ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 1722 of 1855
Read in contextसूक्त—८८ देवता—अग्नि व सूर्य
हविष्पान्तमजरं स्वर्विदि दिविस्पृश्याहुतं जुष्टमग्नौ.
तस्य भर्मणे भुवनाय देवा धर्मणे कं स्वधया पप्रथन्त.. (१)
पीने योग्य, जरारहित एवं देवों का प्रिय सोमरसरूपी हव्य सूर्य को जानने वाले एवं
स्वर्गस्थ अग्नि को होम किया जाता है. देवगण सोम उत्पादन पूर्ति और धारण के लिए
सुखकर अग्नि को अन्न से बढ़ाते हैं. (१)
गीर्णं भुवनं तमसापगूळ्हमाविः स्वरभवज्जाते अग्नौ.
तस्य देवाः पृथिवी द्यौरुतापोऽरणयन्नोषधीः सख्ये अस्य.. (२)
अंधकार द्वारा निगला हुआ एवं अंधकार में छिपा हुआ संसार अग्नि के उत्पन्न होने पर
प्रकट होता है. उस अग्नि के मैत्रीपूर्ण कार्य से देवगण पृथ्वी स्वर्ग, जल एवं ओषधियां—सब
प्रसन्न होते हैं. (२)
देवेभिर्न्विषतो यज्ञियेभिरग्निं स्तोषायजरं बृहन्तम्.
यो भानुना पृथिवीं द्यामुतेमामाततान रोदसी अन्तरिक्षम्.. (३)
यज्ञ के योग्य देवों द्वारा शीघ्र प्रेरित मैं जरारहित एवं विशाल अग्नि की स्तुति करता हूं.
अग्नि ने अपने तेज से धरती, द्यौ, इनके मध्यभाग एवं आकाश को विस्तृत किया है. (३)
यो होतासीत्प्रथमो देवजुष्टो यं समाञ्जन्त्राज्येना वृणानाः.
स पतत्रीत्वरं स्था जगद्यच्छ्वात्रमग्निरकृणोज्जातवेदाः.. (४)
जो अग्नि देवों द्वारा सेवित होकर पहले होता बने थे एवं वर के अभिलाषी यजमान
जिन्हें घी से सींचते हैं, उन अग्नि ने अपने तेज से पक्षियों गतिशील सांप आदि तथा
स्थावरजंगम रूप संसार को शीघ्र ही उत्पन्न किया. (४)
यज्जातवेदो भुवनस्य मूर्धन्नतिष्ठो अग्ने सह रोचनेन.
तं त्वाहेम मतिभिर्गीर्भिरुक्थैः स यज्ञियो अभवो रोदसिप्राः.. (५)
हे जातवेद अग्नि! तुम आदित्य के साथ तीनों लोकों के सिर पर स्थित होते हो. हम
तुम्हें अर्चनीय स्तुतियों एवं मंत्रों द्वारा प्राप्त करते हैं. तुम यज्ञ के पात्र एवं द्यावा-पृथिवी को
पूर्ण करने वाले हो. (५)
मूर्धा भुवो भवति नक्तमग्निस्ततः सूर्यो जायते प्रातरुद्यन्.
मायामू तु यज्ञियानामेतामपो यत्तूर्णिश्चरति प्रजानन्.. (६)
अग्नि रात के समय सभी प्राणियों के मूर्धारूप बन जाते हैं एवं प्रातः उदय होते हुए सूर्य
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