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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1731 of 1855

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Page 1731

उत्तर वेदी पर स्थित होकर अन्न की अभिलाषा से समस्त हवि के होता बनते हैं. वरण करने
योग्य, व्यापक, दीप्तिशाली एवं शोभन अग्नि मित्र के समान व्यवहार करते हैं. (१)
स दर्शतश्रीरतिथिर्गृहेगृहे वनेवने शिश्रिये तक्ववीरिव.
जनञ्जनं जन्यो नाति मन्यते विश आ क्षेति विश्यो३ विशंविशम्.. (२)
दर्शनीय शोभा वाले, अतिथि एवं मानहितैषी अग्नि यजमानों के घरों और वनों में
निवास करते हैं. वे गतिशील के समान किसी व्यक्ति को नहीं छोड़ते. प्रजाहितकारी अग्नि
मानवों के पास जाते हैं एवं सभी प्रजाओं का आश्रय लेते हैं. (२)
सुदक्षो दक्षैः क्रतुनासि सुक्रतुरग्ने कविः काव्येनासि विश्ववित्.
वसुर्वसूनां क्षयसि त्वमेक इद् द्यावा च यानि पृथिवी च पुष्यतः.. (३)
हे सर्वज्ञ अग्नि! तुम शक्ति द्वारा सर्वश्रेष्ठ शक्तिशाली, कर्म के द्वारा शोभन कर्म वाले एवं
बुद्धि के कारण बुद्धिमान् हो. तुम अकेले ही सब धर्मों का आश्रय बनते हो. द्यावा-पृथिवी
जिन धनों का संवर्धन करते हैं, तुम उन्हें धारण करते हो. (३)
प्रजानन्नग्ने तव योनिमृत्वियमिळायास्पदे घृतवन्तमासदः.
आ ते चिकित्र उषासामिवेतयोऽरेपसः सूर्यस्येव रश्मयः.. (४)
हे अग्नि! तुम यज्ञवेदी के ऊपर अपना घृतयुक्त निवासस्थान बना हुआ जानकर बैठो.
तुम्हारी ज्वालाएं उषा की किरणें एवं सूर्य की ज्वालाओं के समान विमल हैं. (४)
तव श्रियो वर्ष्यस्येव विद्युतश्चित्राश्चित्रा उषासां न केतवः.
यदोषधीरभिसृष्टो वनानि च परि स्वयं चिनुषे अन्नमास्ये.. (५)
हे अग्नि! तुम्हारी किरणरूपी विभूतियां बरसने वाले मेघ की बिजली अथवा उषा की
किरणों के समान जान पड़ती हैं. उस समय तुम ओषधियों और वनों को अपने मुख से
भक्षण करने के लिए स्वयं उन्मुक्त जान पड़ते हो. (५)
तमोषधीर्दधिरे गर्भमृत्वियं तमापो अग्निं जनयन्त मातरः.
तमित्समानं वनिनश्च वीरुधोऽन्तर्वतीश्च सुवते च विश्वहा.. (६)
ओषधियां उस अग्नि को ऋतु के अनुसार गर्भ के रूप में धारण करती हैं. जलरूपी
माताएं अग्नि को जन्म देती हैं. वन की लताएं एवं वृक्ष सदा गर्भयुक्त होकर समान रूप से
जन्म देते हैं. (६)
वातोपधूत इषितो वशाँ अनु तृषु यदन्ना वेविषद्वितिष्ठसे.
आ ते यतन्ते रथ्यो३ यथा पृथक् शर्धांस्यग्ने अजराणि धक्षतः.. (७)
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