे मानव प्रजा को धारण करते हैं. उनका
महत्त्व सागर से भी बड़ा है तथा वे अपने तेज से द्यावा-पृथिवी को पूर्ण करते हैं. (१)
स सूर्यः पर्युरू वरांस्येन्द्रो ववृत्याद्रथ्येव चक्रा.
अतिष्ठन्तमपस्यं१न सर्गं कृष्णा तमांसि त्विष्या जघान.. (२)
सारथि जिस प्रकार रथ का पहिया घुमाता है, उसी प्रकार शोभन वीर्य वाले इंद्र अपने
अधिक तेज को चारों ओर घुमाते हैं. इंद्र अपने तेज से शीघ्र गति वाले एवं कार्यकुशल विश्व
के समान अंधकार को नष्ट करते हैं. (२)
समानमस्मा अनपावृहर्चं क्ष्मया दिवो असमं ब्रह्म नव्यम्.
वि यः पृष्ठेव जनिमान्यर्य इन्द्रश्चिकाय न सखायमीषे.. (३)
हे स्तोता! तुम मेरे साथ उन इंद्र के लिए निकृष्टता रहित द्यावा-पृथिवी में अद्वितीय एवं
नए स्तोत्र को बोलो जो यज्ञों में उत्पन्न स्तोत्रों को सुनने के लिए उतने ही इच्छुक हैं, जितने
कि शत्रुओं को देखने के लिए हैं. वे अपने मित्रों का बुरा नहीं चाहते. (३)
इन्द्राय गिरो अनिशितसर्गा अपः प्रेरयं सगरस्य बुध्नात्.
यो अक्षेणेव चक्रिया शचीभिर्विष्वक्तस्तम्भ पृथिवीमृत द्याम्.. (४)
मैंने इंद्र के लिए सर्वोच्च स्तुतियां की हैं. इन स्तुतियों द्वारा मैंने अंतरिक्ष के जल को
बरसने के लिए प्रेरित किया है. वे इंद्र अपने कर्मों द्वारा द्यावा और पृथ्वी को इस प्रकार धारण
करते हैं, जिस प्रकार धुरा पहियों को धारण करता है. (४)
आपान्तमन्युस्तृपलप्रभर्मा धुनिः शिमीवाञ्छुरुमाँ ऋजीषी.

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सोमो विश्वान्यतसा वनानि नार्वागिन्द्रं प्रतिमानानि देभुः.. (५)
पीने के पश्चात् ओज उत्पन्न करने वाले पत्थरों द्वारा शीघ्रता से कूटे गए शत्रुओं को
कंपाने वाले कर्मठ आयुधधारी एवं गतिशील सोम सभी वनों को बढ़ाते हैं. ये वन न तो इंद्र
की समानता कर सकते हैं, न उन्हें लघु बना सकते हैं. (५)
न यस्य द्यावापृथिवी न धन्व नान्तरिक्षं नाद्रयः सोमो अक्षाः.
यदस्य मन्युरधिनीयमानः शृणाति वीळु रुजति स्थिराणि.. (६)
द्यावा-पृथिवी, उदक, अंतरिक्ष एवं पर्वत जिन इंद्र की समानता नहीं कर सकते, उन्हीं के
लिए सोमरस निचोड़ा जाता है. इंद्र का क्रोध जब शत्रुओं पर होता है, उस समय ये
दृढ़तापूर्वक शत्रुओं को मारते हैं एवं उनके स्थिर पदार्थों को भी तोड़ डालते हैं. (६)
जघान वृत्रं स्वधितिर्वनेव रुरोज पुरो अरदन्न सिन्धून्.
बिभेद गिरिं नवमिन्न कुम्भमा गा इन्द्रो अकृणुत स्वयुग्भिः.. (७)
फरसा जिस प्रकार वृक्षों को काटता है, उसी प्रकार इंद्र शत्रुओं को मारते हैं. इंद्र ने
शत्रुनगरियों को तोड़ा, वर्षा के जल से नदियों को आकार दिया व पहाड़ों को कच्चे घड़े के
समान फोड़ा. इंद्र ने अपने साथी मरुतों के साथ जल को हमारे सामने प्रस्तुत किया. (७)
त्वं ह त्यदृणया इन्द्र धीरोऽसिर्न पर्व वृजिना शृणासि.
प्र ये मित्रस्य वरुणस्य धाम युजं न चना मिनन्ति मित्रम्.. (८)
हे धीर इंद्र! तुम स्तोताओं को ऋण से छुड़ाते हो. जिस प्रकार तलवार पशुओं की
बोटियां काटती है, उसी प्रकार तुम स्तोताओं के पापों को नष्ट करते हो. जो मूर्ख लोग वरुण
और मित्र को धारण करने वाले एवं मित्रतुल्य यज्ञकर्म का लोप करते हैं, उन्हें भी इंद्र नष्ट
करते हैं. (८)
प्र ये मित्रं प्रार्यमणं दुरेवाः प्र सङ्गिरः प्र वरुणं मिनन्ति.
न्य१मित्रेषु वधमिन्द्र तुम्रं वृषन्व्ऋषणमरुषं शिशीहि.. (९)
हे अभिलाषापूरक इंद्र! जो बुरे लोग मित्र, अर्यमा, मरुद्गण एवं वरुण से द्वेष करते हैं,
उन शत्रुओं के लिए तुम अपना गतिशील, कामवर्षक एवं दीप्तिशाली वज्र तेज करो. (९)
इन्द्रो दिव इन्द्र ईशे पृथिव्या इन्द्रो अपामिन्द्र इत्पर्वतानाम्.
इन्द्रो वृधामिन्द्र इन्मेधिराणामिन्द्रः क्षेमे योगे हव्य इन्द्रः.. (१०)
इंद्र स्वर्ग, धरती, जल, पर्वतों, वृद्धों एवं ज्ञानियों के स्वामी हैं. योग और क्षेम के लिए इंद्र
को ही बुलाया जाता है. (१०)

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प्राक्तुभ्य इन्द्रः प्र वृधो अहभ्यः प्रान्तरिक्षात्प्र समुद्रस्य धासेः.
प्र वातस्य प्रथसः प्र ज्मो अन्तात्प्र सिन्धुभ्यो रिरिचे प्र क्षितिभ्यः.. (११)
इंद्र रात, दिन, अंतरिक्ष, जल धारण करने वाले समुद्र विस्तृत वायु, धरती की सीमांत
नदियों एवं मानवों से बढ़कर हैं. (११)
प्र शोशुचत्या उषसो न केतुरसिन्वा ते वर्ततामिन्द्र हेतिः.
अश्मेव विध्य दिव आ सृजानस्तपिष्ठेन हेषसा द्रोघमित्रान्.. (१२)
हे इंद्र! तुम्हारा न टूटने वाला आयुध वज्र ज्योति वाली उषा की किरणों के साथ शत्रुओं
पर गिरे. जैसे आकाश से गिरने वाली बिजली वृक्षों को नष्ट करती है, उसी प्रकार तुम द्रोह
करने वाले अमित्रों को अत्यंत तप्त और गर्जन करने वाले आयुधों से मारो. (१२)
अन्वह मासा अन्विद्वनान्यन्वोषधीरनु पर्वतासः.
अन्विन्द्रं रोदसी वावशाने अन्वापो अजिहत जायमानम्.. (१३)
जैसे ही इंद्र का जन्म हुआ, वैसे ही मास, वन, ओषधियां, पर्वत, एक-दूसरे को चाहने
वाले द्यावा-पृथिवी एवं जल उनके पीछे चलने लगे. (१३)
कर्हि स्वित्सा त इन्द्र चेत्यासदघस्य यद्विनदो रक्ष एषत्.
मित्रक्रुवो यच्छसने न गावः पृथिव्या आपृगमुया शयन्ते.. (१४)
हे इंद्र! तुमने जिस तलवार को फेंककर पापी राक्षसों का छेदन किया था, वह कब
फेंकी जाएगी? जिस प्रकार वधशाला में गाएं कटती हैं, उसी प्रकार तुम्हारे इस आयुध से चोट
खाकर मित्रों से द्वेष करने वाले राक्षस धरती पर गिरते हैं और सो जाते हैं. (१४)
शत्रूयन्तो अभि ये नस्ततस्रे महि व्राधन्त ओगणास इन्द्र.
अन्धेनामित्रस्तमसा सचन्तां सुज्योतिषो अक्तवस्ताँ अभि ष्युः.. (१५)
हे इंद्र! जिन राक्षसों ने हमारे प्रति शत्रुभाव रखकर हमें बाधा पहुंचाई है एवं एकत्र
होकर जिन्होंने हमें घेर लिया है, वे गहरे अंधकार में डूब जावें. उनके लिए ज्योति वाली रात
भी अंधेरी हो जाए. (१५)
पुरूणि हि त्वा सवना जनानां ब्रह्माणि मन्दन्गृणतामृषीणाम्.
इमामाघोषन्नवसा सहूतिं तिरो विश्वाँ अर्चतो याह्यर्वाङ्.. (१६)
हे इंद्र! यजमानों के बहुत से यज्ञ एवं स्तुति करते हुए ऋषियों की स्तुतियां तुम्हें प्रसन्न
करती हैं. तुम इस स्तुति को शोभायुक्त बताते हुए अन्य सब स्तुतिकर्त्ताओं का तिरस्कार करो
एवं रक्षासाधनों के साथ मेरे सामने स्थित होओ. (१६)
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एवा ते वयमिन्द्र भुञ्जतीनां विद्याम सुमतीनां नवानाम्.
विद्याम वस्तोरवसा गृणन्तो विश्वामित्रा उत त इन्द्र नूनम्.. (१७)
हे इंद्र! हम रक्षा करने वाले एवं तुमसे संबंधित नए-नए स्तोत्र प्राप्त करें. हम विश्वामित्र
की संतान अपनी रक्षा के लिए तुम्हारी स्तुति करते हुए नाना प्रकार की संपत्ति प्राप्त करें.
(१७)
शुनं हुवेम मघवानमिन्द्रमस्मिन्भरे नृतमं वाजसातौ.
शृण्वन्तमुग्रमूतये समत्सु घ्नन्तं वृत्राणि संज्जितं धनानाम्.. (१८)
हम इस युद्ध में विशाल शरीर वाले, संपत्तिशाली, पुकार सुनने वाले, उग्र संग्रामों में
शत्रुओं को मारने वाले एवं शत्रुजनों को भली प्रकार जीतने वाले इंद्र को अन्नप्राप्ति और रक्षा
के लिए बुलाते हैं. (१८)
सूक्त—९० देवता—पुरुष
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्.
स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्.. (१)
विराट् पुरुष के हजार शीर्ष, हजार आंखें और हजार चरण हैं. वह धरती को चारों ओर
से घेरकर उससे दस अंगुल अधिक स्थित हैं. (१)
पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम्. उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति.. (२)
जो कुछ हो चुका है अथवा होने वाला है, वह सब विराट् पुरुष ही है. वह अमृत का
स्वामी है, क्योंकि वह कारण अवस्था छोड़कर जगत् अवस्था को धारण करता है. इस प्रकार
प्राणी उसको भोगते हैं. (२)
एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पूरुषः.
पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि.. (३)
यह सारा ब्रह्मांड विराट् पुरुष की महिमा है. वे स्वयं इससे बड़े हैं. सभी प्राणी उनके
चौथाई अंश हैं. इनके तीन मरणरहित अंश दिव्यलोक में रहते हैं. (३)
त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत्पुनः.
ततो विष्वङ् व्यक्रामत्साशनानशने अभि.. (४)
तीन चरणों वाले विराट् पुरुष ऊपर उठे. उनका केवल एक चरण यहां स्थित रहा. इसके
पश्चात् वे भोजन करने वाली एवं भोजन न करने वाली वस्तुओं के रूप में व्याप्त हुए. (४)
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तस्माद्विराळजायत विराजो अधिपूरुषः. स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः..
(५)
उस आदि पुरुष से ब्रह्मांडरूपी विराट् उत्पन्न हुआ. ब्रह्मांडरूपी विराट् से अनेक पुरुष
उत्पन्न हुए. उत्पन्न होने के पश्चात् वह ब्रह्मांड से बड़ा हुआ. इसके बाद उसने भूमि बनाई और
भूमि से जीवों का शरीर बनाया. (५)
यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत.
वसन्तो अस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः.. (६)
जब पुरुषरूप काल्पनिक हवि से देवों ने यज्ञ का विस्तार किया, उस समय वसंत ऋतु
को घी, ग्रीष्म को काष्ठ तथा शरद ऋतु को हवि बनाया. (६)
तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन्पुरुषं जातमग्रतः. तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये.. (७)
सारी सृष्टि से पहले उत्पन्न पुरुष को यज्ञसाधन के रूप में बलिपशु बनाकर देवों ने
काल्पनिक यज्ञ किया. इस साधन में देवों, साध्यों और ऋषियों ने यज्ञ किया. (७)
तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम्.
पशून्ताँश्चक्रे वायव्यानारण्यान् ग्राम्याश्च ये.. (८)
जिस काल्पनिक यज्ञ में उस सर्वात्मक पुरुष का हवन किया जाता है, उससे दही से
मिला हुआ घी उत्पन्न हुआ. उसीसे वायु देव से संबंधित जंगली और ग्रामीण पशु भी उत्पन्न
हुए. (८)
तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे. छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत..
(९)
उस सर्वात्मक पुरुष के काल्पनिक होम वाले यज्ञ से ऋक् और साम उत्पन्न हुए, उसीसे
छंद उत्पन्न हुए और यजु की उत्पत्ति हुई. (९)
तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः.
गावो ह जज्ञिरे तस्मात् तमस्माज्जाता अजावयः.. (१०)
उसी यज्ञ से घोड़े उत्पन्न हुए, जिनके मुंह में ऊपर-नीचे दोनों ओर दांत थे. उसीसे गाएं,
बकरियां और भेड़ें उत्पन्न हुईं. (१०)
यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन्.
मुखं किमस्य कौ बाहू का ऊरू पादा उच्येते.. (११)
प्रजापति के प्राणरूप देवों ने जब विराट् पुरुष को संकल्प से उत्पन्न किया, तब उन्हें
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उत्तर वेदी पर स्थित होकर अन्न की अभिलाषा से समस्त हवि के होता बनते हैं. वरण करने
योग्य, व्यापक, दीप्तिशाली एवं शोभन अग्नि मित्र के समान व्यवहार करते हैं. (१)
स दर्शतश्रीरतिथिर्गृहेगृहे वनेवने शिश्रिये तक्ववीरिव.
जनञ्जनं जन्यो नाति मन्यते विश आ क्षेति विश्यो३ विशंविशम्.. (२)
दर्शनीय शोभा वाले, अतिथि एवं मानहितैषी अग्नि यजमानों के घरों और वनों में
निवास करते हैं. वे गतिशील के समान किसी व्यक्ति को नहीं छोड़ते. प्रजाहितकारी अग्नि
मानवों के पास जाते हैं एवं सभी प्रजाओं का आश्रय लेते हैं. (२)
सुदक्षो दक्षैः क्रतुनासि सुक्रतुरग्ने कविः काव्येनासि विश्ववित्.
वसुर्वसूनां क्षयसि त्वमेक इद् द्यावा च यानि पृथिवी च पुष्यतः.. (३)
हे सर्वज्ञ अग्नि! तुम शक्ति द्वारा सर्वश्रेष्ठ शक्तिशाली, कर्म के द्वारा शोभन कर्म वाले एवं
बुद्धि के कारण बुद्धिमान् हो. तुम अकेले ही सब धर्मों का आश्रय बनते हो. द्यावा-पृथिवी
जिन धनों का संवर्धन करते हैं, तुम उन्हें धारण करते हो. (३)
प्रजानन्नग्ने तव योनिमृत्वियमिळायास्पदे घृतवन्तमासदः.
आ ते चिकित्र उषासामिवेतयोऽरेपसः सूर्यस्येव रश्मयः.. (४)
हे अग्नि! तुम यज्ञवेदी के ऊपर अपना घृतयुक्त निवासस्थान बना हुआ जानकर बैठो.
तुम्हारी ज्वालाएं उषा की किरणें एवं सूर्य की ज्वालाओं के समान विमल हैं. (४)
तव श्रियो वर्ष्यस्येव विद्युतश्चित्राश्चित्रा उषासां न केतवः.
यदोषधीरभिसृष्टो वनानि च परि स्वयं चिनुषे अन्नमास्ये.. (५)
हे अग्नि! तुम्हारी किरणरूपी विभूतियां बरसने वाले मेघ की बिजली अथवा उषा की
किरणों के समान जान पड़ती हैं. उस समय तुम ओषधियों और वनों को अपने मुख से
भक्षण करने के लिए स्वयं उन्मुक्त जान पड़ते हो. (५)
तमोषधीर्दधिरे गर्भमृत्वियं तमापो अग्निं जनयन्त मातरः.
तमित्समानं वनिनश्च वीरुधोऽन्तर्वतीश्च सुवते च विश्वहा.. (६)
ओषधियां उस अग्नि को ऋतु के अनुसार गर्भ के रूप में धारण करती हैं. जलरूपी
माताएं अग्नि को जन्म देती हैं. वन की लताएं एवं वृक्ष सदा गर्भयुक्त होकर समान रूप से
जन्म देते हैं. (६)
वातोपधूत इषितो वशाँ अनु तृषु यदन्ना वेविषद्वितिष्ठसे.
आ ते यतन्ते रथ्यो३ यथा पृथक् शर्धांस्यग्ने अजराणि धक्षतः.. (७)
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हे अग्नि! जब तुम वायु द्वारा कंपित वनस्पतियों के वशीभूत होकर एवं वनस्पतियों को
व्याप्त करके इधर गति उत्पन्न करते हो, उस समय काष्ठ दहन के कारण उत्पन्न तुम्हारी
ज्वालाएं रथियों के समान अपना तेज चालित करती हैं. (७)
मेधाकारं विदथस्य प्रसाधनमग्निं होतारं परिभूतमं मतिम्.
तमिदर्भे हविष्या समानमित्तमिन्महे वृणते नान्यं त्वत्.. (८)
मैं बुद्धि के जनक, यज्ञ को सुशोभित करने वाले, देवों के आह्वानकर्त्ता, शत्रु-
पराभवकारी एवं माननीय अग्नि का वरण करता हूं. उस समय अग्नि के अतिरिक्त कोई भी
यह निर्णय नहीं कर पाता कि अग्नि को थोड़ा हवि दिया जाएगा या अधिक. (८)
त्वामिदत्र वृणते त्वायवो होतारमग्ने विदथेषु वेधस:.
यद्देवयन्तो दधति प्रयांसि ते हविष्मन्तो मनवो वृक्तबर्हिषः.. (९)
हे अग्नि! तुम्हारी अभिलाषा करने वाले ऋत्विज् इस संसार में यज्ञों में तुम्हीं को देवों
का आह्वानकर्त्ता वरण करते हैं. देवयजन करने के इच्छुक कुश बिछाने वाले एवं हव्ययुक्त
मनुष्य तुम्हारे लिए यज्ञीय द्रव्य धारण करते हैं. (९)
तवाग्ने होत्रं तव पोत्रमृत्वियं तव नेष्ट्रं त्वमग्निदृतायतः
तव प्रशास्त्रं त्वमध्वरीयसि ब्रह्मा चासि गृहपतिश्च नो दमे.. (१०)
हे अग्नि! ऋतु के अनुकूल तुम ही होता और पोता का कर्म करते हो. यज्ञ करने वाले के
लिए तुम्हीं नेष्टा एवं अग्नि हो. तुम ही प्रशास्ता, अध्वर्यु, ब्रह्मा एवं हमारे घर में गृहपति हो.
(१०)
यस्तुभ्यमग्ने अमृताय मर्त्यः समिधा दाशदूत वा हविष्कृति.
तस्य होता भवसि यासि दूत्य१मुप ब्रूषे यजस्यध्वरीयसि.. (११)
हे मरणरहित अग्नि! जो मनुष्य तुम्हारे लिए समिधाएं देना चाहता है अथवा यज्ञ में हवि
देता है, तुम उसके होता बनते हो, दूत बनते हो, देवों को निमंत्रण देते हो एवं यजमान बनकर
देवों को हवि देते हो. (११)
इमा अस्मै मतयो वाचो अस्मदाँ ऋचो गिरः सुष्टुतयः समग्मत.
वसूयवो वसवे जातवेदसे वृद्धासु चिद्वर्धनो यासु चाकनत्.. (१२)
अग्नि के लिए ही यह चिंतन, स्तुतियां और वेदमंत्र किए जाते हैं. हमारे लिए धन की
अभिलाषा करने वाली शोभन स्तुतियां ऋचारूपी वाणी से निकलकर अग्नि से मिलती हैं. इन
स्तुतियों के बढ़ने पर अग्नि संतुष्ट होकर धन की वृद्धि करते हैं. (१२)
इमां प्रत्नाय सुष्टुतिं नवीयसीं वोचेयमस्मा उशते शृणोतु न:.
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भूया अन्तरा हृद्यस्य निस्पृशे जायेव पत्य उशती सुवासाः.. (१३)
प्राचीन एवं स्तुतियों की कामना करने वाले इस अग्नि के लिए मैं अत्यंत नवीन एवं
शोभन स्तुतियां बोलता हूं. अग्नि उन्हें सुनें. जिस प्रकार पति की कामना करने वाली एवं
शोभन वस्त्रों से युक्त नारी पति के हृदय से अपना शरीर मिलाती है, उसी प्रकार मैं अग्नि के
मध्य भाग का स्पर्श करता हूं. (१३)
यस्मिन्नश्वास ऋषभभास उक्षणो वशा मेषा अवसृष्टास आहुताः.
कीलालपे सोमपृष्ठाय वेधसे हृदा मतिं जनये चारुमग्नये.. (१४)
यज्ञ के समय जिस अग्नि में घोड़ों, बैलों, बिजारों, स्वभाव से बधिया मेढ़ों की आहुति
दी जाती है, उस जलपान करने वाले, सोमयुक्त पीठ वाले व यज्ञविधाता अग्नि के लिए मैं
हृदय से शोभन स्तुति बोलता हूं. (१४)
अहाव्यग्ने हविरास्ये ते सुचीव घृतं चम्वीव सोमः.
वाजसनिं रयिमस्मे सुवीरं प्रशस्तं धेहि यशसं बृहन्तम्.. (१५)
हे अग्नि! मैं सुच में घृत एवं चमस में सोम के समान तुम्हारे मुख में हवि डालता हूं. तुम
मुझे अन्न, धन, उत्तम यश सहित शोभन पुत्र दो. (१५)
सूक्त—९२ देवता—नाना देव
यज्ञस्य वो रथ्यं विश्पतिं विशां होतारमक्तोरतिथिं विभावसुम्.
शोचञ्छुष्कासु हरिणीषु जर्भुरद्वृषा केतुर्यजतो द्यामशायत.. (१)
हे देवो! तुम यज्ञ के नेता, मानव प्रजाओं के पालक, देवों का आह्वान करने वाले, रात
के अतिथि एवं विविध दीप्ति वाले अग्नि की सेवा करो. सूखी लकड़ियों को जलाने एवं हरी
लकड़ियों का भक्षण करने वाले अभिलाषापूरक यज्ञ के ज्ञापक एवं यजनीय अग्नि स्वर्ग में
सोते हैं. (१)
इममञ्जस्पामुभये अकृण्वत धर्माणमग्निं विदथस्य साधनम्.
अक्तुं न यह्वमुषसः पुरोहितं तनूनपातमरुषस्य निंसते.. (२)
देव और मानव दोनों ने शक्ति द्वारा रक्षण करने वाले व सबके धारक अग्नि को यज्ञ का
साधन बनाया. वायु के पुत्र महान् और पुरोहित अग्नि को उषाएं सूर्य के समान चूमती हैं. (२)
बळस्य नीथा वि पणेश्च मन्महे वया अस्य प्रहुता आसुरत्तवे.
यदा घोरासो अमृतत्वमाशतादिज्जनस्य दैव्यस्य चर्किरन्.. (३)
स्तुतियोग्य अग्नि के द्वारा बताए हुए ज्ञानों को हम सत्य मानते हैं. हमारी अन्न की
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आहुतियां इस अग्नि के भक्षण के लिए हों. जब अग्नि की भयानक ज्वालाएं अमरता प्राप्त
करती हैं, उसी समय हमारे ऋत्विज् उन्हें हव्य देते हैं. (३)
ऋतस्य हि प्रसितिर्द्यौरुरु व्यचो नमो मह्य१रमतिः पनीयसी.
इन्द्रो मित्रो वरुणः सं चिकितिरेऽथो भगः सविता पूतदक्षसः.. (४)
विस्तृत द्यौ, विस्तीर्ण वचन, फैला हुआ अंतरिक्ष, विस्तारयुक्त द्यौ तथा स्तुतियोग्य एवं
अनंत धरती यज्ञ की अग्नि को नमस्कार करते हैं. पवित्र शक्ति वाले इंद्र, मित्र, वरुण, सविता
एवं भगदेव उत्पन्न होते हैं. (४)
प्र रुद्रेण ययिना यन्ति सिन्धवस्तिरो महीमरमतिं दधन्विरे.
येभिः परिज्मा परियन्नुरु ज्रयो वि रोरुवज्जठरे विश्वमुक्षते.. (५)
बहने वाली नदियां गमनशील रुद्र की सहायता से बहती हैं एवं महती धरती को ढक
देती हैं. सब ओर जाने वाले इंद्र सब ओर गति करते हुए मरुतों की सहायता से अत्यंत वेग
धारण करते हैं एवं महान् शब्द करते हुए संसार को सींचते हैं. (५)
क्राणा रुद्रा मरुतो विश्वकृष्टयो दिवः श्येनासो असुरस्य नीळयः.
तेभिश्चष्टे वरुणो मित्रो अर्यमेन्द्रो देवेभिरर्वशोभिरर्वशः.. (६)
मेघ के आवास, आकाश के बाज तुल्य एवं विश्व को खींचने वाले रुद्रपुत्र मरुत् अपने
अधिकार के कार्य करते हैं. इन अश्वारूढ़ देवों के साथ अश्व वाले इंद्र, वरुण, मित्र और
अर्यमा इन सबको देखा है. (६)
इन्द्रे भुजं शशमानास आशत सूरो दृशीके वृषणश्च पौंस्ये.
प्र ये न्वस्यार्हणा ततक्षिरे युजं वज्रं नृषदनेषु कारवः.. (७)
स्तोता इंद्र से पालन, सूर्य से देखने की शक्ति एवं अभिलाषापूरक इंद्र से पौरुष प्राप्त
करते हैं. जो स्तोता विशेषरूप से इंद्र की शीघ्र पूजा करते हैं, वे यज्ञों में इंद्र के वज्र को अपना
सहायक मानते हैं. (७)
सूरश्चिदा हरितो अस्य रीरमदिन्द्रादा कश्चिद्भयते तवीयसः.
भीमस्य वृष्णो जठरादभिश्वसो दिवेदिवे सहुरिः स्तन्रबाधितः.. (८)
सूर्य भी इंद्र की आज्ञा पालन करने के लिए घोड़ों को चलाते हैं एवं सबको प्रसन्न करते
हैं. सभी देव शक्तिशाली इंद्र से डरते हैं. भयानक जलवर्षक, प्रतिदिन सांस लेने वाले एवं
बाधारहित इंद्र अंतरिक्ष से सहनशील बनकर शब्द करते हैं. (८)
स्तोमं वो अद्य रुद्राय शिक्वसे क्षयद्वीराय नमसा दिदिष्टन.
येभिः शिवः स्ववाँ एवयावभिर्दिवः सिषक्ति स्वयशा निकामभिः.. (९)
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हे ऋत्विजो! जिन आने वाले मरुतों के साथ शक्तिशाली अपनी कीर्ति विस्तृत करने
वाले एवं सुखकारक ईश्वर द्युलोक से यजमानों की सेवा करते हैं, आज यज्ञ में उन्हीं निश्चित
अभिलाषा वाले मरुतों से युक्त, शत्रुनाशक व शरण देने योग्य रुद्र को नमस्कार के साथ स्तोत्र
बनाओ. (९)
ते हि प्रजाया अभरन्त वि श्रवो बृहस्पतिर्वृषभः सोमजामयः.
यज्ञैरथर्वा प्रथमो वि धारयद्देवा दक्षैर्भृगवः सं चिकित्रिरे.. (१०)
चूंकि अभिलाषापूरक बृहस्पति एवं सोम के बंधु देव वृष्टि करके प्रजा के लिए अन्न
बढ़ाते हैं, इसलिए उन प्रजाओं के मध्य अथर्वा ऋषि ने यज्ञ के द्वारा सबसे पहले देवों को
धारण किया. इसके बाद सभी शक्तिशाली देवों एवं भृगुवंशी ऋषियों ने जाकर यज्ञ को जाना.
(१०)
ते हि द्यावापृथिवी भूरिरेतसा नराशंसश्चतुरङ्गो यमोऽदितिः.
देवस्त्वष्टा द्रविणोदा ऋभुक्षणः प्र रोदसी मरुतो विष्णुरहिरे.. (११)
नराशंस नामक यज्ञ में स्तोताओं द्वारा अधिक जल वाली द्यावा-पृथिवी, यम, अदिति
धन देने वाले त्वष्टा, ऋभुगण, रुद्र की पत्नी, मरुद्गण एवं विष्णु चार अंगों वाली अग्नियों के
साथ पूजे जाते हैं. (११)
उत स्य न उशिजामुर्विया कविरहिः शृणोतु बुध्यो३ हवीमनि.
सूर्यामासा विचरन्ता दिविक्षिता धिया शमीनहुषी अस्य बोधतम्.. (१२)
बुद्धिमान् अहिर्बुध्न्य हम कामना करने वाले ऋत्विजों की विशाल स्तुति को यज्ञ में सुनें.
हे आकाश में निवास करने वाले एवं विचरण करने वाले सूर्य-चंद्र! तुम अपनी बुद्धि से इस
स्तोत्र को जानो. हे द्यावा-पृथिवी! तुम स्तुति को अपनी बुद्धि से जानो. (१२)
प्र नः पूषा चरथं विश्वदेव्योऽपां नपादवतु वायुरिष्टये.
आत्मानं वस्यो अभि वातमर्चत तदश्विना सुहवा यामनि श्रुतम्.. (१३)
पूषा एवं सभी देवों के हितैषी तथा जल के नाती वायु हमारे गतिशील प्राणियों की
यज्ञहेतु रक्षा करें. प्रशंसनीय अन्न पाने के लिए वायु की पूजा करो. हे शोभन आह्वान वाले
अश्विनीकुमारो! तुम यज्ञ में जाते समय यह स्तोत्र सुनो. (१३)
विशामासामभयानामधिक्षितं गीर्भिरु स्वयशसं गृणीमसि.
ग्नाभिर्विश्वाभिरदितिमन्वर्णवमक्तोर्युवानं नृमणा अधा पतिम्.. (१४)
हम इन प्रजाओं को अभय देने वाले, सबके मध्य निवास करने वाले व अपने यश को
स्वयं उत्पन्न करने वाले अग्नि की प्रशंसा स्तुतियों द्वारा करते हैं. हम देवपत्नियों के साथ
स्थिर अदिति को अपने तेज की निशा से मिलाने वाले चंद्र एवं मानवों पर अनुग्रह करने के
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अभिलाषी व सर्वपालक इंद्र की स्तुति करते हैं। (१४)
रेभदत्र जनुषा पूर्वो अङ्गिरा ग्रावाण ऊर्ध्वा अभि चक्षुरध्वरम्.
येभिर्विहाया अभवद्विचक्षणः पाथः सुमेकं स्वधितिर्व्रन्वति.. (१५)
प्राचीन अंगिरा ऋषि इस यज्ञ में देवों की स्तुति करते हैं. वे पत्थर ऊपर उठाकर
यज्ञसाधन सोम को देखते हैं. विशेषदृष्टि वाले इंद्र पत्थरों के शब्द से महान हुए हैं. इंद्र के वज्र
ने इस मार्ग में अन्नसाधन जल बरसाया. (१५)
सूक्त—९३ देवता—विश्वेदेव
महि द्यावापृथिवी भूतमूर्वी नारी यह्वी न रोदसी सदं नः.
तेभिर्नः पातं सह्यस एभिर्नः पातं शूषणि.. (१)
हे द्यावा-पृथिवी! तुम महान् बनो. तुम विस्तीर्ण बनो और नारी के समान हमारे घर में
स्थित होओ. तुम अपने रक्षासाधनों से हमें शत्रुओं से बचाओ. तुम अपने इन कार्यों से हमें
शत्रुओं से बचाओ. (१)
यज्ञेयज्ञे स मर्त्यो देवान्त्सपर्यति. यः सुम्नैर्दीर्घश्रुत्तम आविवासात्येनान्.. (२)
वह मनुष्यों के सभी यज्ञों में देवों की सेवा करता है एवं यजमान अनेक शास्त्रों को
सुनकर सुखकारी हव्यों से देवों की परिचर्या करता है. (२)
विश्वेषामिरज्यवो देवानां वार्महः. विश्वे हि विश्वमहसो विश्वे यज्ञेषु यज्ञियाः.. (३)
हे सकल भुवनों के स्वामी देवो! तुम्हारा वरणीय धन महान् है. तुम सब व्याप्त तेज वाले
एवं यज्ञों के अधिकारी हो. (३)
ते घा राजानो अमृतस्य मन्द्रा अर्यमा मित्रो वरुणः परिज्मा.
कद्रुद्रो नृणां स्तुतो मरुतः पूषणो भगः.. (४)
अर्यमा, मित्र, सर्वत्रगामी वरुण अन्य देवों के ऋत्विजों द्वारा प्रशंसित रुद्र, पूषा, मरुत्
एवं भग अमृत सदृश हवि के स्वामी, सबके स्तुतियोग्य एवं मानवों को सुख देने वाले हैं. (४)
उत नो नक्तमपां वृषण्वसू सूर्यामासा सदनाय सधन्या.
सचा यत्साद्येषामहिर्बुध्न्येषु बुध्यः.. (५)
हे अश्विनीकुमारो एवं समान धन वाले सूर्यचंद्र! अंतरिक्ष में स्थित मेघों में जो अहिर्बुध्न्य
स्थित हैं, उनके साथ जल बरसाओ. (५)
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उत नो देवावश्विना शुभस्पती धामभिर्मित्रावरुणा उरुष्यताम्.
महः स राय एषतेऽति धन्वेव दुरिता.. (६)
हे कल्याण के स्वामी अश्विनीकुमारो! मित्र एवं वरुण! अपने तेज से हमारी रक्षा करें.
इनके द्वारा रक्षित यजमान अधिक धन पाता है एवं मरुस्थल के समान विस्तृत पापों से बच
जाता है. (६)
उत नो रुद्रा चिन्मृळतामश्विना विश्वे देवासो रथस्पतिर्भगः.
ऋभुर्वाज ऋभुक्षणः परिज्मा विश्ववेदसः.. (७)
रुद्रपुत्र अश्विनीकुमार हमारी रक्षा करें. समस्त देव रथ के स्वामी पूषा, भग ऋभु, अन्न
के स्वामी भग एवं गतिशील अन्य सब देव हमें सुख दें. (७)
ऋभुर्ऋभुक्षा ऋभुर्विधतो मद आ ते हरी जूजुवानस्य वाजिना.
दुष्टरं यस्य साम चिद्दृधग्यज्ञो न मानुषः.. (८)
हे महान् इंद्र! तुम एवं तुम्हारी सेवा करने वाले यजमान का हर्ष यज्ञ से सुशोभित होता
है. यज्ञ के प्रति तुम शीघ्र आते हो एवं तुम्हारे घोड़े शक्तिशाली हैं. तुम्हारे लिए गाया जाने
वाला साम राक्षसों द्वारा दुस्तर है. तुम्हारा दिव्य यज्ञ मानवों द्वारा साध्य नहीं है. (८)
कृधी नो अह्रयो देव सवितः स च स्तुषे मघोनाम्.
सहो न इन्द्रो वह्निभिर्येषां चर्षणीनां चक्रं रश्मिं न योयुवे.. (९)
हे सविता देव! हमें लज्जारहित बनाओ. धनी यजमानों के स्तोता तुम्हारी स्तुति करते
हैं. हमारे बल के समान इंद्र हम मानवों के यज्ञ में आने के लिए अपने पहियों वाले रथ में वायु
के समान वेग वाले घोड़ों को जोड़कर शीघ्र पधारें. (९)
एषु द्यावापृथिवी धातं महदस्मे वीरेषु विश्वचर्षणि श्रवः.
पृक्षं वाजस्य सातये पृक्षं रायोत तुर्वणे.. (१०)
हे द्यावा-पृथिवी! तुम हमारे वीरपुत्रों को अनेक सेवाओं से युक्त महान् यश दो. तुम उन्हें
बलप्राप्ति व शत्रुनाश के लिए धन के साथ पालक अन्न दो. (१०)
एतं शंसमिन्द्रास्मयुष्ट्वं कूचित्सन्तं सहसावन्नभिष्टये सदा पाह्यभिष्टये.
मेदतां वेदता वसो.. (११)
हे हमारे समीप आने के अभिलाषी इंद्र! हमारा स्तोता जहां भी हो, यज्ञ के लिए उसकी
रक्षा करो. अभिलषित सिद्धि के लिए अपने ज्ञान से स्तोता को जानो. (११)
एतं मे स्तोमं तना न सूर्ये द्युतद्यामानं वावृधन्त नॄणाम्.
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संवननं नाश्यं तष्टेवानपच्युतम्.. (१२)
देवशत्रुओं के भली-भांति विनाश के समान मेरा स्तोत्र ऋत्विज् इस प्रकार बढ़ावें, जिस
प्रकार सूर्य अपनी विस्तृत रश्मियों को बढ़ाता है. बढ़ई जिस प्रकार घोड़ों से खींचने योग्य रथ
बनाता है, उसी प्रकार मैंने यह स्तोत्र बनाया है. (१२)
वावर्त येषां राया युक्तैषां हिरण्ययी. नेमधिता न पौंस्या वृथेव विष्टान्ता.. (१३)
हम जिन देवों से धन पाना चाहते हैं, उनकी स्तुति बार-बार पढ़ते हैं. यह स्तुति सोने के
गहनों के समान प्रसन्नता देने वाली है. युद्ध में सैनिक जिस प्रकार आगे बढ़ते हैं अथवा रहट
के घड़े आगे चलते हैं, उसी प्रकार हमारे स्तोत्र बढ़ें. (१३)
प्र तद्दुःशीमे पृथवाने वेने प्र रामे वोचमसुरे मघवत्सु.
ये युक्त्वाय पञ्च शतास्मयु पथा विश्राव्येषाम्.. (१४)
जो देव पांच सौ रथों को घोड़ों से युक्त करके हमारे समीप आने की अभिलाषा से यज्ञ
के मार्ग में आते हैं. उन देवों से संबंधित स्तोत्र मैंने दुःसीम, पृथवान्, वेन एवं शक्तिशाली राम
के समीप बोले हैं. ये सभी राजा धनसंपन्न हैं. (१४)
अधीन्वत्र सप्ततिं च सप्त च.
सद्यो दिदिष्ट तान्वः सद्यो दिदिष्ट पार्थ्यः सद्यो दिदिष्ट मायवः.. (१५)
इन राजाओं से नान्व, पार्थ्य एवं मायव ऋषियों ने शीघ्र ही सतहत्तर गाएं मांगीं. (१५)
सूक्त—९४ देवता—सोम निचोड़ने के
पत्थर
प्रैते वदन्तु प्र वयं वदाम ग्रावभ्यो वाचं वदता वदद्भ्यः.
यदद्रयः पर्वताः साकमाशावः श्लोकं घोषं भरथेन्द्राय सोमिनः.. (१)
ये पत्थर शब्द करें, हम इन पत्थरों की स्तुति करें. हे ऋत्विजो! तुम शब्द करने वाले
पत्थरों की स्तुति करो. हे आदरणीय दृढ़ एवं सोमरस निचोड़ने में शीघ्रता करने वाले पथरो!
तुम एक इंद्र के लिए सुनने योग्य शब्द करो. हे सोमरसयुक्त पत्थरो! तुम सोम से तृप्त बनो.
(१)
एते वदन्ति शतवत्सहस्रवदभि क्रन्दन्ति हरितेभिरासभिः.
विष्ट्वी ग्रावाणः सुकृतः सुकृत्यया होतुश्चित्पूर्वे हविरद्यमाशत.. (२)
ये पत्थर सैकड़ों अथवा हजारों लोगों के समान शब्द करते हैं. ये सोमलता के कारण
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